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मैथिलीशरण गुप्त जयंती: द्विवेदी की डांट से मिली दिशा, 'भारत-भारती' बनी स्वतंत्रता संग्राम की आवाज़

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मैथिलीशरण गुप्त जयंती: द्विवेदी की डांट से मिली दिशा, 'भारत-भारती' बनी स्वतंत्रता संग्राम की आवाज़

सारांश

एक शृंगारिक कवि से राष्ट्रकवि तक का सफर — आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की कड़ी फटकार ने मैथिलीशरण गुप्त की कलम की दिशा बदल दी। 1912 में 'भारत-भारती' ने स्वतंत्रता सेनानियों को एक अघोषित घोषणापत्र दिया और महात्मा गांधी ने उन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि से नवाज़ा।

मुख्य बातें

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 को चिरगांव, झांसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की फटकार ने उन्हें शृंगारिक काव्य से खड़ी बोली की राष्ट्रवादी कविता की ओर मोड़ा।
1912 में प्रकाशित 'भारत-भारती' स्वतंत्रता संग्राम में सेनानियों का अघोषित घोषणापत्र बनी; महात्मा गांधी ने 1936 के आसपास उन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि दी।
महाकाव्य 'साकेत' ( 1931 ) के लिए 1937 में 'मंगलाप्रसाद पारितोषिक' और 1954 में पद्म भूषण से सम्मानित।
3 अप्रैल 1952 से 2 अप्रैल 1964 तक राज्यसभा सदस्य रहे; 12 दिसंबर 1964 को निधन।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 को उत्तर प्रदेश के झांसी के निकट चिरगांव में हुआ था। उनके माता-पिता ने उन्हें 'मिथिलाधिप नंदनशरण' नाम दिया था, किंतु यह नाम इतना विस्तृत था कि विद्यालय के उपस्थिति रजिस्टर में समाना संभव न हुआ। विवशता में शिक्षक ने इसे संक्षिप्त कर 'मैथिलीशरण' कर दिया, और धनाढ्य गहोई वैश्य परिवार से होने के कारण 'गुप्त' उपनाम स्वाभाविक रूप से जुड़ गया।

बचपन और साहित्यिक संस्कार

विद्यालयी शिक्षा में रुचि न होने के कारण उनके पिता सेठ रामचरण ने घर पर ही संस्कृत, अंग्रेजी और बंगाली भाषाओं के अध्ययन की व्यवस्था की। कविता के संस्कार उन्हें अपने पिता से विरासत में मिले, जो स्वयं 'कनकलता' उपनाम से काव्य-रचना करते थे। बचपन में 'स्वर्णलता' और किशोरावस्था में 'रसिकेश' तथा 'रसिकेंदु' जैसे उपनामों से वे शृंगारिक कविताएं लिखा करते थे — ऐसी रचनाएं जिनमें प्रेम, सौंदर्य और नायक-नायिका के मिलन-बिछोह का चित्रण होता है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी की डांट और दिशा-परिवर्तन

उनके साहित्यिक जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्होंने 'रसिक' उपनाम से लिखी अपनी शृंगारिक कविताएं तत्कालीन प्रतिष्ठित पत्रिका 'सरस्वती' के यशस्वी संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को प्रकाशनार्थ भेजीं। द्विवेदी ने न केवल उन कविताओं को छापने से मना किया, बल्कि एक कड़े पत्र में उन्हें यह भी स्पष्ट कर दिया कि ऐसे उथल-पुथल भरे राजनीतिक दौर में शृंगारिक रचनाएं लिखना सर्वथा व्यर्थ है। इस फटकार ने मैथिलीशरण गुप्त को भीतर से बदल दिया — उन्होंने तत्काल 'रसिक' उपनाम त्याग दिया और द्विवेदी के मार्गदर्शन में ब्रजभाषा की पारंपरिक मधुरता छोड़कर खड़ी बोली को अपनाया।

यह ऐसे समय में आया जब अधिकांश कवि ब्रजभाषा के मोहपाश में बंधे थे। गुप्त ने अपने अथक प्रयास से खड़ी बोली को एक परिष्कृत और सशक्त काव्य-भाषा के रूप में स्थापित किया — यह हिंदी साहित्य के इतिहास में एक युगांतरकारी कदम था।

'भारत-भारती' और राष्ट्रीयता की ज्वाला

1912 में प्रकाशित उनकी कालजयी रचना 'भारत-भारती' ने परतंत्र भारतीय जनमानस में राष्ट्रीयता की एक नई ज्वाला धधका दी। इस कृति में देश के गौरवशाली अतीत, पतनशील वर्तमान और आशातीत भविष्य का ऐसा मार्मिक चित्रण था कि यह रातों-रात स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक अघोषित घोषणापत्र बन गई। इसी प्रभाव के कारण महात्मा गांधी ने 1936 के आसपास उन्हें 'राष्ट्रकवि' की ऐतिहासिक उपाधि से विभूषित किया। अंग्रेजी सरकार के दमन से बचने के लिए उन्होंने 'नित्यानंद' और 'भारतीय' जैसे छद्म नामों से भी तीखी राष्ट्रवादी कविताएं लिखीं।

प्रमुख कृतियाँ और साहित्यिक योगदान

1931 में प्रकाशित उनका महाकाव्य 'साकेत' भारतीय महाकाव्य परंपरा में सदैव उपेक्षित रही लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की विरह वेदना और त्याग का मनोवैज्ञानिक चित्रण करता है। इसी रचना के लिए उन्हें 1937 में हिंदी साहित्य सम्मेलन का सर्वोच्च 'मंगलाप्रसाद पारितोषिक' प्रदान किया गया। 1932 में प्रकाशित 'यशोधरा' में उन्होंने महात्मा बुद्ध की पत्नी की मार्मिक स्थिति को काव्य में उकेरा — उपेक्षित स्त्री-पात्रों को केंद्र में लाने की यह परंपरा उनकी साहित्यिक विशिष्टता बन गई।

राज्यसभा सदस्यता और अंतिम वर्ष

मैथिलीशरण गुप्त 3 अप्रैल 1952 से 2 अप्रैल 1964 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। वे सदन में अपनी राय और तत्कालीन समस्याओं पर प्रायः काव्यात्मक रूप में ही अपनी बात रखते थे — एक ऐसी शैली जो उन्हें संसद के इतिहास में अद्वितीय बनाती है। 1954 में साहित्य और शिक्षा में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 12 दिसंबर 1964 को इस महान राष्ट्रकवि ने अंतिम सांस ली। उनकी रचनाएं आज भी हिंदी साहित्य और राष्ट्रीय चेतना की अमर धरोहर हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि साहित्यिक संपादन की भूमिका राष्ट्र-निर्माण में कितनी निर्णायक हो सकती है — द्विवेदी की एक फटकार ने हिंदी काव्य की धारा ही बदल दी। गौरतलब है कि खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में स्थापित करने का श्रेय जितना गुप्त को जाता है, उतना ही उस संपादकीय साहस को भी जाना चाहिए जिसने शृंगार को राष्ट्र-चेतना से बदलने का आग्रह किया। 'भारत-भारती' की प्रासंगिकता आज भी इसलिए बनी हुई है क्योंकि उसने अतीत के गौरव और वर्तमान की जड़ता के बीच के तनाव को बेबाकी से उजागर किया था — एक प्रश्न जो स्वतंत्र भारत में भी अनुत्तरित है।
RashtraPress
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मैथिलीशरण गुप्त को 'राष्ट्रकवि' की उपाधि किसने और कब दी?
महात्मा गांधी ने 1936 के आसपास मैथिलीशरण गुप्त को 'राष्ट्रकवि' की उपाधि से विभूषित किया। यह उपाधि मुख्यतः उनकी कृति 'भारत-भारती' के स्वतंत्रता संग्राम पर पड़े गहरे प्रभाव के कारण दी गई।
'भारत-भारती' क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
'भारत-भारती' मैथिलीशरण गुप्त की 1912 में प्रकाशित कालजयी काव्य-रचना है, जिसमें भारत के गौरवशाली अतीत, पतनशील वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य का चित्रण है। यह रचना परतंत्र भारत में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक अघोषित घोषणापत्र बन गई थी।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने मैथिलीशरण गुप्त के साहित्यिक जीवन को कैसे बदला?
जब गुप्त ने 'रसिक' उपनाम से शृंगारिक कविताएं 'सरस्वती' पत्रिका के संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को भेजीं, तो उन्होंने कड़े पत्र में उन्हें फटकारा और राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में ऐसी रचनाएं लिखना व्यर्थ बताया। इस फटकार के बाद गुप्त ने शृंगार छोड़ा और खड़ी बोली में राष्ट्रवादी काव्य की रचना शुरू की।
मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख कृतियाँ कौन-सी हैं?
उनकी प्रमुख कृतियों में 'भारत-भारती' (1912), महाकाव्य 'साकेत' (1931) और 'यशोधरा' (1932) शामिल हैं। 'साकेत' के लिए उन्हें 1937 में हिंदी साहित्य सम्मेलन का सर्वोच्च 'मंगलाप्रसाद पारितोषिक' मिला।
मैथिलीशरण गुप्त का राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन कैसा था?
वे 3 अप्रैल 1952 से 2 अप्रैल 1964 तक राज्यसभा सदस्य रहे और सदन में अपनी बात प्रायः काव्यात्मक रूप में रखते थे। 1954 में उन्हें साहित्य और शिक्षा में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया और 12 दिसंबर 1964 को उनका निधन हुआ।
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