18 सितंबर 2026
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मानस राष्ट्रीय उद्यान में 'जंगल की थाली' बचाने की मुहिम: बंगाल फ्लोरिकन और घासभूमि संरक्षण

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मानस राष्ट्रीय उद्यान में 'जंगल की थाली' बचाने की मुहिम: बंगाल फ्लोरिकन और घासभूमि संरक्षण

सारांश

मानस में वन्यजीव बचाने का मतलब अब केवल बाघ-गैंडे गिनना नहीं — यहाँ 'जंगल की थाली' यानी घास, पानी और आवास को बचाने की जमीनी जंग लड़ी जा रही है। 16 घास प्रजातियों की नर्सरी, हर साल 6.5 वर्ग किमी सिकुड़ती घासभूमि और बंगाल फ्लोरिकन को दुधवा भेजने की योजना — यह मॉडल पूरे देश के लिए एक मिसाल बन सकता है।

मुख्य बातें

मानस राष्ट्रीय उद्यान , असम में 16 प्रजातियों की घास की विशेष नर्सरी तैयार की जा रही है जो घासभूमि पुनर्जीवन के लिए पार्क में लगाई जाती है।
वन अधिकारियों के अनुसार मानस में घासभूमि प्रतिवर्ष करीब 6.5 वर्ग किलोमीटर की दर से घट रही है।
दुर्लभ बंगाल फ्लोरिकन के संरक्षण पर विशेष ध्यान; इसे उत्तर प्रदेश के दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में बसाने की योजना भी प्रगति पर है।
मानस भूटान के रॉयल मानस नेशनल पार्क से सटा है, जिससे एक साझा सीमापार पारिस्थितिकी तंत्र बनता है।
असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स की महिला सिपाहियाँ घास नर्सरी की देखरेख और संरक्षण गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

मानस राष्ट्रीय उद्यान, असम में वन्यजीव संरक्षण की कहानी अब केवल बाघों और गैंडों की गिनती तक सीमित नहीं रही। 18 सितंबर 2026 को सामने आई ताज़ा जानकारी के अनुसार, यहाँ के वन विभाग ने एक व्यापक और जमीनी संरक्षण मॉडल अपनाया है — जिसमें घासभूमि, पानी के स्रोत और प्राकृतिक आवास यानी 'जंगल की थाली' को बचाने पर केंद्रित ध्यान दिया जा रहा है। दुर्लभ बंगाल फ्लोरिकन से लेकर हाथी, गैंडे और बाघ तक — पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को एकसाथ संरक्षित करने की यह कवायद मानस को एक अनूठा संरक्षण मॉडल बना रही है।

घासभूमि संरक्षण: 16 प्रजातियों की नर्सरी

वन अधिकारियों के अनुसार मानस में 16 प्रजातियों की विशेष घास की नर्सरी तैयार की जा रही है, जिसमें अलग-अलग प्रजातियों के लिए अलग-अलग प्लॉट बनाए गए हैं। घास तैयार होने के बाद उसे पार्क के उन हिस्सों में लगाया जाता है जहाँ घासभूमि के पुनर्जीवन की ज़रूरत है। यह पहल सीधे शाकाहारी वन्यजीवों — विशेषकर हाथी और गैंडे — के भोजन और प्राकृतिक आवास से जुड़ी है।

यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वन अधिकारियों के अनुसार मानस में घासभूमि का क्षेत्र प्रतिवर्ष करीब 6.5 वर्ग किलोमीटर की दर से घट रहा है। आक्रामक विदेशी वनस्पति प्रजातियों के प्रसार ने प्राकृतिक घास के मैदानों के लिए अतिरिक्त संकट खड़ा किया है। इन्हें नियंत्रित करने के लिए यांत्रिक विधियों का उपयोग किया जा रहा है।

बंगाल फ्लोरिकन: दुर्लभ पक्षी पर विशेष ध्यान

मानस नेशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर युवराज सिंह ढींगरा ने बताया कि मानस की पहचान केवल बड़े वन्यजीवों से नहीं है — दुर्लभ बंगाल फ्लोरिकन भी यहाँ की जैव विविधता का अहम हिस्सा है। इस पक्षी के संरक्षण और उसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

ढींगरा ने यह भी बताया कि बंगाल फ्लोरिकन को उत्तर प्रदेश के दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में बसाने की दिशा में भी प्रयास जारी हैं। यह पहल दर्शाती है कि संरक्षण का दायरा अब केवल करिश्माई बड़े वन्यजीवों तक नहीं, बल्कि उन दुर्लभ प्रजातियों तक भी विस्तरित हो चुका है जिनका अस्तित्व विशिष्ट आवास पर निर्भर है।

भारत-भूटान साझा पारिस्थितिकी तंत्र

भारत-भूटान सीमा पर स्थित मानस की भौगोलिक स्थिति इसके संरक्षण को और विशेष बनाती है। यह पार्क भूटान के रॉयल मानस नेशनल पार्क से सटा हुआ है और सीमा के दोनों ओर फैला प्राकृतिक क्षेत्र वन्यजीवों के लिए एक बड़े साझे पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करता है। इसीलिए मानस में संरक्षण की कोशिशें केवल पार्क की प्रशासनिक सीमाओं तक सीमित नहीं मानी जातीं।

पार्क का नाम इसके बीच से बहने वाली मानस नदी पर रखा गया है। नदियों, घने जंगलों और विस्तृत घासभूमियों का यह अनूठा संयोजन मानस के समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ है। गौरतलब है कि मानस नाम को हिंदू नाग देवी मनसा से भी जोड़ा जाता है — प्राकृतिक विरासत और सांस्कृतिक मान्यता का यह मेल इस पार्क को एक अलग पहचान देता है।

महिला वन सुरक्षा बल की सक्रिय भूमिका

मानस के भ्रमण के दौरान असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स की महिला सिपाहियों की उल्लेखनीय सक्रियता सामने आई। उन्होंने मीडिया प्रतिनिधिमंडल को घास की नर्सरी के अलग-अलग प्लॉट, उनकी देखरेख और जंगल में इनके इस्तेमाल की पूरी प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

वन विभाग के अनुसार किसी एक प्रजाति को बचाने के बजाय पूरे प्राकृतिक आवास और उससे जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है — यही वह दृष्टिकोण है जो मानस के संरक्षण मॉडल को भारत के अन्य संरक्षित क्षेत्रों से अलग करता है। आने वाले वर्षों में यह मॉडल देश के दूसरे राष्ट्रीय उद्यानों के लिए एक संदर्भ बन सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मानस राष्ट्रीय उद्यान में 'जंगल की थाली' बचाने की मुहिम क्या है?
यह असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान में चल रहा एक व्यापक संरक्षण अभियान है जिसमें घास, पानी और प्राकृतिक आवास — यानी जंगल की 'थाली' — को बचाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके तहत 16 प्रजातियों की घास की नर्सरी तैयार की जा रही है और घासभूमि के सिकुड़ते क्षेत्र को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है।
मानस में घासभूमि क्यों सिकुड़ रही है और इसे कैसे रोका जा रहा है?
वन अधिकारियों के अनुसार मानस में घासभूमि प्रतिवर्ष करीब 6.5 वर्ग किलोमीटर की दर से घट रही है, जिसका मुख्य कारण आक्रामक विदेशी वनस्पति प्रजातियों का प्रसार है। इसे नियंत्रित करने के लिए यांत्रिक विधियाँ अपनाई जा रही हैं और 16 प्रजातियों की घास की नर्सरी से पुनर्जीवन की कोशिश की जा रही है।
बंगाल फ्लोरिकन क्या है और मानस में इसके संरक्षण के लिए क्या किया जा रहा है?
बंगाल फ्लोरिकन एक दुर्लभ पक्षी है जो मानस राष्ट्रीय उद्यान की जैव विविधता का अहम हिस्सा है। इसके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा के साथ-साथ इसे उत्तर प्रदेश के दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में बसाने की योजना पर भी काम जारी है।
मानस राष्ट्रीय उद्यान की भौगोलिक विशेषता क्या है जो इसे संरक्षण के लिहाज से खास बनाती है?
मानस राष्ट्रीय उद्यान भारत-भूटान सीमा पर स्थित है और भूटान के रॉयल मानस नेशनल पार्क से सटा हुआ है। सीमा के दोनों ओर का यह साझा प्राकृतिक क्षेत्र वन्यजीवों के लिए एक बड़े पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करता है, जिससे संरक्षण प्रयास पार्क की सीमाओं से परे महत्व रखते हैं।
मानस का संरक्षण मॉडल अन्य राष्ट्रीय उद्यानों से किस तरह अलग है?
मानस में किसी एक प्रजाति के बजाय पूरे पारिस्थितिकी तंत्र — घासभूमि, नदियाँ, प्राकृतिक आवास — को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है। यह आवास-केंद्रित दृष्टिकोण बड़े वन्यजीवों के साथ-साथ बंगाल फ्लोरिकन जैसी कम चर्चित दुर्लभ प्रजातियों को भी संरक्षण का हिस्सा बनाता है।
राष्ट्र प्रेस
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