युवा धर्म संसद में मोहन भागवत: 'अहंकार में व्यक्ति सोचता है सब उसके काबू में, पर ऐसा नहीं होता'
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 18 सितंबर 2026 को उज्जैन में आयोजित छठी युवा धर्म संसद में जेन-जी पीढ़ी के युवाओं को संबोधित करते हुए सनातन संस्कृति, कर्तव्य-बोध और सामाजिक समरसता पर गहन विचार साझा किए। उन्होंने अहंकार, धर्म और जीवन के नियमों पर चर्चा करते हुए युवाओं से आग्रह किया कि वे धर्म को केवल बुढ़ापे की चीज़ न समझें।
अहंकार और नियंत्रण का भ्रम
भागवत ने कहा कि जब कोई व्यक्ति अहंकारवश यह मान लेता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है और सब कुछ उसकी इच्छानुसार होना चाहिए, तो वह एक गहरी गलतफहमी में जीने लगता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसा कभी नहीं होता — प्रकृति के नियम किसी की इच्छा पर नहीं, बल्कि अपनी अनिवार्यता पर चलते हैं।
उन्होंने सूर्य का उदाहरण देते हुए कहा, 'सूरज है और आप इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते। अगर आप इसमें विश्वास नहीं करते, तो यह आपकी मर्जी है — लेकिन उसका उगना और डूबना निश्चित रूप से जारी रहेगा।' यह बात उन्होंने धर्म की सार्वभौमिकता को समझाने के लिए कही।
धर्म — बुढ़ापे की नहीं, सृष्टि की शुरुआत से अंत तक की बात
भागवत ने इस प्रचलित धारणा पर प्रहार किया कि गीता और रामायण रिटायरमेंट के बाद पढ़ने की किताबें हैं। उन्होंने कहा कि धर्म सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर उसके अंत तक व्याप्त है और सब कुछ उसी के अनुसार संचालित होता है — चाहे कोई उसमें विश्वास रखे या न रखे।
उन्होंने कहा, 'मेरे लिए, मेरा धर्म मेरे जन्म से तय होता है और मेरी मृत्यु तक जारी रहता है, क्योंकि धर्म सभी सुखों का कारण है।' साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि 'धर्म एक ऐसी कल्पना है कि उसका अन्वेषण करने में पूरा जन्म चला जाए, फिर भी समझ में न आए।'
महाभारत, गीता और कर्तव्य का उपदेश
भागवत ने बताया कि महाभारत जैसा विशाल इतिहास इसीलिए रचा गया ताकि लोग धर्म को समझ सकें। उन्होंने कहा कि महाभारत के अंत में पाँच श्लोकों का समूह — जिसे 'भारत सावित्री' कहा जाता है — पूरे महाभारत का सार है। इसमें कर्तव्य, कर्म और काम का उपदेश है।
युधिष्ठिर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने सब कुछ खो दिया, लेकिन कभी धर्म नहीं छोड़ा — यह जीवन के संघर्षों में धर्म की अडिगता का प्रतीक है।
धर्म का व्यावहारिक अर्थ — स्वभाव और कर्तव्य
भागवत ने धर्म को परिभाषित करते हुए कहा कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव और वस्तु का स्वभाव-आधारित कर्तव्य है। उन्होंने मराठी माध्यम की अपनी कक्षा 10 की भौतिकी की किताब 'सामान्य वस्तु धर्म' का संदर्भ दिया, जहाँ 'प्रॉपर्टी' शब्द का मराठी अनुवाद 'धर्म' था — इससे उन्होंने बताया कि बहना पानी का धर्म है और जलना आग का।
उन्होंने कहा, 'धर्म प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक जीव का स्वभाव ध्यान में रखकर उसके कर्तव्य का निर्धारण करता है।' उनके अनुसार धर्म समाज को जोड़ता है, विभाजित नहीं करता।
युवाओं से आह्वान — सोचें, चर्चा करें, खुले मन से समझें
भागवत ने युवाओं से कहा, 'मैं आपसे यह नहीं कह रहा कि आप अपने दिमाग को खाली कर दें ताकि मैं उन्हें अपने विचारों से भर सकूँ। यह ज्ञान मेरा नहीं है। अगर हम धर्म को समझना चाहते हैं, तो पहले उन कुछ विचारों से खुद को मुक्त करना होगा जो पहले से हमारे मन में बैठे हैं।'
उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं को धर्म को पूरी तरह स्वीकार करने की तत्काल आवश्यकता नहीं है — बस इस पर सोचें, चर्चा करें, और खुले मन से अन्वेषण करें। यह छठी युवा धर्म संसद उस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण मंच साबित हो रही है।