मणिपुर में अवैध वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई: 50.80 करोड़ की संपत्तियां जब्त
सारांश
Key Takeaways
- 50.80 करोड़ रुपए की संपत्तियां अटैच की गई हैं।
- ईडी ने अवैध वित्तीय नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई की है।
- मुख्य आरोपी यांबेम बीरेन और नारेंगबाम समरजीत हैं।
- जांच मणिपुर पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर पर आधारित है।
- मामले में आगे की कार्रवाई की योजना है।
इंफाल, 16 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के इंफाल उप-क्षेत्र कार्यालय ने मणिपुर में चल रहे एक कथित अवैध वित्तीय नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करते हुए 50.80 करोड़ रुपए की संपत्तियों को अस्थायी रूप से अटैच कर लिया है। यह कार्रवाई सलाई ग्रुप ऑफ कंपनीज, स्मार्ट सोसाइटी और उससे जुड़े अन्य संस्थानों से संबंधित है। ईडी ने इस संदर्भ में तीसरा प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी किया है।
ईडी द्वारा अटैच की गई संपत्तियों में बैंक खातों में जमा राशि के साथ-साथ अचल और चल संपत्तियां भी शामिल हैं। इनमें भूमि, इमारतें, राइस मिल, फ्लोर मिल, खाद्य तेल रिफाइनरी, मशरूम प्लांट, एमू फार्म, फिश फार्म और जिम उपकरण जैसी संपत्तियां शामिल हैं। ये सभी संपत्तियां सलाई ग्रुप की विभिन्न कंपनियों के नाम पर पाई गई हैं।
ईडी ने यह जांच मणिपुर पुलिस द्वारा दर्ज एक एफआईआर के आधार पर शुरू की थी, जो इंफाल वेस्ट जिले के लाम्फेल पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी। इस मामले में यांबेम बीरेन और नारेंगबाम समरजीत को आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि इन दोनों ने भारत संघ से मणिपुर को अलग करने जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया, जिसके चलते राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने, राजद्रोह, और विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य फैलाने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने इस मामले में नारेंगबाम समरजीत सिंह, यांबेम बीरेन और अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है। चार्जशीट में यह बताया गया है कि आरोपियों ने सलाई ग्रुप और उसकी सहयोगी संस्था स्मार्ट सोसायटी के माध्यम से लोगों से अवैध तरीके से धन जुटाया। लोगों को 36 प्रतिशत वार्षिक रिटर्न का लालच देकर पैसा जमा कराया गया, जबकि इसके लिए उनके पास कोई वैध लाइसेंस नहीं था। इस धन को सलाई ग्रुप की 19 कंपनियों के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग के लिए घुमाया गया और इसे अलगाववादी गतिविधियों सहित अन्य गैरकानूनी कार्यों में उपयोग किया गया।
जांच में यह भी सामने आया कि सलाई फाइनेंशियल सर्विसेज को बॉम्बे मनी लेंडर्स एक्ट के तहत पंजीकृत किया गया था, लेकिन आरोपियों ने इस पंजीकरण का दुरुपयोग करते हुए सार्वजनिक जमा स्वीकार करना शुरू कर दिया। इस संस्था ने बैंक या एनबीएफसी की तरह काम किया, जबकि इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से कोई अनुमति नहीं ली गई थी। जमा की गई राशि को बाद में विभिन्न खातों के जरिए घुमाया गया।
इस मामले में सीबीआई ने 15 मार्च 2023 को एफआईआर दर्ज की, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी और 420 तथा बैनिंग ऑफ अनरेगुलेटेड डिपॉजिट स्कीम्स एक्ट, 2019 के प्रावधान लगाए गए।
सीबीआई की जांच में पाया गया कि यह पूरा नेटवर्क अवैध पोंजी और मनी सर्कुलेशन स्कीम के रूप में कार्य कर रहा था। एजेंसी ने 9 नवंबर 2024 को चार्जशीट नंबर 87/2024 दाखिल की, जिसमें बताया गया कि आरोपियों ने 46.43 करोड़ रुपए से अधिक की राशि जनता से धोखाधड़ी के जरिए जुटाई।
जांच के दौरान, ईडी ने पहले चरण में सलाई मार्ट प्राइवेट लिमिटेड के बैंक खाते में लगभग 11.26 लाख रुपए और सलाई एग्री कंसोर्टियम प्रा. लिमिटेड के खाते में लगभग 2.32 करोड़ रुपए को अस्थायी रूप से अटैच किया था, जिन्हें बाद में एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी ने भी मंजूरी दी। इसके बाद, ईडी ने पीएमएलए की विशेष अदालत, इंफाल ईस्ट में अभियोजन शिकायत भी दायर की।
आगे की जांच में यह पता चला कि अपराध से अर्जित धन का उपयोग व्यावसायिक खर्च, संपत्ति खरीद, और निदेशकों की विदेश यात्राओं में किया गया। ईडी ने 28 अचल संपत्तियों और 5 चल संपत्तियों की पहचान की है, जो सलाई ग्रुप, स्मार्ट सोसाइटी और उससे जुड़े संस्थानों के नाम पर थीं और कथित तौर पर अपराध की आय से खरीदी गई थीं। इन सभी संपत्तियों का कुल मूल्य 50.80 करोड़ रुपए है। ईडी के अनुसार, अब तक सलाई ग्रुप और उससे जुड़े संस्थानों की कुल 53.22 करोड़ रुपए की संपत्तियां अस्थायी रूप से अटैच की जा चुकी हैं। एजेंसी ने कहा है कि मामले में आगे की जांच जारी है और भविष्य में और भी कार्रवाई की जा सकती है।