रोजगार से बनेगी महिला सशक्त, पैसे बांटना नहीं है हल: सीपीआई(एम) नेता हन्नान मोल्लाह
सारांश
मुख्य बातें
सीपीआई(एम) के पूर्व सांसद हन्नान मोल्लाह ने 26 अगस्त को कई राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय सामने रखी — जिसमें समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की प्रस्तावित महिला नकद सहायता योजना, दिल्ली लक्ष्मी योजना, इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हिजाब संबंधी फैसला, वंदे मातरम विवाद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पंजीकरण का सवाल शामिल रहे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चुनावी नकद वितरण की राजनीति महिला सशक्तिकरण का विकल्प नहीं है — असली ताकत रोजगार और उत्पादन प्रक्रिया से जुड़ने में है।
अखिलेश की ₹40,000 वार्षिक योजना पर सवाल
अखिलेश यादव ने वादा किया है कि 2027 में सरकार बनने पर हर महिला को प्रतिवर्ष ₹40,000 दिए जाएंगे। इस पर मोल्लाह ने कहा कि चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दलों की ओर से ऐसी घोषणाओं की बाढ़ आ जाती है, लेकिन अक्सर यह स्पष्ट नहीं होता कि धनराशि कहाँ से आएगी और उसका स्थायी स्रोत क्या होगा। उनके अनुसार, 'महिलाओं को वास्तव में सशक्त बनाना है, तो उन्हें उत्पादन प्रक्रिया और रोजगार से जोड़ना चाहिए — जब महिला अपने श्रम से आय अर्जित करेगी, तभी उसे सम्मान और आत्मनिर्भरता मिलेगी।'
उन्होंने जोर देकर कहा कि महिलाओं, युवाओं और जरूरतमंद नागरिकों को ऐसी आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा जाना चाहिए जिनसे उनकी नियमित आय सुनिश्चित हो। यह दृष्टिकोण नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाता है, न कि सरकारी सहायता पर निर्भर।
दिल्ली लक्ष्मी योजना और चुनावी वादों की पारदर्शिता
दिल्ली सरकार की लक्ष्मी योजना — जिसके तहत पात्र महिलाओं को प्रति माह ₹2,500 की सहायता का प्रावधान है — पर भी मोल्लाह ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि चुनाव से पहले की जाने वाली घोषणाओं में पात्रता और शर्तों की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। बाद में जब योजना लागू होती है, तब शर्तें जोड़ दी जाती हैं और बड़ी संख्या में लोग लाभ से बाहर हो जाते हैं। उन्होंने इसे जनता को भ्रमित करने वाली राजनीति करार दिया।
इसी संदर्भ में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने ₹15 लाख वाले चुनावी वादे का भी उल्लेख किया और आरोप लगाया कि इस तरह के अधूरे वादे जनता के भरोसे को कमजोर करते हैं।
हिजाब फैसला और संवैधानिक अधिकार
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के हिजाब संबंधी फैसले पर असदुद्दीन ओवैसी की टिप्पणी के संदर्भ में मोल्लाह ने कहा कि धार्मिक आस्था रखने वाले लोग धर्म से जुड़े मामलों पर अपनी बात रखते रहेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार देता है और अदालतों को इसी संवैधानिक दायरे में रहकर फैसले करने चाहिए। उनके अनुसार, यदि किसी न्यायिक फैसले में सांप्रदायिक दृष्टिकोण दिखाई देता है तो वह देश की एकता और सामाजिक सद्भाव के लिए उचित नहीं होगा।
वंदे मातरम और RSS पंजीकरण पर रुख
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के वंदे मातरम संबंधी बयान पर मोल्लाह ने समर्थन जताया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम का संबंध देश के स्वतंत्रता आंदोलन और देशभक्ति की दीर्घकालिक परंपरा से है। उन्होंने उन लोगों पर परोक्ष रूप से निशाना साधा जिन्हें वे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों का समर्थक मानते हैं, यह कहते हुए कि ऐसे लोगों के राष्ट्रवाद पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे के RSS पंजीकरण संबंधी बयान पर मोल्लाह ने कहा कि किसी भी संगठन — चाहे वह छोटा क्लब हो या बड़ी संस्था — के लिए पंजीकरण और वित्तीय जवाबदेही अनिवार्य होनी चाहिए। उन्होंने RSS की सदस्यता और चंदे की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतंत्र में किसी भी संगठन की आय-व्यय व्यवस्था सार्वजनिक जाँच के दायरे में होनी चाहिए।
आगे क्या
मोल्लाह के ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं और विभिन्न दल महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए नकद सहायता योजनाओं की घोषणाएँ कर रहे हैं। उनकी टिप्पणियाँ मुफ्त योजनाओं बनाम रोजगार-केंद्रित नीति की बहस को नई धार देती हैं, जो आने वाले महीनों में राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन सकती है।