वैद्य मीट्रिक के जनक पीसी वैद्य: जिन्होंने 1942 में एक सप्ताह में हल किया आइंस्टीन का अधूरा सवाल
सारांश
मुख्य बातें
प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य — जिन्हें दुनिया पीसी वैद्य के नाम से जानती है — का जन्म 23 मई 1918 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के छोटे से गाँव शाहपुर में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया और 1931 में जब वे मात्र नौवीं कक्षा में थे, तब पिता का देहांत हो गया। इन्हीं विपरीत परिस्थितियों के बीच उन्होंने वह वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की, जो आज भी सापेक्षता सिद्धांत की नींव का हिस्सा है।
शिक्षा और प्रेरणा का सफर
आर्थिक तंगियों से जूझते हुए वैद्य ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और मुंबई के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से गणित और भौतिकी में प्रथम श्रेणी के साथ स्नातक तथा स्नातकोत्तर (एमएससी) की उपाधि प्राप्त की। 1937 में बॉम्बे विश्वविद्यालय में प्रख्यात भौतिकशास्त्री प्रोफेसर विष्णु वासुदेव नार्लीकर — महान खगोलशास्त्री जयंत नार्लीकर के पिता — के व्याख्यान ने युवा प्रहलाद के भीतर एक जिज्ञासा जगाई।
उस समय आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत में एक बड़ी खामी थी: किसी स्थिर पिंड के गुरुत्वाकर्षण को तो मापा जा सकता था, किंतु लगातार प्रकाश और ऊर्जा का विकिरण करने वाले चमकते तारे के बाहरी गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को गणितीय रूप से परिभाषित करना उस दौर में असंभव माना जाता था।
वैद्य मीट्रिक की ऐतिहासिक खोज
1942 में जब देश में भारत छोड़ो आंदोलन की आँधी चल रही थी और महात्मा गांधी जेल में 21 दिनों के उपवास पर थे, तब 24 वर्षीय वैद्य अपनी ऐतिहासिक काशी यात्रा — बनारस हिंदू विश्वविद्यालय — पर थे। इसी अशांत वातावरण के बीच उनके दिमाग में दिक्-काल ज्यामिति का एक अद्भुत विचार कौंधा।
वैद्य ने तर्क किया कि चूँकि तारा लगातार प्रकाश का उत्सर्जन कर रहा है, इसलिए उसके आसपास के क्षेत्र को निर्वात नहीं माना जा सकता — वहाँ प्रकाश की गति से चलने वाले कण मौजूद होते हैं। इस भौतिक सत्य को आधार बनाकर उन्होंने केवल एक सप्ताह के भीतर वह गणितीय समीकरण हल कर लिया जिसे आज दुनिया 'वैद्य मीट्रिक' के नाम से जानती है। यह खोज सापेक्षता सिद्धांत के उस रिक्त स्थान को भरती है जिसे दशकों से अनसुलझा माना जाता था।
शोध से समाज तक: ग्रामीण भारत की सेवा
प्रोफेसर वैद्य टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) में होमी जहांगीर भाभा के साथ जुड़े, किंतु महानगरों की चमक-दमक से दूर उन्होंने गुजरात के ग्रामीण अंचल वल्लभ विद्यानगर में पढ़ाना पसंद किया। वे बाद में गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति बने।
कुलपति के रूप में उनकी सादगी की कहानियाँ आज भी प्रचलित हैं। वे कभी सरकारी वाहन का उपयोग निजी काम के लिए नहीं करते थे। जिस दिन वे कुलपति पद से सेवानिवृत्त हुए, उन्होंने दफ्तर की चाबी सौंपी और अपनी पुरानी साइकिल पर सवार होकर घर लौट गए। उनके कार्यालय में सदा एक बड़ा ब्लैकबोर्ड टंगा रहता था — ताकि कोई भी छात्र या शोधकर्ता सीधे आकर गणितीय समीकरणों पर चर्चा कर सके।
गुजरात गणित मंडल और 'सुगणितम्'
प्रोफेसर वैद्य का दृढ़ मत था कि विज्ञान और गणित का लाभ केवल विश्वविद्यालय के कमरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए — यह समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे बच्चे तक पहुँचना चाहिए। इसी विचार से उन्होंने 1963 में गुजरात गणित मंडल की स्थापना की, जिसके सम्मेलन गुजरात के पिछड़े ग्रामीण इलाकों में आयोजित होते थे ताकि प्राथमिक शिक्षकों को आधुनिक गणित का सरल प्रशिक्षण मिल सके।
उन्होंने गुजराती भाषा में गणित की त्रैमासिक पत्रिका 'सुगणितम्' की शुरुआत की, जो आज भी सफलतापूर्वक प्रकाशित हो रही है और बच्चों के मन से गणित का भय दूर करती है। आजीवन गांधीवादी मूल्यों पर चलने वाले पीसी वैद्य को उनके योगदान के लिए प्रतिष्ठित श्रीनिवास रामानुजन स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।
विरासत और विदाई
12 मार्च 2010 को प्रोफेसर पीसी वैद्य इस दुनिया को छोड़ गए। उनकी 'वैद्य मीट्रिक' आज भी ब्लैक होल भौतिकी और सापेक्षता के शोध में एक अपरिहार्य संदर्भ बिंदु है। जूनागढ़ के एक साधारण गाँव से निकले इस वैज्ञानिक की यात्रा यह सिद्ध करती है कि असाधारण खोजें अनुकूल परिस्थितियों की नहीं, दृढ़ जिज्ञासा की मोहताज होती हैं।