मुसलमानों के पास विकल्प नहीं, मजबूरी में देते हैं कांग्रेस को वोट: पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब
सारांश
मुख्य बातें
पूर्व राज्यसभा सदस्य मोहम्मद अदीब ने 15 मई 2026 को नई दिल्ली में एक विशेष बातचीत में कहा कि देश के बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच मुस्लिम समुदाय के पास कोई वास्तविक राजनीतिक विकल्प नहीं बचा है, इसलिए वे मजबूरी में कांग्रेस को वोट देते हैं। उनके अनुसार, सभी प्रमुख राजनीतिक दल बहुसंख्यक वोट बैंक को साधने में व्यस्त हैं और अल्पसंख्यकों के वोट को हल्के में लिया जा रहा है।
अल्पसंख्यकों की राजनीतिक स्थिति
अदीब ने कहा कि हर राजनीतिक पार्टी की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि हिंदू वोट बैंक उनसे न छिटके। इस होड़ में मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक उपेक्षा हो रही है। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को कुछ दलों का महज़ वोट बैंक बनाकर रख दिया गया है, जहाँ उनकी वास्तविक समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता।
पूर्व सांसद ने यह भी कहा कि मुस्लिम समुदाय ने अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं के साथ खुद को जोड़ने की कोशिश की, लेकिन बार-बार उन्हें ठगा हुआ और नज़रअंदाज़ किया हुआ महसूस हुआ।
ओवैसी के उभार पर विश्लेषण
मोहम्मद अदीब ने कहा कि असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं का उभार केवल अल्पसंख्यक अधिकारों की लड़ाई के कारण नहीं है, बल्कि इसकी एक बड़ी वजह समुदाय का मुख्यधारा के राजनीतिक दलों और नेतृत्व से मोहभंग होना भी है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब विपक्षी खेमे में मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर बहस तेज़ हो रही है।
चुनावी राजनीति और सांप्रदायिक माहौल
उन्होंने कहा कि हाल के पाँच राज्यों के चुनाव और उनका प्रचार नफ़रत और पहचान की राजनीति के माहौल में हुए। तमिलनाडु चुनाव में सनातन धर्म को 'खत्म करने' जैसे बयानों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि चुनावी राजनीति धर्म और आस्था के इर्द-गिर्द सिमट रही है। उन्होंने चुनावों के दौरान सांप्रदायिक माहौल और भड़काऊ बयानबाज़ी कम करने की अपील की।
बहिष्कार नहीं, एकजुटता ज़रूरी
जब पूछा गया कि क्या मुस्लिम समुदाय को चुनावों का बहिष्कार करना चाहिए, तो अदीब ने स्पष्ट कहा कि यह कोई सही विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन तभी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को प्रभावी चुनौती दे सकता है, जब कांग्रेस और उसके सहयोगी दल आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट होकर चुनाव लड़ें।
न्यायपालिका और पुलिस व्यवस्था पर चिंता
पूर्व सांसद ने भारतीय मुसलमानों की स्थिति की तुलना म्यांमार या गाज़ा के मुसलमानों से सीधे तौर पर नहीं की, लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि 'क्या हम उस दिशा में बढ़ रहे हैं?' उन्होंने कहा, 'शायद अभी नहीं, लेकिन अगर अदालतें इसी तरह चुप रहीं और पुलिस व्यवस्था में नफ़रत बनी रही तो स्थिति और खराब हो सकती है।' यह टिप्पणी उन्होंने अपनी व्यक्तिगत आशंका के रूप में व्यक्त की, न कि किसी तथ्यात्मक तुलना के रूप में।