4 अगस्त 2026
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बिनसर महादेव मंदिर: रानीखेत के देवदार वनों में बसा शिव का प्राचीन धाम, सावन में उमड़ती है भक्तों की भीड़

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बिनसर महादेव मंदिर: रानीखेत के देवदार वनों में बसा शिव का प्राचीन धाम, सावन में उमड़ती है भक्तों की भीड़

सारांश

रानीखेत के देवदार वनों में बसा बिनसर महादेव मंदिर सावन में फिर श्रद्धा का केंद्र बना है। 9वीं-10वीं सदी का यह प्राचीन धाम स्वयंभू शिवलिंग, दुर्लभ नगरीलिपि शिलालेखों और बैकुंठ चतुर्दशी के वार्षिक मेले के लिए जाना जाता है। CM धामी ने एक्स पर वीडियो पोस्ट कर श्रद्धालुओं को दर्शन का न्योता दिया।

मुख्य बातें

बिनसर महादेव मंदिर , रानीखेत (अल्मोड़ा) , उत्तराखंड के घने देवदार वनों के बीच स्थित है और सावन में प्रमुख तीर्थ बन जाता है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार, 4 अगस्त को एक्स पर वीडियो साझाकर श्रद्धालुओं से दर्शन का आह्वान किया।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मंदिर का निर्माण 9वीं-10वीं शताब्दी में राजा पिठ्ठ ने अपने पिता बिंदू की स्मृति में करवाया था; इसे बिंदेश्वर मंदिर भी कहते हैं।
मंदिर में महेशमर्दिनी की 9वीं सदी की मूर्ति पर 'नगरीलिपी' में ग्रंथ उत्कीर्ण हैं।
प्रतिवर्ष बैकुंठ चतुर्दशी पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुँचते हैं।
मान्यता है कि मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग विराजमान हैं और यहाँ केवल वही पहुँच पाता है जिसे भगवान शिव का बुलावा होता है।

उत्तराखंड के रानीखेत (अल्मोड़ा) में घने देवदार के जंगलों के बीच स्थित बिनसर महादेव मंदिर श्रावण मास में श्रद्धालुओं का प्रमुख आस्था केंद्र बन जाता है। यह प्राचीन मंदिर न केवल धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है, बल्कि अपनी अद्वितीय स्थापत्य कला और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी विशेष पहचान रखता है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो साझा कर श्रद्धालुओं से इस पवित्र धाम के दर्शन करने का आह्वान किया।

मुख्यमंत्री धामी का आह्वान

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक्स पर वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा, 'सावन के पवित्र महीने में भगवान भोलेनाथ की पूजा का विशेष महत्व है। इस शुभ समय में, श्रद्धालु बड़ी संख्या में रानीखेत (अल्मोड़ा) के घने देवदार के जंगलों के बीच स्थित बिनसर महादेव मंदिर पहुँचते हैं और आस्था, भक्ति व आध्यात्मिक शांति की कामना करते हैं।' उन्होंने आगे कहा कि यह क्षेत्र तीर्थयात्रियों को दिव्य अनुभव के साथ-साथ प्रकृति से एक अनोखा जुड़ाव भी प्रदान करता है।

धामी ने सावन में रानीखेत की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं से विशेष रूप से अनुरोध किया कि वे आध्यात्मिक पुण्य का लाभ पाने के लिए बिनसर महादेव मंदिर में दर्शन और पूजा के लिए अवश्य जाएं।

मंदिर का ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बिनसर महादेव मंदिर का निर्माण 9वीं-10वीं शताब्दी में हुआ था, जो इसे उत्तराखंड के सबसे प्राचीन धार्मिक स्थलों में से एक बनाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा पिठ्ठ ने अपने पिता बिंदू की स्मृति में करवाया था, और इसी कारण इसे बिंदेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

मंदिर परिसर में गणेश, हर गौरी और महेशमर्दिनी की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। विशेष रूप से, महेशमर्दिनी की मूर्ति 9वीं शताब्दी की है, जिस पर 'नगरीलिपी' में ग्रंथ उत्कीर्ण हैं — यह इस मंदिर की स्थापत्य विरासत का जीवंत प्रमाण है।

स्वयंभू शिवलिंग और आस्था की विशेष मान्यता

स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच यह मान्यता प्रचलित है कि बिनसर महादेव मंदिर में भगवान शिव स्वयंभू शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। इस मंदिर से जुड़ी एक विशेष आस्था यह भी है कि यहाँ तक हर कोई नहीं पहुँच पाता — जिस भक्त को भगवान शिव का बुलावा होता है, वही इस धाम तक पहुँचने में सफल होता है। यह मान्यता मंदिर की रहस्यमय आभा को और गहरा करती है।

बैकुंठ चतुर्दशी मेला और प्राकृतिक परिवेश

प्रतिवर्ष बैकुंठ चतुर्दशी के अवसर पर यहाँ एक विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु शामिल होते हैं। देवदार, पाइन और ओक के घने वनों से घिरा यह मंदिर उत्तराखंड के आध्यात्मिक पर्यटन मानचित्र पर एक विशिष्ट स्थान रखता है।

यह ऐसे समय में है जब उत्तराखंड सरकार धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रूप से प्रयासरत है, और मुख्यमंत्री धामी का यह आह्वान उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सावन के शेष सप्ताहों में बिनसर महादेव में श्रद्धालुओं की संख्या में और वृद्धि की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन बिनसर महादेव की असली ताकत सरकारी प्रचार में नहीं, उसकी सदियों पुरानी आस्था और दुर्लभ नगरीलिपि विरासत में है। गौरतलब है कि उत्तराखंड में धार्मिक स्थलों पर बढ़ती भीड़ पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ा रही है — जिस पर मुख्यधारा की कवरेज प्रायः चुप रहती है। बिनसर जैसे संवेदनशील वन क्षेत्रों में तीर्थ-पर्यटन और पारिस्थितिकी संरक्षण के बीच संतुलन का प्रश्न अनुत्तरित है।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिनसर महादेव मंदिर कहाँ स्थित है?
बिनसर महादेव मंदिर उत्तराखंड के रानीखेत (अल्मोड़ा) में घने देवदार, पाइन और ओक के जंगलों के बीच स्थित है। यह मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व दोनों के लिए प्रसिद्ध है।
बिनसर महादेव मंदिर का इतिहास क्या है?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 9वीं-10वीं शताब्दी में राजा पिठ्ठ ने अपने पिता बिंदू की स्मृति में करवाया था, इसीलिए इसे बिंदेश्वर मंदिर भी कहते हैं। मंदिर में महेशमर्दिनी की 9वीं सदी की मूर्ति पर नगरीलिपी में ग्रंथ उत्कीर्ण हैं, जो इसकी प्राचीनता का प्रमाण है।
बैकुंठ चतुर्दशी मेला बिनसर में कब लगता है?
बिनसर महादेव मंदिर में प्रतिवर्ष बैकुंठ चतुर्दशी के अवसर पर एक विशाल मेले का आयोजन होता है। इस मेले में दूर-दूर से श्रद्धालु शामिल होते हैं और यह मंदिर का सबसे बड़ा वार्षिक उत्सव माना जाता है।
CM पुष्कर सिंह धामी ने बिनसर महादेव के बारे में क्या कहा?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार, 4 अगस्त को एक्स पर वीडियो पोस्ट कर कहा कि सावन के पवित्र महीने में बिनसर महादेव मंदिर में दर्शन का विशेष महत्व है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे आध्यात्मिक पुण्य के लिए इस धाम में अवश्य जाएं।
बिनसर महादेव मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग की क्या मान्यता है?
स्थानीय मान्यता के अनुसार बिनसर महादेव मंदिर में भगवान शिव स्वयंभू शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। यह भी माना जाता है कि यहाँ तक केवल वही भक्त पहुँच पाता है जिसे भगवान शिव स्वयं बुलाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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