हिंदी दिवस 2026: नीलोत्पल मृणाल बोले — 'भाषा नई न हो तो मर जाती है, उर्दू-अंग्रेजी से हिंदी समृद्ध हो रही है'
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी दिवस के अवसर पर 14 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में जाने-माने लेखक और कवि नीलोत्पल मृणाल ने हिंदी भाषा की बदलती प्रकृति, क्लासिक साहित्य की परिभाषा और उर्दू-अंग्रेजी के समावेश पर विस्तार से अपने विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो भाषा समय के साथ नई नहीं होती, वह धीरे-धीरे मृत हो जाती है।
क्लासिक साहित्य की परिभाषा
नीलोत्पल मृणाल ने क्लासिक और आधुनिक हिंदी साहित्य के बीच के अंतर को सरल शब्दों में स्पष्ट किया। उनके अनुसार, 'जो भी आज लिखा जा रहा है, 40-50 वर्ष बाद यही क्लासिक हो जाएगा। जब 30 वर्ष पहले क्लासिक लिखा गया था, तब वह एक नई रचना थी।' उन्होंने कहा कि 'जो किताब 30-50 वर्ष लगातार पाठकों के बीच लोकप्रिय बनी रहेगी, आगे जाकर यही क्लासिक हो जाएगी — किसी भी नई किताब के साथ क्लासिक की घोषणा अपने समय पर नहीं की जाती।'
उन्होंने अपनी चर्चित किताब 'डॉर्क हॉर्स' का उदाहरण देते हुए कहा कि यह किताब 12 वर्ष पहले आई थी, लेकिन आज इसके बिकने की गति कई गुना बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि '30 वर्ष बाद कोई दूसरा बोलेगा कि ये किताब क्लासिक थी या नहीं।'
उर्दू और अंग्रेजी से हिंदी की समृद्धि
हिंदी में उर्दू और अंग्रेजी शब्दों के समावेश पर व्यक्त की जाने वाली चिंताओं पर मृणाल ने कहा कि इस विषय पर उनकी सहानुभूति तो है, 'लेकिन सच यह है कि इससे भाषा समृद्ध हो रही है।' उनके अनुसार, 'कभी भी उर्दू से अलग कोई हिंदी बोली नहीं गई है, न ही वैसे उपन्यास लिखे गए हैं।' उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषाई शुद्धता के नाम पर जिस हिंदी की चर्चा होती है, उसमें भी उर्दू, फारसी और देसी बोलियों का समावेश है।
अंग्रेजी के समावेश को लेकर उन्होंने कहा, 'हिंदी भाषा में अंग्रेजी का समावेश होना आज के समय की आवश्यकता है — हर किसी के जीवन में अंग्रेजी घुल-मिल गई है।' उनका मत था कि 'शब्दावलियों के अनुवाद में फंसने से बेहतर है कि दुनिया के साथ कदम मिलाते हुए नए आविष्कार करें — हम नया आविष्कार करके जो भी नामकरण करेंगे, दुनिया उसी नाम से बुलाएगी।'
हिंदी की पहचान: तीन कसौटियाँ
मृणाल ने कहा कि किसी भी भाषा की पहचान इस बात से होती है कि 'उस भाषा में एक गरिमापूर्ण आजीविका, एक निष्ठापूर्ण जीवन और एक गौरवपूर्ण भावना है या नहीं।' उनके अनुसार हिंदी को इन तीन कसौटियों पर कसा जाना चाहिए। उन्होंने हिंदी को पिछड़ा मानने की प्रवृत्ति को 'सांस्कृतिक मानसिकता' करार दिया — ऐसे लोगों की मानसिकता जो अंग्रेजी को श्रेष्ठता का प्रतीक मानते हैं। उन्होंने कहा कि वे जैसे लोग प्रतिदिन इस भावना के सामने खड़े होकर यह साबित कर रहे हैं कि हिंदी आजीविका, प्रतिष्ठा और गर्व — तीनों दे रही है।
समाज का बदलाव और साहित्य
नीलोत्पल मृणाल ने कहा कि साहित्य में बदलाव न तो व्याकरण से आता है और न ही लेखकों की इच्छा से — यह समाज के बदलाव का प्रतिबिंब होता है। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज जिस संक्रमण से गुज़र रहा है, उसमें अच्छी और बुरी दोनों तरह की प्रवृत्तियाँ शामिल हैं। बुरी प्रवृत्तियों में उन्होंने परिवारों का टूटना, व्यक्ति का अकेलापन, भीड़ में भी एकाकीपन और विद्यार्थियों-युवाओं के लिए रोज़गार का बढ़ता संघर्ष गिनाए। वहीं, गाँवों में बुनियादी ढाँचे के विकास को उन्होंने सकारात्मक पहलू बताया।
साहित्य में 'गाली' और भाषा का विकास
ओटीटी और फिल्मों में प्रयुक्त भाषा की तुलना साहित्यिक 'गाली' से करने के प्रश्न पर मृणाल ने कहा कि 'गाली हमारे समाजशास्त्रीय परिधि का हिस्सा है — इसे बाहर नहीं रखा जा सकता।' उनके अनुसार, यह देखना ज़रूरी है कि 'कौन सी गाली बाज़ार के उत्पाद के तौर पर इस्तेमाल की गई है और कौन सी गाली समाज का अक्स दिखाने में स्वाभाविक तौर पर आती है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि 'गाली लिखना साहित्य में नियम नहीं होना चाहिए, लेकिन जो सहज है वो आएगा और उस पर कंबल डालकर छिपाना नहीं है।'
अंत में उन्होंने कहा, 'हर युग में भाषा नई होती है, क्योंकि नए युग की नई शब्दावलियाँ और नए मुहावरे आते हैं — यह केवल अंग्रेजी के कारण नहीं होता। किसी भी दौर में भाषा नई होती जाती है। अगर भाषाएँ नई नहीं होंगी तो मर जाएंगी।' हिंदी दिवस के इस संदर्भ में उनके विचार इस सवाल को फिर केंद्र में लाते हैं कि भाषा को संरक्षित करने का अर्थ उसे जड़ बनाना नहीं, बल्कि उसे जीवंत बनाए रखना है।