सुलेमान खान मॉब लिंचिंग: जलगांव सत्र न्यायालय ने 5 आरोपियों की जमानत खारिज, डिफॉल्ट बेल पर सवाल

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सुलेमान खान मॉब लिंचिंग: जलगांव सत्र न्यायालय ने 5 आरोपियों की जमानत खारिज, डिफॉल्ट बेल पर सवाल

सारांश

जलगांव सत्र न्यायालय ने सुलेमान खान मॉब लिंचिंग मामले में 5 आरोपियों की नियमित जमानत खारिज की — CCTV, CDR और चश्मदीद गवाह सबूत के रूप में। लेकिन 4 अन्य आरोपी डिफॉल्ट जमानत पर बाहर हैं और उनकी जमानत रद्द करने की अर्जी पर अगली सुनवाई 10 जून तक टाल दी गई है।

मुख्य बातें

जलगांव सत्र न्यायालय ने सुलेमान खान मॉब लिंचिंग मामले में अब तक 5 आरोपियों की नियमित जमानत अर्जियाँ खारिज की हैं।
14 मई 2026 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पी.
बैंकर ने आरोपी सूरज गुरुदास भोगे और कृष्ण राजू तेली की जमानत अर्जी खारिज की।
अदालत ने CCTV फुटेज , CDR और चश्मदीद बयानों को पर्याप्त साक्ष्य मानते हुए जमानत देने से इनकार किया।
4 अन्य आरोपी जामनेर न्यायालय द्वारा दी गई डिफॉल्ट जमानत पर बाहर हैं; चार्जशीट 90 दिन में दाखिल न होने पर यह जमानत मिली थी।
डिफॉल्ट जमानत रद्द करने की अर्जी पर अगली सुनवाई 10 जून को निर्धारित है।
एकता संगठन के संयोजक फारूक शेख ने सुनवाई में देरी पर गहरी नाराज़गी जताई है।

जलगांव सत्र न्यायालय ने सुलेमान खान मॉब लिंचिंग हत्या मामले में अब तक 5 आरोपियों की नियमित जमानत अर्जियाँ खारिज कर दी हैं, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि अदालत इस मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों को पर्याप्त और आरोपों को अत्यंत गंभीर मान रही है। 14 मई 2026 को हुई सुनवाई में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पी. बैंकर ने दो और आरोपियों की जमानत अर्जी ठुकराई, जबकि इससे पहले तीन अन्य की अर्जियाँ भी खारिज हो चुकी थीं।

मुख्य घटनाक्रम

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पी. बैंकर ने 14 मई को आरोपी सूरज गुरुदास भोगे और कृष्ण राजू तेली की नियमित जमानत अर्जी खारिज की। इससे पूर्व 21 फरवरी को सत्र न्यायाधीश राजवरकर ने आदित्य देवरे, सज्वल तेली और ऋषिकेश प्रभाकर की जमानत अर्जियाँ भी अस्वीकार कर दी थीं। इस प्रकार कुल 5 आरोपियों की नियमित जमानत अर्जियाँ न्यायालय द्वारा खारिज की जा चुकी हैं।

अदालत के आदेश में क्या कहा गया

14 मई के आदेश में सत्र न्यायालय ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि आरोपियों के विरुद्ध सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), चश्मदीदों के बयान और अन्य महत्त्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध हैं। अदालत ने यह भी माना कि यह अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति का है। न्यायालय ने आशंका जताई कि जमानत मिलने पर आरोपी गवाहों को डरा-धमका सकते हैं, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं और कानून-व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

डिफॉल्ट जमानत पर उठे सवाल

गौरतलब है कि जामनेर न्यायालय ने 4 अन्य आरोपियों को डिफॉल्ट जमानत इस आधार पर दे दी थी कि निर्धारित 90 दिनों की अवधि के भीतर आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल नहीं किया गया था। एकता संगठन के संयोजक फारूक शेख ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि जब सत्र न्यायालय खुद गंभीर साक्ष्यों का हवाला देते हुए नियमित जमानत अर्जियाँ लगातार खारिज कर रहा है, तो इन 4 आरोपियों की डिफॉल्ट जमानत अब तक रद्द क्यों नहीं की गई।

सुनवाई में देरी पर नाराज़गी

शेख ने बताया कि सेशंस कोर्ट में डिफॉल्ट जमानत रद्द करने के लिए एक अर्जी दायर की गई थी। दो अलग-अलग न्यायाधीशों के समक्ष सुनवाई होने के बावजूद कोई आदेश जारी नहीं हुआ। 12 मई को जब यह मामला तीसरे न्यायाधीश के सामने आया, तो अगली सुनवाई की तारीख सीधे 10 जून तय कर दी गई। शेख ने कहा, 'इस देरी से पीड़ित परिवार और मुस्लिम समुदाय में भारी नाराज़गी पैदा हो रही है। अगर अदालत खुद यह मानती है कि आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत मौजूद हैं, तो डिफॉल्ट बेल पर आज़ाद घूम रहे लोगों की जमानत तुरंत रद्द की जानी चाहिए।'

आगे क्या होगा

डिफॉल्ट जमानत रद्द करने की अर्जी पर अगली सुनवाई 10 जून को निर्धारित है। पीड़ित पक्ष और सामाजिक संगठनों की नज़र इस तारीख पर टिकी है। यह मामला महाराष्ट्र में मॉब लिंचिंग के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया की गति और विश्वसनीयता की एक महत्त्वपूर्ण परीक्षा बन चुका है।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं की गई। यह प्रशासनिक चूक, न्यायिक दृढ़ता को कमज़ोर करती है। डिफॉल्ट जमानत रद्द करने की अर्जी पर तीन न्यायाधीशों के सामने सुनवाई के बावजूद कोई आदेश न आना और अगली तारीख सीधे 10 जून तय होना — यह देरी न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। मॉब लिंचिंग जैसे संवेदनशील मामलों में प्रक्रियागत विफलताएँ सामाजिक तनाव को और गहरा करती हैं।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुलेमान खान मॉब लिंचिंग मामले में अब तक क्या हुआ है?
जलगांव सत्र न्यायालय ने इस मामले में 5 आरोपियों की नियमित जमानत अर्जियाँ खारिज कर दी हैं। अदालत ने CCTV फुटेज, CDR और चश्मदीद गवाहों के बयानों को पर्याप्त साक्ष्य मानते हुए जमानत देने से इनकार किया।
डिफॉल्ट जमानत क्या होती है और इस मामले में यह कैसे मिली?
डिफॉल्ट जमानत तब दी जाती है जब निर्धारित 90 दिनों की अवधि में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल नहीं किया जाता। इस मामले में जामनेर न्यायालय ने इसी आधार पर 4 आरोपियों को डिफॉल्ट जमानत दी थी।
डिफॉल्ट जमानत रद्द करने की अर्जी पर सुनवाई कब होगी?
डिफॉल्ट जमानत रद्द करने की अर्जी पर अगली सुनवाई 10 जून को निर्धारित है। 12 मई को मामला तीसरे न्यायाधीश के सामने आने पर यह तारीख तय की गई।
एकता संगठन ने इस मामले में क्या सवाल उठाए हैं?
एकता संगठन के संयोजक फारूक शेख ने सवाल उठाया है कि जब अदालत नियमित जमानत अर्जियाँ लगातार खारिज कर रही है, तो डिफॉल्ट बेल पर बाहर घूम रहे 4 आरोपियों की जमानत रद्द क्यों नहीं की जा रही। उन्होंने सुनवाई में देरी को पीड़ित परिवार और समुदाय के लिए न्याय में बाधा बताया है।
इस मामले में कौन-से साक्ष्य अदालत के सामने हैं?
अदालत के सामने CCTV फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), चश्मदीद गवाहों के बयान और अन्य महत्त्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध हैं। 14 मई के आदेश में सत्र न्यायालय ने इन्हें पर्याप्त और विश्वसनीय माना।
राष्ट्र प्रेस
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