दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: महिला का पहनावा यौन उत्पीड़न का औचित्य नहीं, साजिद अली दोषी करार
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाई कोर्ट ने 10 अगस्त 2026 को यौन उत्पीड़न के एक मामले में साजिद अली को दोषी ठहराते हुए स्पष्ट किया कि किसी महिला के कपड़ों का चुनाव उसकी निजी स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है और इसे किसी भी गैर-कानूनी कृत्य का बहाना, औचित्य या क्षमायाचना के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने निचली अदालत द्वारा अली को बरी किए जाने के फैसले के विरुद्ध दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह निर्णय सुनाया।
मामले का घटनाक्रम
यह मामला उन आरोपों से संबंधित था जिनमें साजिद अली पर एक युवती का बार-बार पीछा करने, अभद्र यौन टिप्पणियाँ करने और उसे अनुचित तरीके से स्पर्श करने के आरोप लगाए गए थे। निचली अदालत ने अली को बरी कर दिया था, जिसके बाद पीड़िता की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की गई।
सबूतों की विस्तृत जाँच के बाद अदालत ने पाया कि बिना सहमति के शारीरिक संपर्क और पीछा करने (स्टॉकिंग) के संबंध में पीड़िता का बयान एकसमान और विश्वसनीय था। अदालत ने माना कि अली द्वारा किया गया अनुचित स्पर्श और की गई टिप्पणियाँ दंडनीय अपराध हैं।
पहनावे पर बचाव पक्ष के तर्कों की कड़ी भर्त्सना
बचाव पक्ष ने जिरह के दौरान पीड़िता के कपड़ों — जिसमें जींस और टॉप पहनना भी शामिल था — को कथित अपराध से जोड़ने का प्रयास किया। पीड़िता ने स्वीकार किया था कि वह सामान्यतः 'जींस और टॉप' पहनती है और इलाके के कुछ लोगों ने उसके पहनावे पर आपत्ति जताई थी।
जस्टिस सुधा ने इस पूरी जिरह को 'पूर्णतः अप्रासंगिक और अनुचित' करार दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह के सवालों का एकमात्र उद्देश्य महिला को शर्मिंदा करना, उसे अपमानित करना और उसके चरित्र पर नैतिक आक्षेप लगाना था।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई लड़की या महिला क्या पहनती है, यह सर्वथा उसकी निजी पसंद है — न उसके पड़ोसियों को, न समाज को, न आरोपी को और न ही अदालत में उपस्थित किसी वकील को इस विषय में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार है।
धर्म और रीति-रिवाजों का हवाला खारिज
बचाव पक्ष के वकील ने यह तर्क भी प्रस्तुत किया था कि हर इलाके की अपनी परंपराएँ और रीति-रिवाज होते हैं जिनका पालन वहाँ के निवासियों को करना होता है। जस्टिस सुधा ने इस दलील को 'पूर्णतः अस्वीकार्य' बताया।
अदालत ने कहा कि गैर-कानूनी व्यवहार को उचित ठहराने या किसी महिला की निजी पसंद पर पाबंदी लगाने के लिए न तो धर्म का और न ही स्थानीय रीति-रिवाजों का सहारा लिया जा सकता। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में महिलाओं के पहनावे को लेकर सामाजिक दबाव और उत्पीड़न के मामले बढ़ते जा रहे हैं।
स्थानीय शिकायत और 'बिगाड़ने' के तर्क पर टिप्पणी
अदालत ने उस कथित शिकायत का भी उल्लेख किया जो साजिद अली और स्थानीय निवासियों द्वारा पीड़िता के विरुद्ध दर्ज कराई गई थी। रिपोर्टों के अनुसार, इस शिकायत में पीड़िता के किसी पुरुष परिजन के बिना अपनी माँ के साथ रहने, 'आपत्तिजनक कपड़े' पहनने और इलाके के युवा लड़कों को कथित तौर पर 'बिगाड़ने' पर आपत्ति जताई गई थी।
जस्टिस सुधा ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं मिला जिसके तहत महिला के रहन-सहन के तरीके या उसके पहनावे को पुलिस कार्रवाई के योग्य अपराध माना जा सके। अदालत ने यह भी कहा कि सही दृष्टिकोण यह है कि बच्चों को अपना व्यवहार नियंत्रित करना, दूसरों की व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करना और सबके साथ सम्मानजनक व्यवहार करना सिखाया जाए — न कि यह निर्धारित किया जाए कि लड़कियाँ और महिलाएँ क्या पहनें।
आगे की कार्यवाही
अदालत ने निर्देश दिया कि किसी महिला के पहनावे, चरित्र, जीवनशैली, धर्म या निजी पसंद से संबंधित प्रश्न तब तक नहीं पूछे जाने चाहिए, जब तक कि वे मामले के किसी सीधे प्रासंगिक मुद्दे के लिए अनिवार्य न हों। साजिद अली को सज़ा के प्रश्न पर सुनवाई के लिए बुधवार को हाई कोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है। गौरतलब है कि यह फैसला न्यायिक इतिहास में पीड़िता के पहनावे को आधार बनाकर बचाव की कोशिशों के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण मिसाल के रूप में दर्ज होगा।