एसआईआर पर रोक की माँग: 23 विपक्षी दलों ने सीजेआई सूर्यकांत को लिखा पत्र, चुनावी हेरफेर का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
देश के 23 प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं ने 28 जून 2025 को भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों को एक संयुक्त पत्र लिखकर चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की माँग की है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया के कारण लाखों वास्तविक मतदाता — विशेषकर दलित, आदिवासी, गरीब और अल्पसंख्यक वर्ग — मताधिकार से वंचित हो रहे हैं, जिससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मूल अवधारणा खतरे में पड़ गई है।
पत्र के प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता
इस पत्र पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के अलावा तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के तिरुचि शिवा, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले, नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी. राजा और माकपा सांसद जॉन ब्रिटास सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं ने हस्ताक्षर किए हैं।
इनके अतिरिक्त आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद संजय सिंह, झारखंड मुक्ति मोर्चा के सरफराज अहमद, भाकपा (माले) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सैयद सादिक अली शिहाब थंगल, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, एमडीएमके प्रमुख वाइको, वीसीके नेता थोल तिरुमावलवन और आरएसपी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन भी हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल हैं।
एसआईआर पर मुख्य आपत्तियाँ
विपक्ष की सबसे बड़ी आपत्ति चुनाव आयोग (ECI) द्वारा संचालित स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर है। पत्र में इसे 'स्वभाव से ही बहिष्करणकारी और राजनीतिक रूप से प्रेरित' बताया गया है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में आवश्यक दस्तावेज़ों की अनिवार्यता के चलते गरीब, अशिक्षित, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय के लाखों वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं।
पत्र में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों का विशेष उल्लेख करते हुए दावा किया गया कि 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' श्रेणी के तहत 27 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए, जिससे वे मतदान नहीं कर सके। यह ऐसे समय में आया है जब देश में मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर पहले से ही बहस जारी है।
न्यायिक ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों का हवाला
विपक्ष ने अपने दावों के समर्थन में न्यायिक ट्रिब्यूनलों के निष्कर्षों का भी उल्लेख किया। पत्र के अनुसार, न्यायमूर्ति टी.एस. शिवगणनम की अध्यक्षता वाले 19 ट्रिब्यूनलों में से एक ने 1,777 अपीलों की सुनवाई के दौरान पाया कि 1,717 मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए थे — अर्थात लगभग 96 प्रतिशत नामों को अनुचित रूप से सूची से बाहर किया गया था। गौरतलब है कि यह आँकड़ा विपक्ष के पत्र में उद्धृत है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि अपेक्षित है।
ईवीएम और केंद्रीय एजेंसियों पर भी सवाल
विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूची के अलावा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर भी चिंता जताई और बैलेट पेपर प्रणाली पर व्यापक सार्वजनिक चर्चा की माँग की। पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI), प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) का व्यवस्थित रूप से विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने और चुनावी माहौल को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
पत्र में नेताओं ने कहा, 'जब संस्थाएँ स्वयं दमन का साधन बन जाएँ और सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाने लगें, तब हमारे लोकतंत्र का भविष्य गंभीर खतरे में पड़ जाता है।' उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का 'अंतिम संरक्षक' बताते हुए न्यायपालिका से हस्तक्षेप की अपील की।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय की ओर से इस पत्र पर अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। चुनाव आयोग ने भी विपक्ष के आरोपों पर अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से नहीं रखा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय इस पत्र को संज्ञान में लेता है, तो एसआईआर प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा की संभावना बन सकती है।