दलेर मेहंदी जन्मदिन विशेष: डकैत के नाम से पहचान, भांगड़ा को दिलाई वैश्विक पहचान
सारांश
मुख्य बातें
गायक दलेर मेहंदी आज 18 अगस्त 2026 को अपना 59वाँ जन्मदिन मना रहे हैं। भांगड़ा संगीत को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाने वाले इस फ़नकार का असली नाम दलेर सिंह है, और उनके नाम के पीछे एक अनोखी कहानी है जो उनके माता-पिता की फिल्मी दीवानगी से जुड़ी है।
जन्म और परिवार
दलेर मेहंदी का जन्म 18 अगस्त 1967 को बिहार की राजधानी पटना में एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। उनके पिता अजमेर सिंह चंदन एक प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायक थे, जबकि माता बलबीर कौर राज्य-स्तरीय पहलवान थीं। दलेर कुल पाँच भाई-बहनों में से एक हैं। उनके छोटे भाई मीका सिंह भी बॉलीवुड के जाने-माने गायक हैं।
घर में संगीत का वातावरण होने के कारण दलेर ने बचपन से ही शास्त्रीय संगीत और गुरबानी का अभ्यास शुरू कर दिया था। परिवार की यही विरासत आगे चलकर उनकी पहचान बनी।
नाम के पीछे की अनोखी कहानी
दलेर मेहंदी के नाम की कहानी बेहद दिलचस्प है। उनके माता-पिता ने उनका नाम एक फिल्म के डकैत किरदार 'डाकू दलेर सिंह' से प्रेरित होकर रखा था। बाद में जब दलेर संगीत की दुनिया में कदम रखा, तो वे प्रसिद्ध संगीतकार परवेज मेहंदी की गायकी से गहरे प्रभावित हुए और उन्होंने अपने नाम के साथ 'मेहंदी' उपनाम जोड़ लिया — इस तरह 'दलेर सिंह' दुनिया के लिए 'दलेर मेहंदी' बन गए।
करियर का टर्निंग पॉइंट
दलेर मेहंदी कम उम्र से ही गायकी में सक्रिय रहे, लेकिन उनके करियर में असली छलाँग वर्ष 1995 में आई, जब उनका पहला पॉप एल्बम 'बोलो ता रा रा...' रिलीज़ हुआ। यह एल्बम ब्लॉकबस्टर साबित हुआ और देश-विदेश में उनकी पहचान स्थापित की।
इसके बाद 'तुनक तुनक तुन', 'हो जाएगी बल्ले बल्ले', 'ढोल बाजे', 'रंग दे बसंती', 'जीयो रे बाहुबली', 'कुड़ियां शहर दियां' और 'जोर का झटका' जैसे गानों ने उन्हें भांगड़ा का वैश्विक ब्रांड बना दिया। यह ऐसे समय में आया जब भारतीय पॉप संगीत अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बना रहा था।
निजी जीवन
दलेर मेहंदी की पत्नी का नाम तरणप्रीत कौर है और दोनों के चार बच्चे हैं। उनकी बेटी अजीत कौर मेहंदी का विवाह प्रसिद्ध पंजाबी गायक हंसराज हंस के बेटे नवराज हंस से हुआ है, जिससे दो संगीतप्रेमी परिवारों का मिलन हुआ।
विरासत और आज का दौर
दलेर मेहंदी के गाने आज भी हर उम्र के श्रोताओं को थिरकने पर मजबूर कर देते हैं। भांगड़ा को मुख्यधारा के बॉलीवुड और अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले जाने में उनका योगदान अतुलनीय माना जाता है। उनकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि लोक संगीत की जड़ें जितनी गहरी हों, उसकी पहुँच उतनी ही व्यापक होती है।