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लाखामंडल शिव मंदिर: महाभारत काल के अवशेष आज भी मौजूद, CM धामी ने शेयर किया वीडियो

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लाखामंडल शिव मंदिर: महाभारत काल के अवशेष आज भी मौजूद, CM धामी ने शेयर किया वीडियो

सारांश

देहरादून के जौनसार-बावर में यमुना किनारे बसा लाखामंडल का लाक्षेश्वर मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं — यह महाभारत काल की जीवंत स्मृति है। 12वीं-13वीं सदी की नागर शैली, युधिष्ठिर द्वारा स्थापित कथित शिवलिंग और लाक्षागृह की गुफा इसे उत्तराखंड की सबसे रहस्यमयी धरोहरों में से एक बनाते हैं।

मुख्य बातें

लाखामंडल का लाक्षेश्वर शिव मंदिर देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में यमुना नदी के तट पर स्थित है।
मंदिर 12वीं-13वीं सदी में निर्मित नागर शैली की वास्तुकला का उदाहरण है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, युधिष्ठिर ने अज्ञातवास काल में यहाँ शिवलिंग स्थापित किया था, जो आज भी विद्यमान है।
लाक्षागृह की ऐतिहासिक गुफा आज भी मौजूद बताई जाती है, जिससे पांडव सकुशल बाहर निकले थे।
हनोल, थैना और मैंद्रथ में खुदाई में मिले शिवलिंग और मूर्तियाँ इस क्षेत्र के पौराणिक महत्व की पुष्टि करती हैं।
CM पुष्कर सिंह धामी ने 5 अगस्त को एक्स पर वीडियो साझा कर श्रावण मास में दर्शन का आह्वान किया।

देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में यमुना नदी के तट पर स्थित लाखामंडल का लाक्षेश्वर शिव मंदिर महाभारत काल से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक अवशेषों के कारण देशभर के श्रद्धालुओं और इतिहासकारों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। 5 अगस्त को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस मंदिर का वीडियो साझा कर श्रावण मास में दर्शन का आह्वान किया।

मुख्यमंत्री धामी का संदेश

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक्स पर लिखा, 'देहरादून के लाखामंडल में स्थित प्राचीन शिव मंदिर अनेकों श्रद्धालुओं की आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। ऊंचे पहाड़ों और अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित यह मंदिर अपनी अद्वितीय वास्तुकला के लिए भी विशिष्ट पहचान रखता है।' उन्होंने आगे लिखा कि प्राचीन काल में इस पवित्र भूमि पर अनेक शिवलिंगों की स्थापना की गई थी और पवित्र श्रावण मास में देवभूमि आने वाले श्रद्धालुओं को इस मंदिर के दर्शन अवश्य करने चाहिए।

महाभारत काल से जुड़ी मान्यताएँ

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पांडवों के अज्ञातवास काल में युधिष्ठिर ने लाखामंडल स्थित लाक्षेश्वर मंदिर के प्रांगण में एक शिवलिंग की स्थापना की थी, जो आज भी विद्यमान बताया जाता है। इस शिवलिंग के सामने दो द्वारपालों की मूर्तियाँ हैं जो पश्चिम दिशा की ओर मुख किए खड़ी हैं — इनमें से एक का हाथ खंडित है।

मान्यता है कि इसी स्थान पर कौरवों ने पांडवों और उनकी माता कुंती को जीवित जलाने के लिए लाक्षागृह (लाख का घर) का निर्माण कराया था। बताया जाता है कि लाखामंडल में वह ऐतिहासिक गुफा आज भी मौजूद है, जिससे होकर पांडव सकुशल बाहर निकले थे। इसके बाद पांडवों ने 'चक्रनगरी' में एक माह बिताया, जिसे आज चकराता के नाम से जाना जाता है।

वास्तुकला और पुरातात्विक महत्व

शिव को समर्पित लाक्षेश्वर मंदिर 12वीं-13वीं सदी में निर्मित नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर के भीतर देवी पार्वती के पैरों के निशान भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। मंदिर के आसपास के इलाके में पत्थर से बने सैकड़ों शिवलिंग पाए जाते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, जल अर्पित करने के बाद शिवलिंग शीशे की तरह चमकने लगता है।

हनोल, थैना और मैंद्रथ में खुदाई के दौरान मिले पौराणिक शिवलिंग और मूर्तियाँ इस क्षेत्र में पांडवों की उपस्थिति की ओर संकेत करती हैं — ऐसा स्थानीय मान्यताओं और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर कहा जाता है।

रहस्यमयी लोक-परंपराएँ

इस मंदिर से जुड़ी एक लोक-मान्यता विशेष रूप से चर्चित है — कहा जाता है कि यदि किसी शव को द्वारपाल मूर्तियों के सामने रखकर पुजारी उस पर पवित्र जल छिड़कें, तो वह मृत व्यक्ति कुछ समय के लिए पुनः जीवित हो उठता है और गंगाजल ग्रहण करते ही उसकी आत्मा शरीर त्याग देती है। यह मान्यता पीढ़ियों से चली आ रही है, हालाँकि इसके पीछे का वैज्ञानिक या ऐतिहासिक रहस्य आज तक अनुत्तरित है।

श्रद्धालुओं के लिए महत्व

यह मंदिर देवभूमि उत्तराखंड की उस समृद्ध धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है जो प्राकृतिक वैभव और पौराणिक इतिहास को एक साथ समेटती है। श्रावण मास में यहाँ श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है। मुख्यमंत्री धामी के वीडियो साझा करने के बाद इस मंदिर की चर्चा एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है, और उम्मीद है कि इससे इस क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन को नई गति मिलेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

इस मंदिर की पुरातात्विक खुदाई और संरक्षण की स्थिति पर मुख्यधारा की कवरेज लगभग मौन है — जबकि हनोल, थैना और मैंद्रथ में मिले अवशेष किसी व्यवस्थित संरक्षण अभियान की प्रतीक्षा में हैं। श्रावण मास में वायरल वीडियो से आने वाली भीड़ और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे के बीच का तनाव वह असली सवाल है जिसका जवाब प्रशासन को देना होगा।
RashtraPress
5 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लाखामंडल शिव मंदिर कहाँ स्थित है?
लाखामंडल का लाक्षेश्वर शिव मंदिर देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में यमुना नदी के तट पर स्थित है। यह उत्तराखंड के प्रमुख प्राचीन धार्मिक स्थलों में से एक है।
लाखामंडल मंदिर का महाभारत से क्या संबंध है?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, पांडवों के अज्ञातवास काल में युधिष्ठिर ने इस स्थान पर शिवलिंग स्थापित किया था। इसी क्षेत्र में कौरवों द्वारा बनाया गया लाक्षागृह और वह गुफा भी बताई जाती है जिससे पांडव सुरक्षित बाहर निकले थे।
लाखामंडल मंदिर कितना पुराना है?
लाक्षेश्वर मंदिर 12वीं-13वीं सदी में निर्मित नागर शैली का मंदिर है। हालाँकि इससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएँ महाभारत काल तक जाती हैं।
CM धामी ने लाखामंडल मंदिर के बारे में क्या कहा?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 5 अगस्त को एक्स पर मंदिर का वीडियो साझा करते हुए इसे श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बताया। उन्होंने पवित्र श्रावण मास में देवभूमि आने वाले श्रद्धालुओं से इस मंदिर के दर्शन का आग्रह किया।
लाखामंडल के आसपास और कौन-से पुरातात्विक स्थल हैं?
लाखामंडल के अतिरिक्त हनोल, थैना और मैंद्रथ में खुदाई के दौरान पौराणिक शिवलिंग और मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। ये सभी अवशेष इस पूरे क्षेत्र के ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को रेखांकित करते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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