महाराष्ट्र महिला किसान सशक्तिकरण विधेयक-2026: उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार बोलीं — भूमि नहीं, श्रम होगा पहचान का आधार
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र विधानसभा में 2 जुलाई 2026 को 'महाराष्ट्र महिला किसान सशक्तिकरण विधेयक-2026' पर ऐतिहासिक बहस हुई, जिसमें उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा अजित पवार ने इस विधेयक को राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली महिला किसानों को न्याय, पहचान और अधिकार देने की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इस तरह का कानून लाने वाला महाराष्ट्र देश का पहला राज्य बन गया है।
विधेयक का मूल प्रावधान: भूमि नहीं, भागीदारी होगी मानदंड
इस विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि किसी महिला को आधिकारिक 'महिला किसान प्रमाण पत्र' देने के लिए भूमि स्वामित्व की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है। अब कृषि में उसकी वास्तविक भागीदारी को प्राथमिक मानदंड माना जाएगा। सुनेत्रा पवार ने सदन में स्पष्ट किया कि बुवाई, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन और फसल कटाई के बाद की प्रक्रियाओं में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाली महिलाओं को ऐतिहासिक रूप से कभी आधिकारिक 'किसान' के रूप में मान्यता नहीं मिली।
गौरतलब है कि भूमि स्वामित्व की कमी के कारण लाखों महिलाएँ दशकों से सरकारी कृषि योजनाओं, फसल बीमा और संस्थागत ऋण जैसे लाभों से वंचित रही हैं। यह विधेयक उसी ऐतिहासिक खाई को पाटने का प्रयास है।
किन लाभों तक खुलेगा रास्ता
उपमुख्यमंत्री ने बताया कि महिला किसान प्रमाण पत्र मिलने के बाद लाखों महिलाओं को निम्नलिखित सुविधाएँ सुलभ होंगी:
सरकारी कृषि योजनाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों तक पहुँच, फसल बीमा, संस्थागत ऋण, बाज़ार पहुँच, कौशल विकास और उद्यमिता के अवसर — ये सभी अब उन महिलाओं के लिए भी उपलब्ध होंगे जो ज़मीन की मालकिन नहीं हैं, लेकिन खेत की असली कामगार हैं।
संस्थागत ढाँचा: सिर्फ घोषणा नहीं, क्रियान्वयन का रोडमैप
विधेयक को केवल कागज़ी दस्तावेज़ बनने से रोकने के लिए एक सुदृढ़ संस्थागत तंत्र स्थापित किया जाएगा। इसमें शामिल हैं: एक समर्पित महिला किसान डेटाबेस, एक महिला किसान सशक्तिकरण प्रकोष्ठ, विशेष सहायता अधिकारी, एक राज्य स्तरीय निगरानी समिति और एक समर्पित महिला किसान कोष।
यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन नीतिगत मान्यता का अभाव एक पुरानी समस्या रही है।
भूमि कानूनों में कोई बदलाव नहीं: सुनेत्रा पवार का स्पष्टीकरण
सुनेत्रा पवार ने सदन में संभावित आशंकाओं को दूर करते हुए स्पष्ट किया कि यह विधेयक किसी भी मौजूदा भूमि स्वामित्व, उत्तराधिकार या वसीयत कानूनों में कोई परिवर्तन, संशोधन या हस्तक्षेप नहीं करता। इसका एकमात्र उद्देश्य कृषि में महिलाओं के योगदान को कानूनी और संस्थागत मान्यता प्रदान करना है।
एक किसान परिवार की बेटी के रूप में अपनी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए उन्होंने खेती की कठिनाइयों और ग्रामीण जीवन के अपने प्रत्यक्ष अनुभव को साझा किया, जिसने इस विधेयक के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को और गहरा बनाया।
आगे क्या होगा
विधानसभा में बहस के बाद विधेयक के पारित होने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। यदि यह कानून बनता है, तो महाराष्ट्र देश में एक नज़ीर स्थापित करेगा जिसे अन्य राज्य अपनाने पर विचार कर सकते हैं। आलोचकों का कहना है कि क्रियान्वयन की वास्तविक परीक्षा डेटाबेस निर्माण और प्रमाण पत्र वितरण की गति से तय होगी।