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वैद्य मीट्रिक के जनक पीसी वैद्य: जिन्होंने 1942 में एक सप्ताह में हल किया आइंस्टीन का अधूरा सवाल

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वैद्य मीट्रिक के जनक पीसी वैद्य: जिन्होंने 1942 में एक सप्ताह में हल किया आइंस्टीन का अधूरा सवाल

सारांश

जूनागढ़ के एक साधारण गाँव से निकले पीसी वैद्य ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की उथल-पुथल के बीच, मात्र एक सप्ताह में वह गणितीय समीकरण हल कर दिया जिसे दुनिया आज 'वैद्य मीट्रिक' कहती है। साइकिल पर घर लौटने वाले इस कुलपति ने विज्ञान को गाँव-गाँव तक पहुँचाया।

मुख्य बातें

पीसी वैद्य का जन्म 23 मई 1918 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के गाँव शाहपुर में हुआ था।
1942 में 24 वर्ष की आयु में उन्होंने केवल एक सप्ताह में 'वैद्य मीट्रिक' की खोज की, जो आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत की एक बड़ी खामी को दूर करती है।
वे गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति बने और सेवानिवृत्ति पर साइकिल से घर लौटने की सादगी के लिए प्रसिद्ध हुए।
1963 में गुजरात गणित मंडल की स्थापना कर ग्रामीण शिक्षकों तक आधुनिक गणित पहुँचाया।
गुजराती भाषा में गणित की त्रैमासिक पत्रिका 'सुगणितम्' की शुरुआत की, जो आज भी प्रकाशित हो रही है।
उन्हें प्रतिष्ठित श्रीनिवास रामानुजन स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया; 12 मार्च 2010 को उनका निधन हुआ।

प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य — जिन्हें दुनिया पीसी वैद्य के नाम से जानती है — का जन्म 23 मई 1918 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के छोटे से गाँव शाहपुर में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया और 1931 में जब वे मात्र नौवीं कक्षा में थे, तब पिता का देहांत हो गया। इन्हीं विपरीत परिस्थितियों के बीच उन्होंने वह वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की, जो आज भी सापेक्षता सिद्धांत की नींव का हिस्सा है।

शिक्षा और प्रेरणा का सफर

आर्थिक तंगियों से जूझते हुए वैद्य ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और मुंबई के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से गणित और भौतिकी में प्रथम श्रेणी के साथ स्नातक तथा स्नातकोत्तर (एमएससी) की उपाधि प्राप्त की। 1937 में बॉम्बे विश्वविद्यालय में प्रख्यात भौतिकशास्त्री प्रोफेसर विष्णु वासुदेव नार्लीकर — महान खगोलशास्त्री जयंत नार्लीकर के पिता — के व्याख्यान ने युवा प्रहलाद के भीतर एक जिज्ञासा जगाई।

उस समय आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत में एक बड़ी खामी थी: किसी स्थिर पिंड के गुरुत्वाकर्षण को तो मापा जा सकता था, किंतु लगातार प्रकाश और ऊर्जा का विकिरण करने वाले चमकते तारे के बाहरी गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को गणितीय रूप से परिभाषित करना उस दौर में असंभव माना जाता था।

वैद्य मीट्रिक की ऐतिहासिक खोज

1942 में जब देश में भारत छोड़ो आंदोलन की आँधी चल रही थी और महात्मा गांधी जेल में 21 दिनों के उपवास पर थे, तब 24 वर्षीय वैद्य अपनी ऐतिहासिक काशी यात्राबनारस हिंदू विश्वविद्यालय — पर थे। इसी अशांत वातावरण के बीच उनके दिमाग में दिक्-काल ज्यामिति का एक अद्भुत विचार कौंधा।

वैद्य ने तर्क किया कि चूँकि तारा लगातार प्रकाश का उत्सर्जन कर रहा है, इसलिए उसके आसपास के क्षेत्र को निर्वात नहीं माना जा सकता — वहाँ प्रकाश की गति से चलने वाले कण मौजूद होते हैं। इस भौतिक सत्य को आधार बनाकर उन्होंने केवल एक सप्ताह के भीतर वह गणितीय समीकरण हल कर लिया जिसे आज दुनिया 'वैद्य मीट्रिक' के नाम से जानती है। यह खोज सापेक्षता सिद्धांत के उस रिक्त स्थान को भरती है जिसे दशकों से अनसुलझा माना जाता था।

शोध से समाज तक: ग्रामीण भारत की सेवा

प्रोफेसर वैद्य टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) में होमी जहांगीर भाभा के साथ जुड़े, किंतु महानगरों की चमक-दमक से दूर उन्होंने गुजरात के ग्रामीण अंचल वल्लभ विद्यानगर में पढ़ाना पसंद किया। वे बाद में गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति बने।

कुलपति के रूप में उनकी सादगी की कहानियाँ आज भी प्रचलित हैं। वे कभी सरकारी वाहन का उपयोग निजी काम के लिए नहीं करते थे। जिस दिन वे कुलपति पद से सेवानिवृत्त हुए, उन्होंने दफ्तर की चाबी सौंपी और अपनी पुरानी साइकिल पर सवार होकर घर लौट गए। उनके कार्यालय में सदा एक बड़ा ब्लैकबोर्ड टंगा रहता था — ताकि कोई भी छात्र या शोधकर्ता सीधे आकर गणितीय समीकरणों पर चर्चा कर सके।

गुजरात गणित मंडल और 'सुगणितम्'

प्रोफेसर वैद्य का दृढ़ मत था कि विज्ञान और गणित का लाभ केवल विश्वविद्यालय के कमरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए — यह समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे बच्चे तक पहुँचना चाहिए। इसी विचार से उन्होंने 1963 में गुजरात गणित मंडल की स्थापना की, जिसके सम्मेलन गुजरात के पिछड़े ग्रामीण इलाकों में आयोजित होते थे ताकि प्राथमिक शिक्षकों को आधुनिक गणित का सरल प्रशिक्षण मिल सके।

उन्होंने गुजराती भाषा में गणित की त्रैमासिक पत्रिका 'सुगणितम्' की शुरुआत की, जो आज भी सफलतापूर्वक प्रकाशित हो रही है और बच्चों के मन से गणित का भय दूर करती है। आजीवन गांधीवादी मूल्यों पर चलने वाले पीसी वैद्य को उनके योगदान के लिए प्रतिष्ठित श्रीनिवास रामानुजन स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।

विरासत और विदाई

12 मार्च 2010 को प्रोफेसर पीसी वैद्य इस दुनिया को छोड़ गए। उनकी 'वैद्य मीट्रिक' आज भी ब्लैक होल भौतिकी और सापेक्षता के शोध में एक अपरिहार्य संदर्भ बिंदु है। जूनागढ़ के एक साधारण गाँव से निकले इस वैज्ञानिक की यात्रा यह सिद्ध करती है कि असाधारण खोजें अनुकूल परिस्थितियों की नहीं, दृढ़ जिज्ञासा की मोहताज होती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी रामानुजन या बोस की तुलना में वैद्य का नाम सार्वजनिक चेतना में लगभग अनुपस्थित है। यह विसंगति बताती है कि हम किन वैज्ञानिकों को राष्ट्रीय नायक मानते हैं और किन्हें भुला देते हैं। उनका गाँव-गाँव जाकर प्राथमिक शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का मॉडल आज की 'निपुण भारत' जैसी योजनाओं से दशकों पहले का था — और शायद अधिक प्रभावी भी।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वैद्य मीट्रिक क्या है और इसे किसने खोजा?
वैद्य मीट्रिक एक गणितीय समीकरण है जो चमकते तारे के बाहरी गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को परिभाषित करता है — वह समस्या जिसे आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत में अनसुलझा माना जाता था। इसे भारतीय गणितज्ञ-भौतिकशास्त्री प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य ने 1942 में मात्र एक सप्ताह में हल किया था।
पीसी वैद्य का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
पीसी वैद्य का जन्म 23 मई 1918 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के गाँव शाहपुर में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का निधन हो गया और 1931 में नौवीं कक्षा में पिता को खो दिया।
पीसी वैद्य ने गुजरात गणित मंडल की स्थापना क्यों की?
प्रोफेसर वैद्य का मानना था कि गणित का ज्ञान केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसलिए उन्होंने 1963 में गुजरात गणित मंडल की स्थापना की, जिसके सम्मेलन गुजरात के पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित होते थे ताकि प्राथमिक शिक्षकों को आधुनिक गणित का सरल प्रशिक्षण मिल सके।
पीसी वैद्य को कौन-से प्रमुख सम्मान मिले?
प्रोफेसर पीसी वैद्य को प्रतिष्ठित श्रीनिवास रामानुजन स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। उनकी 'वैद्य मीट्रिक' खोज ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय में स्थायी पहचान दिलाई।
पीसी वैद्य का निधन कब हुआ और उनकी विरासत क्या है?
प्रोफेसर पीसी वैद्य का निधन 12 मार्च 2010 को हुआ। उनकी 'वैद्य मीट्रिक' आज भी ब्लैक होल भौतिकी और सापेक्षता शोध में एक अपरिहार्य संदर्भ है, और उनकी 'सुगणितम्' पत्रिका आज भी प्रकाशित होती है।
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