तृणमूल कांग्रेस का उत्थान और संकट: 'कट मनी', भ्रष्टाचार और गुटबाज़ी में ममता बनर्जी की भूमिका
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) को जिस मक़सद के साथ खड़ा किया था — वामपंथी मोर्चे (लेफ्ट फ्रंट) की दशकों पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंकना — वह मक़सद तो पूरा हो गया, लेकिन उसके बाद जो उम्मीदें बंगाल की जनता ने पाली थीं, वे कथित तौर पर पूरी नहीं हो सकीं। आलोचकों का कहना है कि सत्ता में आने के बाद पार्टी में जो आंतरिक विघटन, भ्रष्टाचार और गुटबाज़ी पनपी, उसकी जवाबदेही अंततः पार्टी प्रमुख के रूप में ममता पर ही आती है।
सत्ता मिलने के बाद टूटा शासन का वादा
वामपंथ-विरोधी लहर पर सवार होकर सत्ता में आई तृणमूल से जनता को सुशासन और कुशल प्रशासन की उम्मीद थी। राज्य की इमारतों पर सफेद और नीले रंग की नई पुताई ने बाहरी रूप-रंग तो बदल दिया, लेकिन आलोचकों के मुताबिक अंदरूनी व्यवस्था नहीं सुधरी। कल्याणकारी योजनाएँ और मुफ़्त सुविधाएँ, जिनका शुरुआत में व्यापक स्वागत हुआ था, कालांतर में तुष्टीकरण की राजनीति का हिस्सा बनती चली गईं — ऐसा विश्लेषकों का मानना है।
गौरतलब है कि पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोप कोई नई बात नहीं थे; विपक्ष, खासकर भारतीय जनता पार्टी (BJP), चुनाव प्रचार के दौरान यह मुद्दे उठाता रहा था। लेकिन तृणमूल की संगठनात्मक ताकत ने इन आरोपों को तब तक दबाए रखा जब तक पार्टी के भीतर से ही दरारें नहीं पड़ने लगीं।
'कट मनी' विवाद और ममता का सार्वजनिक स्वीकारोक्ति
जून 2019 में एक उल्लेखनीय घटनाक्रम में, ममता ने स्वयं कोलकाता में नगर निकाय नेताओं को संबोधित करते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा 'कट मनी' वसूलने की प्रथा की खुलकर आलोचना की और इसे वापस करने का निर्देश दिया। 'कट मनी' वह अनौपचारिक कटौती थी जो कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों, घर बनाने वालों या किसी भी सरकारी सेवा का लाभ उठाने वालों से जबरन ली जाती थी।
ममता ने आरोप लगाया कि कुछ नेता कम आय वाले परिवारों को उनके परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली ₹2,000 की सहायता राशि में से भी ₹200 का 'कट' ले लेते थे। राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बयान को 2020 के नगर निकाय चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी की छवि बचाने की कोशिश के तौर पर देखा।
तस्करी, शिक्षा भर्ती घोटाला और बड़े नेताओं पर आरोप
इसके अतिरिक्त, बांग्लादेश सीमा पर मवेशियों से लेकर कोयले तक की तस्करी के गंभीर आरोप सामने आए। इसके बाद शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी की खबरें भी उजागर हुईं। रिपोर्टों के अनुसार, इन गड़बड़ियों में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के नाम सामने आए, जिससे तृणमूल की विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुँचा।
यह ऐसे समय में आया जब राज्य में शासन की गुणवत्ता को लेकर पहले से ही सवाल उठ रहे थे और सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक कई मामले विचाराधीन थे।
ममता बनाम अभिषेक: पार्टी के भीतर गुटबाज़ी
पार्टी के भीतर दो गुट उभर आए — एक ममता बनर्जी के प्रति वफ़ादार और दूसरा उनके भतीजे व पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी के इर्द-गिर्द। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले रिपोर्टें आईं कि अभिषेक ने सौगत रॉय, सुदीप बंद्योपाध्याय और कल्याण बनर्जी जैसे वरिष्ठ नेताओं को हाशिए पर धकेलने पर जोर दिया था। ये नेता ममता के शुरुआती तृणमूल दिनों से उनके सहयोगी रहे हैं।
युवा बनर्जी के इन कदमों के पीछे एक प्रोफेशनल राजनीतिक सलाहकार समूह — आईपीएसी (IPAC) — का हाथ माना जाता है, जो तब पश्चिम बंगाल में सक्रिय हुआ जब प्रशांत किशोर इसकी अगुवाई कर रहे थे। कोलकाता और अन्य जिलों के कई स्थानीय नेताओं ने आईपीएसी के कथित 'ज़रूरत से ज़्यादा दखल' की शिकायत की, और इसके युवा रिक्रूट्स को 'बाहरी' मानते हुए नाराज़गी जताई।
जिम्मेदारी और आगे की राह
71 वर्षीया ममता के बारे में माना जाता है कि वे अभिषेक को पार्टी की कमान सौंपने की तैयारी में थीं। लेकिन अचानक हुए इन बड़े बदलावों ने पुराने समय की उस जुझारू नेता को असमंजस में डाल दिया। ममता ने स्वयं स्वीकार किया है कि सरकार चलाने में व्यस्त रहने के कारण वे संगठन से कुछ दूर हो गईं और पार्टी के विभिन्न स्तरों के बीच समन्वय नहीं बिठा पाईं।
जनता में यह धारणा बन गई कि वादे तो किए गए, लेकिन उन्हें पूरी तरह निभाया नहीं गया। किसी भी संगठन या सरकार में अंतिम जिम्मेदारी उसके शीर्ष नेता की होती है, और इस लिहाज़ से 'दीदी' आज कड़े सवालों के घेरे में हैं। ब्राज़ीलियाई लेखक पाउलो कोएल्हो की वह उक्ति यहाँ प्रासंगिक लगती है: 'आप नदी में गिरने से नहीं डूबते, बल्कि उसमें डूबे रहने से डूबते हैं।' अब देखना यह होगा कि क्या तृणमूल इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ पाती है या संगठनात्मक टूटन और गहरी होती है।