21 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

टपकेश्वर महादेव मंदिर: महाभारत काल से जुड़ी देहरादून की इस गुफा की अनोखी कहानी

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
टपकेश्वर महादेव मंदिर: महाभारत काल से जुड़ी देहरादून की इस गुफा की अनोखी कहानी

सारांश

देहरादून की एक प्राकृतिक गुफा में स्थित टपकेश्वर महादेव मंदिर सिर्फ एक तीर्थस्थल नहीं — यह महाभारत की एक जीवंत स्मृति है। जहाँ अश्वत्थामा की तपस्या की पौराणिक कथा है, वहीं शिवलिंग पर अनवरत टपकती जलधारा हर भक्त को विस्मित करती है।

मुख्य बातें

टपकेश्वर महादेव मंदिर देहरादून में टोंस नदी के किनारे एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है।
गुफा की छत से शिवलिंग पर निरंतर जल की बूंदें टपकती रहती हैं, जो इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार यह स्थल महाभारत काल में आचार्य द्रोणाचार्य का निवास था, इसीलिए इसे ' द्रोण गुफा ' भी कहते हैं।
मान्यता है कि अश्वत्थामा ने यहाँ छह माह की कठोर तपस्या कर भगवान शिव से दिव्य अस्त्र और दीर्घायु पाई थी।
महाशिवरात्रि पर यहाँ विशाल मेला आयोजित होता है जिसमें देश विदेश से हजारों श्रद्धालु आते हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 21 सितंबर 2026 को एक्स पर मंदिर का वीडियो साझा कर इसके दर्शन की अपील की।

देहरादून के टोंस नदी के किनारे एक प्राकृतिक गुफा में स्थित टपकेश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड के सबसे प्राचीन और आस्था के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है। मान्यता है कि इस गुफा मंदिर में स्थापित प्राकृतिक शिवलिंग पर चट्टान की छत से जल की बूंदें अनवरत टपकती रहती हैं — एक ऐसी अद्भुत प्राकृतिक घटना जिसे श्रद्धालु दैवीय आशीर्वाद मानते हैं। इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जोड़ा जाता है।

नाम के पीछे का अर्थ

'टपकेश्वर' शब्द दो हिंदी शब्दों से मिलकर बना है — 'टपक' अर्थात पानी का गिरना, और 'ईश्वर' अर्थात भगवान शिव। इस प्रकार, इस मंदिर का नाम ही उसकी सबसे विशिष्ट पहचान — शिवलिंग पर निरंतर टपकती जलधारा — को दर्शाता है। गुफा के भीतर का यह दृश्य हर दर्शनार्थी को गहरी आध्यात्मिक अनुभूति देता है।

महाभारत काल से जुड़ी पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के गुरु आचार्य द्रोण इसी स्थान की गुफा में निवास करते थे, इसीलिए इसे 'द्रोण गुफा' के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का जन्म इसी पावन स्थल पर हुआ था।

किंवदंती के अनुसार, एक समय आर्थिक कठिनाइयों के कारण द्रोणाचार्य अपने नवजात शिशु अश्वत्थामा को दूध नहीं पिला सके। तब बालक अश्वत्थामा ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने शिवलिंग से दूध की धारा प्रवाहित करने का आशीर्वाद दिया, जिससे अश्वत्थामा की क्षुधा शांत हुई। यह भी कहा जाता है कि अश्वत्थामा ने यहाँ छह माह तक कठोर तपस्या कर भगवान शिव से दिव्य अस्त्र और दीर्घायु का वरदान प्राप्त किया था। कालांतर में वह दूध की धारा धीरे धीरे जल की बूंदों में परिवर्तित हो गई, जो आज भी अनवरत टपकती रहती है।

मुख्यमंत्री धामी की प्रतिक्रिया

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार, 21 सितंबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक भव्य वीडियो साझा करते हुए लिखा, "देहरादून में मौजूद 'टपकेश्वर महादेव मंदिर' लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है। यह पवित्र जगह न सिर्फ अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए बल्कि अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी मशहूर है। यहाँ मौजूद पवित्र शिवलिंग पर गुफा की छत से लगातार पानी की बूंदें टपकती रहती हैं। देहरादून आने पर इस दिव्य मंदिर के दर्शन जरूर करें।" यह पोस्ट धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की राज्य सरकार की व्यापक मुहिम का हिस्सा प्रतीत होती है।

महाशिवरात्रि पर विशाल आयोजन

प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर इस मंदिर परिसर में एक विशाल धार्मिक मेले का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों के साथ साथ विदेशों से भी हजारों श्रद्धालु यहाँ दर्शन पूजन के लिए पहुँचते हैं। यह मेला उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है और राज्य के धार्मिक पर्यटन को भी बल देता है।

पर्यटन और सांस्कृतिक महत्त्व

गौरतलब है कि टपकेश्वर महादेव मंदिर न केवल एक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह देहरादून के प्रमुख पर्यटन स्थलों में भी शामिल है। गुफा के भीतर की प्राकृतिक संरचना, जल की अनवरत धारा और महाभारत कालीन पौराणिक संदर्भ इसे श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों दोनों के लिए विशेष बनाते हैं। राज्य सरकार की ओर से मंदिर की दृश्यता बढ़ाने के प्रयास जारी हैं, जिससे इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व और अधिक रेखांकित हो रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उनका सांस्कृतिक और सामुदायिक महत्त्व निर्विवाद है — और यही वह कोण है जहाँ पर्यटन नीति सबसे प्रभावी ढंग से काम कर सकती है।
RashtraPress
21 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

टपकेश्वर महादेव मंदिर कहाँ स्थित है?
टपकेश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड के देहरादून में टोंस नदी के किनारे एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है। यह देहरादून शहर के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में से एक है।
टपकेश्वर मंदिर का नाम कैसे पड़ा?
'टपकेश्वर' शब्द 'टपक' (पानी का गिरना) और 'ईश्वर' (भगवान शिव) से मिलकर बना है। गुफा की छत से शिवलिंग पर निरंतर जल की बूंदें टपकती रहती हैं, जो इस मंदिर की सबसे विशिष्ट पहचान है और इसी कारण इसका यह नाम पड़ा।
इस मंदिर का महाभारत काल से क्या संबंध है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में आचार्य द्रोणाचार्य इसी गुफा में निवास करते थे, इसीलिए इसे 'द्रोण गुफा' भी कहते हैं। मान्यता है कि अश्वत्थामा का जन्म यहीं हुआ था और उन्होंने यहाँ छह माह की तपस्या से भगवान शिव से दिव्य अस्त्र प्राप्त किए थे।
शिवलिंग पर पानी टपकने की कथा क्या है?
मान्यता है कि एक समय आर्थिक कठिनाई के कारण द्रोणाचार्य नवजात अश्वत्थामा को दूध नहीं पिला सके, तब बालक ने शिव की तपस्या की और प्रसन्न होकर भगवान शिव ने शिवलिंग से दूध की धारा का आशीर्वाद दिया। कालांतर में वह दूध की धारा जल की बूंदों में बदल गई, जो आज भी अनवरत टपकती है।
टपकेश्वर मंदिर में कौन सा बड़ा उत्सव मनाया जाता है?
प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि के पर्व पर इस मंदिर में एक विशाल धार्मिक मेले का आयोजन होता है। इस अवसर पर देश विदेश से हजारों श्रद्धालु दर्शन पूजन के लिए यहाँ एकत्रित होते हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 सप्ताह पहले
  2. 3 सप्ताह पहले
  3. 4 सप्ताह पहले
  4. 1 महीना पहले
  5. 1 महीना पहले
  6. 10 महीने पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले