30 जुलाई 2026
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महानदी जल विवाद: सीएम विष्णुदेव साय ने कहा — यह नदी विभाजन नहीं, छत्तीसगढ़-ओडिशा की साझा जीवनरेखा है

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महानदी जल विवाद: सीएम विष्णुदेव साय ने कहा — यह नदी विभाजन नहीं, छत्तीसगढ़-ओडिशा की साझा जीवनरेखा है

सारांश

महानदी विवाद को संवाद की मेज पर लाने की नई कोशिश — नई दिल्ली में हुई उच्चस्तरीय बैठक में सीएम विष्णुदेव साय ने साफ कहा कि यह नदी दोनों राज्यों को बाँटती नहीं, जोड़ती है। वैज्ञानिक आकलन, संस्थागत तंत्र और केंद्र की मध्यस्थता — तीन सूत्री फॉर्मूले पर जोर।

मुख्य बातें

30 जुलाई 2026 को नई दिल्ली के श्रमशक्ति भवन में महानदी जल विवाद पर उच्चस्तरीय बैठक आयोजित हुई।
बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर.
पाटिल ने की; छत्तीसगढ़ CM विष्णुदेव साय और ओडिशा CM मोहन चरण माझी शामिल हुए।
सीएम साय ने महानदी को 'विवाद की रेखा नहीं, सहयोग का सेतु' बनाने का आह्वान किया।
छत्तीसगढ़ ने हीराकुंड परियोजना की ओडिशा की चिंताओं का सम्मान करते हुए अपने किसानों व आदिवासी क्षेत्रों के हितों की भी पैरवी की।
दोनों राज्यों के विशेषज्ञों द्वारा वैज्ञानिक जल आकलन और स्थायी संस्थागत तंत्र विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया।
केंद्रीय जल आयोग से समयबद्ध कार्ययोजना और दीर्घकालिक समझौते का प्रारूप तैयार कराने का आग्रह किया गया।

केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की अध्यक्षता में 30 जुलाई 2026 को नई दिल्ली के श्रमशक्ति भवन में महानदी जल विवाद के समाधान को लेकर एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई, जिसमें छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भाग लिया। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने स्पष्ट किया कि महानदी को विवाद की रेखा नहीं, बल्कि दोनों राज्यों की साझा समृद्धि का आधार बनाया जाना चाहिए।

बैठक में कौन-कौन शामिल हुए

इस उच्चस्तरीय बैठक में ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री तोखन साहू, दोनों राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी तथा जल संसाधन विभाग के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। छत्तीसगढ़ की ओर से मुख्य सचिव विकासशील और मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह भी बैठक में शामिल हुए।

सीएम साय का मुख्य वक्तव्य

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बैठक में कहा कि महानदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों की साझी जीवनरेखा है — यह किसानों, उद्योगों, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से सीधे जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा, 'छत्तीसगढ़ इस बैठक को विवाद की निरंतरता नहीं, बल्कि समाधान की नई शुरुआत के रूप में देखता है।'

साय ने यह भी स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ ओडिशा की सिंचाई, पेयजल और हीराकुंड परियोजना से जुड़ी चिंताओं का पूरा सम्मान करता है। साथ ही उन्होंने माँग की कि छत्तीसगढ़ के किसानों, आदिवासी क्षेत्रों, सूखा प्रभावित अंचलों और भविष्य की विकास आवश्यकताओं को भी समान प्राथमिकता दी जाए।

समाधान के लिए सुझाए गए उपाय

मुख्यमंत्री साय ने दोनों राज्यों के विशेषज्ञों से आग्रह किया कि वे उपलब्ध जल का वैज्ञानिक आकलन करें, कम वर्षा वाले वर्षों के लिए साझा आपातकालीन व्यवस्था तैयार करें और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक स्थायी संस्थागत तंत्र विकसित करें। उन्होंने यह भी सुझाया कि अधिकांश मुद्दों का समाधान प्रशासनिक एवं तकनीकी स्तर पर ही किया जाए और केवल नीतिगत विषय मंत्रिस्तरीय बैठकों तक सीमित रखे जाएं।

केंद्र से सक्रिय भूमिका का आग्रह

सीएम साय ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल और केंद्रीय जल आयोग से अनुरोध किया कि वे निष्पक्ष तकनीकी सहयोग प्रदान करें, समयबद्ध कार्ययोजना तैयार कराएं और दोनों राज्यों के बीच दीर्घकालिक समझौते का प्रारूप तैयार करने में सक्रिय मध्यस्थ की भूमिका निभाएं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के सहकारी संघवाद के दृष्टिकोण की सराहना करते हुए कहा कि इसी संवाद-आधारित नेतृत्व ने वर्षों पुराने जटिल विषयों के समाधान का सकारात्मक वातावरण तैयार किया है।

आगे की राह

यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण के समक्ष वर्षों से लंबित है और दोनों राज्यों के बीच जल बँटवारे को लेकर तनाव बना हुआ है। गौरतलब है कि हीराकुंड बाँध ओडिशा की कृषि और पेयजल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जबकि छत्तीसगढ़ अपने ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में सिंचाई परियोजनाओं के विस्तार का अधिकार माँगता रहा है। मुख्यमंत्री साय ने विश्वास जताया कि इस प्रक्रिया से दोनों राज्यों के किसानों, नागरिकों और भावी पीढ़ियों का जल भविष्य सुरक्षित किया जा सकेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन ठोस समयसीमा और बाध्यकारी तंत्र के अभाव में यह एक और 'सद्भावना बैठक' बनकर रह सकती है। असली परीक्षा यह है कि वैज्ञानिक जल आकलन का काम कब शुरू होगा और क्या दोनों राज्य किसी बाध्यकारी जल-साझाकरण फॉर्मूले को स्वीकार करेंगे। गौरतलब है कि अंतरराज्यीय जल विवादों में केंद्र की मध्यस्थता अतीत में भी हुई है, पर कावेरी और सतलज-यमुना लिंक जैसे मामले बताते हैं कि राजनीतिक सहमति और कानूनी समाधान के बीच की खाई पाटना सबसे कठिन काम होता है।
RashtraPress
30 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महानदी जल विवाद क्या है और यह कब से चल रहा है?
महानदी जल विवाद छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच नदी के जल बँटवारे को लेकर है। ओडिशा का आरोप है कि छत्तीसगढ़ द्वारा ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में बनाई जा रही परियोजनाएं हीराकुंड बाँध तक पानी की आवक घटा रही हैं, जबकि छत्तीसगढ़ अपने कृषि और विकास जरूरतों के लिए जल उपयोग का अधिकार माँगता है। यह विवाद महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण के समक्ष वर्षों से विचाराधीन है।
30 जुलाई 2026 की बैठक में क्या निर्णय हुआ?
बैठक में कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ, लेकिन दोनों राज्यों ने संवाद जारी रखने पर सहमति जताई। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने वैज्ञानिक जल आकलन, साझा आपातकालीन व्यवस्था और स्थायी संस्थागत तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा। केंद्रीय जल आयोग से समयबद्ध कार्ययोजना तैयार कराने का आग्रह किया गया।
हीराकुंड परियोजना इस विवाद में क्यों महत्वपूर्ण है?
हीराकुंड बाँध ओडिशा के लाखों किसानों की सिंचाई और लाखों लोगों की पेयजल जरूरतों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ओडिशा की चिंता है कि महानदी के ऊपरी हिस्से में छत्तीसगढ़ की परियोजनाओं से बाँध में जलप्रवाह कम हो सकता है, जिससे सिंचाई और बिजली उत्पादन प्रभावित होगा।
छत्तीसगढ़ की इस बैठक में क्या माँगें थीं?
छत्तीसगढ़ ने माँग की कि उसके किसानों, आदिवासी क्षेत्रों, सूखा प्रभावित अंचलों और भविष्य की विकास जरूरतों को ओडिशा की चिंताओं के समान महत्व दिया जाए। मुख्यमंत्री साय ने सम्मानजनक, व्यावहारिक और दीर्घकालिक समाधान पर जोर दिया।
इस विवाद का समाधान आगे कैसे होगा?
सीएम साय के प्रस्ताव के अनुसार दोनों राज्यों के विशेषज्ञ मिलकर वैज्ञानिक जल आकलन करेंगे और एक स्थायी संस्थागत तंत्र विकसित करेंगे। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री और केंद्रीय जल आयोग मध्यस्थ की भूमिका निभाएंगे। अधिकांश तकनीकी मुद्दे प्रशासनिक स्तर पर सुलझाने और केवल नीतिगत विषय मंत्रिस्तर पर लाने की रणनीति अपनाई जाएगी।
राष्ट्र प्रेस
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