यौन अपराधों में एकरूपता और लैंगिक संवेदनशीलता जरूरी: NCW अध्यक्ष विजया रहाटकर
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने 17 अक्टूबर 2026 को महिलाओं के विरुद्ध यौन अपराधों से जुड़े न्यायिक फैसलों में लैंगिक संवेदनशीलता, एकरूपता और करुणा की अनिवार्यता पर जोर दिया। उन्होंने दो उच्च न्यायालयों के उन फैसलों का हवाला दिया जिनमें, उनके अनुसार, अपराधों की गंभीरता को कमतर आँका गया प्रतीत होता है। रहाटकर ने स्पष्ट किया कि न्याय की भाषा और तर्क को प्रत्येक पीड़िता की गरिमा को अक्षुण्ण रखना चाहिए।
मुख्य घटनाक्रम
NCW अध्यक्ष ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक पोस्ट के माध्यम से दो उच्च न्यायालयी आदेशों का विवरण साझा किया। इन मामलों में न्यायालयों ने आरोपियों के कृत्यों की व्याख्या कम गंभीर दंड प्रावधानों के अंतर्गत की और उन्हें 'दुष्कर्म के प्रयास' के लिए दोषी ठहराने की याचिकाओं को अस्वीकार कर दिया।
पहला मामला पटना उच्च न्यायालय का मोहम्मद ऐनुल हक बनाम बिहार राज्य था। उस आदेश में कहा गया कि देर रात सो रही विधवा के घर में प्रवेश करना, दीपक बुझाना और मुँह दबाना आईपीसी की धारा 354 (लज्जा भंग) के तहत अपराध स्थापित करने के लिए पर्याप्त था, किंतु कपड़े उतारने या प्रवेश की दिशा में किसी कृत्य के साक्ष्य के अभाव में यह दुष्कर्म का प्रयास (धारा 376 सहित धारा 511) नहीं माना जा सकता।
दूसरा मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय का था, जिसमें पीड़िता के कपड़े खींचने के कृत्य का उल्लेख था। इस आदेश पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की थी।
NCW का पक्ष और माँग
रहाटकर ने कहा, 'न्याय कानून और साक्ष्य द्वारा निर्देशित होना चाहिए, जबकि इसकी भाषा और तर्क प्रत्येक पीड़ित की गरिमा को बनाए रखना चाहिए। न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास मजबूत करने के लिए लैंगिक संवेदनशीलता से न्याय करना आवश्यक है।'
उन्होंने आगे कहा, 'राष्ट्रीय महिला आयोग मानता है कि प्रत्येक मामले का फैसला उसके तथ्यों, परिस्थितियों, साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर होना चाहिए। साथ ही, ये फैसले यौन अपराधों में 'तैयारी' और 'प्रयास' के बीच कानूनी अंतर को लागू करने में स्पष्टता और एकरूपता के महत्व को उजागर करते हैं।'
न्यायिक हैंडबुक का संदर्भ
NCW प्रमुख ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी द्वारा प्रकाशित हैंडबुक 'Judgments and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments' का उल्लेख किया। इस पुस्तिका में निहित प्रमुख सिद्धांतों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने तीन बिंदुओं पर विशेष ज़ोर दिया।
पहला — पीड़ितों द्वारा अनुभव किए गए आघात के संदर्भ में साक्ष्य की व्याख्या की जाए। दूसरा — ऐसी भाषा से परहेज किया जाए जो पीड़िता को रूढ़िबद्ध करे, कलंकित करे या उसकी गरिमा को कमतर आँके। तीसरा — यौन अपराधों को शारीरिक स्वायत्तता, व्यक्तिगत गरिमा और व्यक्तिगत अधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा जाए, न कि पवित्रता, पारिवारिक सम्मान या नैतिकता की पुरानी धारणाओं के चश्मे से।
आम जनता और पीड़िताओं पर असर
रहाटकर ने स्पष्ट किया कि यौन हिंसा की पीड़िताओं के साथ न्यायिक प्रक्रिया में सम्मान और करुणा का व्यवहार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायिक टिप्पणियों या भाषा में ऐसा कोई संकेत नहीं होना चाहिए जिससे यह प्रतीत हो कि अपराध के लिए पीड़िता स्वयं किसी रूप में जिम्मेदार है।
गौरतलब है कि यह माँग ऐसे समय में आई है जब देश में यौन अपराध मामलों में न्यायिक भाषा और फैसलों की एकरूपता को लेकर बहस तेज हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय का स्वतः संज्ञान इस मुद्दे की संवैधानिक गंभीरता को रेखांकित करता है।
क्या होगा आगे
NCW की इस पहल के बाद न्यायिक प्रशिक्षण में लैंगिक संवेदनशीलता को अनिवार्य बनाने की माँग और तेज होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि 'तैयारी' और 'प्रयास' के बीच कानूनी अंतर की स्पष्ट व्याख्या के लिए उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप निर्णायक साबित हो सकता है।