असम सरकार के वेतन-कटौती फैसलों पर मौलाना साजिद कासमी बोले — 'स्वागतयोग्य और सराहनीय कदम'
सारांश
मुख्य बातें
जमीयत उलेमा शामली के अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती मोहम्मद साजिद कासमी ने असम सरकार के दो महत्वपूर्ण फैसलों का खुलकर समर्थन किया है — पहला, माता-पिता की देखभाल न करने वाले सरकारी कर्मचारियों के वेतन से 10 प्रतिशत कटौती का नियम, और दूसरा, पहली पत्नी को कानूनी तलाक दिए बिना दूसरी शादी करने पर 20 प्रतिशत वेतन काटने का प्रावधान। शामली से बोलते हुए मौलाना ने कहा कि ये दोनों कदम समाज में पारिवारिक मूल्यों की रक्षा के लिए ज़रूरी हैं।
माता-पिता की देखभाल पर वेतन-कटौती नियम
असम सरकार ने नियम लागू किया है कि जो सरकारी कर्मचारी अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करेंगे, उनके वेतन से 10 प्रतिशत राशि सीधे उनके माता-पिता के बैंक खाते में भेजी जाएगी। मौलाना साजिद कासमी ने इस फैसले पर कहा, 'मुझे लगता है कि यह बहुत अच्छा कदम है। अब तक हमने देखा है कि कई लोग अपने माता-पिता को बुढ़ापे में वृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं। उनके पास कोई रिश्तेदार या वारिस नहीं बचता। जब आखिरी वक्त आता है तो अंतिम संस्कार में भी बच्चे ज़्यादातर शरीक नहीं होते। यह बेअदबी का मामला है।'
उनका मानना है कि इस प्रावधान से बुजुर्ग माता-पिता को आर्थिक सुरक्षा मिलेगी और उनकी उपेक्षा की घटनाओं पर अंकुश लगेगा। गौरतलब है कि बुजुर्गों की देखभाल को लेकर भारत में कानूनी ढाँचा पहले से मौजूद है, लेकिन सरकारी कर्मचारियों के वेतन से सीधी कटौती का यह प्रावधान अपनी तरह का विशेष कदम माना जा रहा है।
बिना तलाक दूसरी शादी पर वेतन-कटौती का प्रावधान
असम सरकार ने यह भी घोषणा की है कि जो सरकारी कर्मचारी पहली पत्नी को कानूनी रूप से तलाक दिए बिना दूसरी शादी करेंगे, उनके वेतन से 20 प्रतिशत की कटौती की जाएगी। मौलाना कासमी ने इस संदर्भ में कहा, 'सनातन धर्म में, अगर कोई पहले से शादीशुदा है, तो दूसरी शादी का कोई प्रावधान नहीं है।' उन्होंने मुख्यमंत्री के इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा, 'अगर फिर भी कोई शादी करता है तो मुख्यमंत्री का यह कदम बहुत अच्छा है।'
पारिवारिक मूल्यों की रक्षा पर ज़ोर
मौलाना साजिद कासमी ने व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में कहा कि समाज में बुजुर्गों की उपेक्षा और पारिवारिक मूल्यों का ह्रास एक गंभीर समस्या बन चुकी है। उनके अनुसार, असम सरकार के ये दोनों फैसले इस दिशा में ठोस प्रशासनिक हस्तक्षेप हैं — एक जो बुजुर्गों को आर्थिक सुरक्षा देता है, और दूसरा जो विवाह संस्था की मर्यादा को कानूनी बल प्रदान करता है।
आगे क्या
असम सरकार के इन दोनों प्रावधानों के क्रियान्वयन की विस्तृत रूपरेखा अभी सामने आनी बाकी है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन नियमों को व्यवहार में किस प्रकार लागू किया जाता है और अन्य राज्य इससे क्या सबक लेते हैं।