राम जन्मभूमि ट्रस्ट में फॉरेंसिक ऑडिट की माँग: निर्मोही अखाड़े की याचिका को परमहंस आचार्य का समर्थन
सारांश
मुख्य बातें
निर्मोही अखाड़े ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में कथित चढ़ावा चोरी के आरोपों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की है, जिसमें ट्रस्ट के आय-व्यय का फॉरेंसिक ऑडिट, उसे सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पुनर्गठित करने और रामानंदी परंपरा के अनुसार पूजा-पाठ व्यवस्था बहाल करने की माँग की गई है। तपस्वी छावनी के पीठाधीश्वर जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने 19 जुलाई को अयोध्या में इस याचिका का खुलकर समर्थन किया।
याचिका में क्या माँगा गया है
निर्मोही अखाड़े की याचिका में तीन प्रमुख माँगें हैं — पहली, ट्रस्ट के संपूर्ण आय-व्यय का फॉरेंसिक ऑडिट; दूसरी, ट्रस्ट को एक सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पुनर्गठित करना; और तीसरी, मंदिर में रामानंदी परंपरा के अनुसार पूजा-पाठ की व्यवस्था पुनः स्थापित करना। गौरतलब है कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के बाद केंद्र सरकार द्वारा किया गया था।
परमहंस आचार्य का रुख
जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने कहा कि यदि वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े सवाल उठाए गए हैं, तो उनकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ट्रस्ट के पुनर्गठन की स्थिति में संत समाज और सनातन परंपरा से जुड़े लोगों की भावनाओं का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि ट्रस्ट में नए सदस्यों को शामिल करने की प्रक्रिया होती है, तो ऐसे व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिनकी आस्था और पृष्ठभूमि सनातन परंपरा से गहराई से जुड़ी हो। उन्होंने यह भी कहा कि संभावित ट्रस्टियों की सामाजिक और वैचारिक पृष्ठभूमि की भी जाँच की जानी चाहिए।
राजनीतिक संबंधों पर आपत्ति
परमहंस आचार्य ने कहा कि अयोध्या के संत समाज की यह माँग है कि ट्रस्ट में किसी ऐसे व्यक्ति को स्थान नहीं मिलना चाहिए जिसका इंडिया गठबंधन से संबंध हो। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक ताकतें समय-समय पर सनातन परंपराओं को बदनाम करने की कोशिश करती रही हैं।
पारदर्शिता और आस्था की दोहरी माँग
परमहंस आचार्य ने कहा कि राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, इसलिए इससे जुड़े हर निर्णय में पारदर्शिता और धार्मिक परंपराओं का सम्मान अनिवार्य है। उन्होंने ट्रस्टियों के चयन में योग्यता, आस्था और पृष्ठभूमि को विशेष महत्त्व देने पर ज़ोर दिया।
आगे क्या होगा
यह याचिका अब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब राम मंदिर के प्रबंधन और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर धार्मिक और सामाजिक हलकों में व्यापक बहस छिड़ी हुई है। न्यायालय की आगामी सुनवाई यह तय करेगी कि इन माँगों पर आगे किस दिशा में कार्यवाही होती है।