राम मंदिर चंदा गबन विवाद: निर्मोही अखाड़ा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, ट्रस्ट पुनर्गठन व फोरेंसिक ऑडिट की मांग
सारांश
मुख्य बातें
निर्मोही अखाड़ा ने 18 जुलाई 2025 को सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पुनर्गठन, उसके समस्त वित्तीय एवं संपत्ति संबंधी लेनदेन की स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट और मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय से निर्देश माँगे हैं। अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दान और बहुमूल्य वस्तुओं के कथित गबन के आरोपों की पृष्ठभूमि में यह याचिका दायर की गई है। इस मामले से जुड़ी कुछ याचिकाओं पर विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच की मांग को लेकर 20 जुलाई को सुनवाई प्रस्तावित है।
याचिका में क्या कहा गया
निर्मोही अखाड़े ने अपनी याचिका में दलील दी है कि 2019 में सर्वोच्च न्यायालय की पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने अयोध्या भूमि विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट गठित करने का निर्देश दिया था। अखाड़े का कथित तौर पर आरोप है कि उस फैसले की भावना के अनुरूप ट्रस्ट का गठन और संचालन नहीं किया गया है। अखाड़े ने माँग की है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को एक सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पुनर्गठित किया जाए।
याचिका में यह भी कहा गया है कि ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े के लिए निर्धारित प्रतिनिधित्व उसकी परंपरा और नियमों के अनुसार नहीं दिया गया। अखाड़े ने महंत दिनेंद्र दास के नामांकन पर भी सवाल उठाते हुए कहा है कि उनका चयन निर्धारित प्रक्रिया के तहत नहीं हुआ।
कथित चंदा गबन और एसआईटी जांच
निर्मोही अखाड़े ने हाल ही में सामने आए उन आरोपों का भी उल्लेख किया है, जिनमें मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दान और बहुमूल्य वस्तुओं के कथित गबन की बात कही गई है। अखाड़े के अनुसार, इन आरोपों की जांच के लिए राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन किया है। ऐसे में ट्रस्ट के वित्तीय रिकॉर्ड और संपत्तियों की विस्तृत फोरेंसिक जांच भी आवश्यक बताई गई है।
गौरतलब है कि यह मामला ऐसे समय में सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा है जब मंदिर प्रबंधन की पारदर्शिता को लेकर सार्वजनिक बहस पहले से तेज़ है। आलोचकों का कहना है कि देश के सबसे चर्चित धार्मिक स्थलों में से एक के वित्तीय प्रबंधन में जवाबदेही का अभाव चिंताजनक है।
मूर्ति स्थापना पर आपत्ति
अखाड़े ने गर्भगृह में मूर्ति स्थापना के मुद्दे पर भी आपत्ति दर्ज कराई है। उसका कहना है कि नई मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा से मूल विवाद की स्थिति बदल गई है। इसलिए 1950 और 1982 से स्थापित मूल विग्रहों को पुनः गर्भगृह में प्रतिष्ठित करने का निर्देश दिया जाए।
अखाड़े का स्पष्टीकरण
निर्मोही अखाड़े ने स्पष्ट किया है कि वह 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले को चुनौती नहीं दे रहा। उसका उद्देश्य केवल उस फैसले के सही क्रियान्वयन, ट्रस्ट की जवाबदेही, पारदर्शिता और मंदिर प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर न्यायालय से आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त करना है।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय में 20 जुलाई को इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई होनी है, जिसमें एसआईटी जांच की माँग प्रमुख मुद्दा होगी। न्यायालय का रुख यह तय करेगा कि ट्रस्ट के वित्तीय मामलों की स्वतंत्र जांच का रास्ता खुलता है या नहीं। यह सुनवाई राम मंदिर प्रशासन की दिशा के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।