मध्य प्रदेश पर ₹44,980 करोड़ का नया कर्ज: जीतू पटवारी का मोहन यादव सरकार पर बड़ा हमला
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने 3 नवंबर 2026 को भोपाल में एक बयान जारी कर मुख्यमंत्री मोहन यादव की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश कर्ज और ब्याज के भारी बोझ तले दबता जा रहा है। पटवारी के अनुसार, राज्य की आर्थिक व्यवस्था नए कर्ज के सहारे चलाई जा रही है, जबकि निवेश और रोज़गार के दावे ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर हैं।
कर्ज का आँकड़ा
पटवारी ने कहा कि चालू वित्त वर्ष 2026-27 में अप्रैल से अक्टूबर के बीच प्रदेश सरकार लगभग ₹44,980 करोड़ का नया कर्ज ले चुकी है। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार अब ₹4,000 करोड़ का अतिरिक्त कर्ज लेने की तैयारी में है। उनके अनुसार, यह स्थिति दर्शाती है कि राज्य की आर्थिक गाड़ी उधार के पहियों पर टिकी हुई है।
ब्याज और पुराने ऋण का दबाव
पटवारी ने जोर देकर कहा कि इसी अवधि में सरकार ₹14,073 करोड़ ब्याज और पुराने ऋणों के पुनर्भुगतान में खर्च कर चुकी है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब नया कर्ज लेकर पुराना कर्ज चुकाना पड़ रहा है, तो विकास का दावा कितना वास्तविक है। गौरतलब है कि यह स्थिति राज्य के सरकारी खजाने पर बढ़ते संरचनात्मक दबाव की ओर इशारा करती है।
बजट के आँकड़े और राजस्व पर बोझ
पटवारी ने सरकार के अपने बजट का हवाला देते हुए बताया कि वित्त वर्ष 2026-27 में मध्य प्रदेश के लिए लगभग ₹33,735 करोड़ के ब्याज भुगतान का अनुमान रखा गया है। वेतन, पेंशन और ब्याज को जोड़कर कुल प्रस्तावित खर्च लगभग ₹1,37,826 करोड़ है, जो राज्य की अनुमानित राजस्व प्राप्तियों का करीब 45 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह है कि प्रदेश की आमदनी का लगभग आधा हिस्सा पहले से तय देनदारियों में जाता है, जिससे विकास कार्यों के लिए गुंजाइश सीमित हो जाती है।
आने वाली पीढ़ियों पर असर
पटवारी ने चेतावनी दी कि बढ़ती देनदारियों का बोझ आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा। उन्होंने कहा कि आज लिया जा रहा कर्ज कल प्रदेश के युवाओं और करदाताओं को चुकाना होगा। उन्होंने सरकार से यह स्पष्ट करने की माँग की कि लगातार लिए जा रहे कर्ज से कितनी स्थायी परिसंपत्तियाँ तैयार हुईं, कितनी परियोजनाएँ पूरी हुईं और उनका वास्तविक लाभ जनता को मिला।
सरकार के दावों और हकीकत का अंतर
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि मोहन यादव सरकार एक ओर लाखों करोड़ के निवेश और रोज़गार के दावे करती है, दूसरी ओर राज्य की अर्थव्यवस्था की नींव नए कर्ज पर टिकती जा रही है। यह ऐसे समय में आया है जब प्रदेश में कई बड़े उद्योग सम्मेलनों के बाद भी ज़मीनी स्तर पर रोज़गार सृजन के ठोस आँकड़े सामने नहीं आए हैं। इस बहस का फैसला अंततः इस बात से होगा कि आने वाले वित्तीय वर्षों में कर्ज-से-परिसंपत्ति का अनुपात किस दिशा में जाता है।