महाराष्ट्र महिला किसान सशक्तिकरण अधिनियम 2026 पेश, भूमिहीन महिलाओं को भी मिलेगी किसान की मान्यता
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र सरकार ने 1 जुलाई 2026 को विधानसभा में 'महाराष्ट्र महिला किसान सशक्तिकरण अधिनियम, 2026' (कृषि विधेयक संख्या 148, वर्ष 2026) का मसौदा प्रस्तुत किया — एक ऐसा कदम जो दशकों से कृषि व्यवस्था में उपेक्षित रही महिला श्रमिकों को पहली बार औपचारिक कानूनी पहचान देने का वादा करता है। राज्य के कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे द्वारा सदन में रखे गए इस विधेयक में महिला किसानों के लिए समर्पित कल्याण कोष, प्रमाण पत्र प्रणाली और निगरानी तंत्र का प्रावधान किया गया है।
मुख्य घटनाक्रम
विधेयक में 'किसान' की परिभाषा को व्यापक रूप से पुनर्परिभाषित किया गया है। अब महाराष्ट्र की कोई भी महिला निवासी जो व्यक्तिगत या संयुक्त रूप से मुख्य कृषि गतिविधियों में भाग लेती है — चाहे वह फसल उत्पादन हो, मुर्गी पालन, डेयरी, मत्स्य पालन, रेशम उत्पादन, कृषि-वानिकी, जलवायु-अनुकूल खेती या कच्चे कृषि उत्पादों का मूल्यवर्धन — वह इस कानून के अंतर्गत 'किसान' मानी जाएगी।
विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि भूमिहीन श्रमिक, संविदात्मक किरायेदार, भूमिहीन पशुपालक, बागान श्रमिक और प्रति वर्ष कम से कम एक मौसम के लिए कृषि कार्य में लगी महिलाएं — चाहे वे मौसमी पलायन करती हों या नहीं — सभी इस परिभाषा में शामिल होंगी।
औपचारिक मान्यता और प्रमाण पत्र
विधेयक में 'महिला किसान प्रमाण पत्र' जारी करने का प्रावधान है, जो पात्र महिलाओं को सरकारी योजनाओं, ऋण सुविधाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों तक पहुँच सुनिश्चित करेगा। यह ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण महिला श्रमिक दशकों से कृषि विस्तार सेवाओं और संस्थागत ऋण से वंचित रही हैं, क्योंकि भूमि स्वामित्व उनके नाम पर नहीं होता।
महाराष्ट्र राज्य कोष का गठन
विधायी वादों को वित्तीय आधार देने के लिए विधेयक में महिला किसानों के लिए महाराष्ट्र राज्य कोष की स्थापना अनिवार्य की गई है। यह कोष तीन स्रोतों से पूंजी प्राप्त करेगा — राज्य की समेकित निधि, केंद्र सरकार के अनुदान और सार्वजनिक या निजी दान। कानूनी रूप से यह निधि केवल महिला किसानों के लिए कल्याणकारी कार्यक्रमों, ऋण विस्तार, विशेष डेटाबेस निर्माण और प्रशिक्षण ढाँचे के सुदृढ़ीकरण पर खर्च की जा सकेगी।
जवाबदेही तंत्र
विधेयक में महिला किसान सशक्तिकरण प्रकोष्ठ और राज्य निगरानी समिति के गठन का भी प्रावधान है, जो योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करेगी। गौरतलब है कि भारत में महिला किसानों की पहचान और कल्याण को लेकर यह राज्य-स्तरीय विधायी प्रयास अपनी तरह का एक उल्लेखनीय कदम है।
आगे क्या
विधेयक अभी मसौदे के रूप में प्रस्तुत किया गया है और इसे विधानसभा की मंजूरी मिलना बाकी है। यदि यह पारित होता है, तो महाराष्ट्र महिला किसानों को व्यापक कानूनी मान्यता देने वाले अग्रणी राज्यों में शामिल हो जाएगा — और यह कदम अन्य राज्यों के लिए भी एक नीतिगत मिसाल बन सकता है।