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तृणमूल कांग्रेस का उत्थान और संकट: 'कट मनी', भ्रष्टाचार और गुटबाज़ी में ममता बनर्जी की भूमिका

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तृणमूल कांग्रेस का उत्थान और संकट: 'कट मनी', भ्रष्टाचार और गुटबाज़ी में ममता बनर्जी की भूमिका

सारांश

लेफ्ट फ्रंट को हटाने के बाद तृणमूल कांग्रेस से सुशासन की उम्मीद थी — लेकिन 'कट मनी', शिक्षा भर्ती घोटाला, तस्करी के आरोप और ममता-अभिषेक गुटबाज़ी ने पार्टी को भीतर से खोखला कर दिया। अब 71 वर्षीया ममता के सामने सवाल है: क्या वे इस संकट से उबर पाएंगी?

मुख्य बातें

तृणमूल कांग्रेस पर आरोप है कि लेफ्ट फ्रंट हटाने के बाद पार्टी ने सुशासन का वादा पूरा नहीं किया।
जून 2019 में ममता बनर्जी ने स्वयं 'कट मनी' प्रथा की आलोचना की और ₹2,000 की अंतिम संस्कार सहायता में से ₹200 काटने का उदाहरण दिया।
बांग्लादेश सीमा पर तस्करी और शिक्षकों की भर्ती में बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी के आरोपों में वरिष्ठ नेताओं के नाम आए।
पार्टी में ममता बनर्जी बनाम भतीजे अभिषेक बनर्जी के दो गुट बने; वरिष्ठ नेताओं को हाशिए पर धकेलने की खबरें आईं।
राजनीतिक सलाहकार संस्था आईपीएसी (IPAC) के हस्तक्षेप को लेकर स्थानीय नेताओं में नाराज़गी रही।
71 वर्षीया ममता ने स्वीकार किया कि सरकार चलाने में व्यस्तता के कारण संगठन से दूरी बन गई।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) को जिस मक़सद के साथ खड़ा किया था — वामपंथी मोर्चे (लेफ्ट फ्रंट) की दशकों पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंकना — वह मक़सद तो पूरा हो गया, लेकिन उसके बाद जो उम्मीदें बंगाल की जनता ने पाली थीं, वे कथित तौर पर पूरी नहीं हो सकीं। आलोचकों का कहना है कि सत्ता में आने के बाद पार्टी में जो आंतरिक विघटन, भ्रष्टाचार और गुटबाज़ी पनपी, उसकी जवाबदेही अंततः पार्टी प्रमुख के रूप में ममता पर ही आती है।

सत्ता मिलने के बाद टूटा शासन का वादा

वामपंथ-विरोधी लहर पर सवार होकर सत्ता में आई तृणमूल से जनता को सुशासन और कुशल प्रशासन की उम्मीद थी। राज्य की इमारतों पर सफेद और नीले रंग की नई पुताई ने बाहरी रूप-रंग तो बदल दिया, लेकिन आलोचकों के मुताबिक अंदरूनी व्यवस्था नहीं सुधरी। कल्याणकारी योजनाएँ और मुफ़्त सुविधाएँ, जिनका शुरुआत में व्यापक स्वागत हुआ था, कालांतर में तुष्टीकरण की राजनीति का हिस्सा बनती चली गईं — ऐसा विश्लेषकों का मानना है।

गौरतलब है कि पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोप कोई नई बात नहीं थे; विपक्ष, खासकर भारतीय जनता पार्टी (BJP), चुनाव प्रचार के दौरान यह मुद्दे उठाता रहा था। लेकिन तृणमूल की संगठनात्मक ताकत ने इन आरोपों को तब तक दबाए रखा जब तक पार्टी के भीतर से ही दरारें नहीं पड़ने लगीं।

'कट मनी' विवाद और ममता का सार्वजनिक स्वीकारोक्ति

जून 2019 में एक उल्लेखनीय घटनाक्रम में, ममता ने स्वयं कोलकाता में नगर निकाय नेताओं को संबोधित करते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा 'कट मनी' वसूलने की प्रथा की खुलकर आलोचना की और इसे वापस करने का निर्देश दिया। 'कट मनी' वह अनौपचारिक कटौती थी जो कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों, घर बनाने वालों या किसी भी सरकारी सेवा का लाभ उठाने वालों से जबरन ली जाती थी।

ममता ने आरोप लगाया कि कुछ नेता कम आय वाले परिवारों को उनके परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली ₹2,000 की सहायता राशि में से भी ₹200 का 'कट' ले लेते थे। राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बयान को 2020 के नगर निकाय चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी की छवि बचाने की कोशिश के तौर पर देखा।

तस्करी, शिक्षा भर्ती घोटाला और बड़े नेताओं पर आरोप

इसके अतिरिक्त, बांग्लादेश सीमा पर मवेशियों से लेकर कोयले तक की तस्करी के गंभीर आरोप सामने आए। इसके बाद शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी की खबरें भी उजागर हुईं। रिपोर्टों के अनुसार, इन गड़बड़ियों में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के नाम सामने आए, जिससे तृणमूल की विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुँचा।

यह ऐसे समय में आया जब राज्य में शासन की गुणवत्ता को लेकर पहले से ही सवाल उठ रहे थे और सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक कई मामले विचाराधीन थे।

ममता बनाम अभिषेक: पार्टी के भीतर गुटबाज़ी

पार्टी के भीतर दो गुट उभर आए — एक ममता बनर्जी के प्रति वफ़ादार और दूसरा उनके भतीजे व पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी के इर्द-गिर्द। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले रिपोर्टें आईं कि अभिषेक ने सौगत रॉय, सुदीप बंद्योपाध्याय और कल्याण बनर्जी जैसे वरिष्ठ नेताओं को हाशिए पर धकेलने पर जोर दिया था। ये नेता ममता के शुरुआती तृणमूल दिनों से उनके सहयोगी रहे हैं।

युवा बनर्जी के इन कदमों के पीछे एक प्रोफेशनल राजनीतिक सलाहकार समूह — आईपीएसी (IPAC) — का हाथ माना जाता है, जो तब पश्चिम बंगाल में सक्रिय हुआ जब प्रशांत किशोर इसकी अगुवाई कर रहे थे। कोलकाता और अन्य जिलों के कई स्थानीय नेताओं ने आईपीएसी के कथित 'ज़रूरत से ज़्यादा दखल' की शिकायत की, और इसके युवा रिक्रूट्स को 'बाहरी' मानते हुए नाराज़गी जताई।

जिम्मेदारी और आगे की राह

71 वर्षीया ममता के बारे में माना जाता है कि वे अभिषेक को पार्टी की कमान सौंपने की तैयारी में थीं। लेकिन अचानक हुए इन बड़े बदलावों ने पुराने समय की उस जुझारू नेता को असमंजस में डाल दिया। ममता ने स्वयं स्वीकार किया है कि सरकार चलाने में व्यस्त रहने के कारण वे संगठन से कुछ दूर हो गईं और पार्टी के विभिन्न स्तरों के बीच समन्वय नहीं बिठा पाईं।

जनता में यह धारणा बन गई कि वादे तो किए गए, लेकिन उन्हें पूरी तरह निभाया नहीं गया। किसी भी संगठन या सरकार में अंतिम जिम्मेदारी उसके शीर्ष नेता की होती है, और इस लिहाज़ से 'दीदी' आज कड़े सवालों के घेरे में हैं। ब्राज़ीलियाई लेखक पाउलो कोएल्हो की वह उक्ति यहाँ प्रासंगिक लगती है: 'आप नदी में गिरने से नहीं डूबते, बल्कि उसमें डूबे रहने से डूबते हैं।' अब देखना यह होगा कि क्या तृणमूल इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ पाती है या संगठनात्मक टूटन और गहरी होती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि चुनावी नुकसान से बचने की रणनीति अधिक लगी। असली सवाल यह है कि जब पार्टी प्रमुख को पता था कि गड़बड़ी हो रही है, तो संरचनात्मक सुधार क्यों नहीं हुए? अभिषेक बनर्जी-ममता गुटबाज़ी यह भी दर्शाती है कि पारिवारिक उत्तराधिकार की राजनीति लोकतांत्रिक संगठनों को कितनी तेज़ी से कमज़ोर कर सकती है — और मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस संरचनात्मक संकट को व्यक्तित्व-विवाद तक सीमित कर देती है।
RashtraPress
19 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तृणमूल कांग्रेस में 'कट मनी' विवाद क्या है?
'कट मनी' वह अनौपचारिक कटौती थी जो तृणमूल कार्यकर्ता कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों या सरकारी सेवाओं का उपयोग करने वालों से जबरन वसूलते थे। जून 2019 में ममता बनर्जी ने स्वयं इस प्रथा की सार्वजनिक आलोचना की और कार्यकर्ताओं को यह राशि वापस करने का निर्देश दिया।
ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के बीच मतभेद किस बात पर हैं?
रिपोर्टों के अनुसार, अभिषेक बनर्जी ने 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले सौगत रॉय, सुदीप बंद्योपाध्याय और कल्याण बनर्जी जैसे वरिष्ठ नेताओं को हाशिए पर रखने पर जोर दिया। कहा जाता है कि ममता ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाया, जिससे पार्टी में दो गुट बन गए।
आईपीएसी (IPAC) का तृणमूल कांग्रेस से क्या संबंध है?
आईपीएसी एक राजनीतिक सलाहकार संस्था है जो प्रशांत किशोर की अगुवाई में पश्चिम बंगाल में सक्रिय हुई। इसे अभिषेक बनर्जी के कदमों के पीछे प्रमुख प्रभाव माना जाता है, लेकिन स्थानीय नेताओं ने इसके कथित 'ज़रूरत से ज़्यादा दखल' और 'बाहरी' युवा रिक्रूट्स को लेकर नाराज़गी जताई।
तृणमूल कांग्रेस पर शिक्षा भर्ती घोटाले के क्या आरोप हैं?
रिपोर्टों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी हुई और इसमें पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के नाम सामने आए। इस घोटाले ने तृणमूल सरकार की विश्वसनीयता को गंभीर आघात पहुँचाया।
ममता बनर्जी की नेतृत्व क्षमता पर अब सवाल क्यों उठ रहे हैं?
ममता ने खुद स्वीकार किया है कि सरकार चलाने की व्यस्तता में संगठन से दूरी बन गई। 'कट मनी', भ्रष्टाचार के आरोप, पार्टी में गुटबाज़ी और जनता में यह धारणा कि वादे पूरे नहीं हुए — इन सब के लिए अंतिम जिम्मेदारी पार्टी प्रमुख के रूप में उन पर आती है।
राष्ट्र प्रेस
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