सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश निलंबित किया, टीवीके विधायक सेतुपति को फ्लोर टेस्ट में भाग लेने की राहत
सारांश
सर्वोच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और विजय बिश्नोई की तीन सदस्यीय पीठ ने सेतुपति द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश को
सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार, 13 मई को तमिलनाडु विधानसभा की किसी भी फ्लोर टेस्ट कार्यवाही में भाग लेने से रोकने वाले मद्रास उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी। इस फैसले से तमिलगा वेट्टी कज़गम (टीवीके) के विधायक आर. सीनिवासा सेतुपति को तत्काल राहत मिली है, जो शिवगंगा जिले की तिरुप्पत्तूर विधानसभा सीट से केवल एक वोट के अंतर से जीते थे। यह मामला तमिलनाडु की राजनीति में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
मामले की पृष्ठभूमि
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा घोषित आधिकारिक परिणामों के अनुसार, सेतुपति को 83,365 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी, तमिलनाडु के पूर्व मंत्री व द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) नेता के. आर. पेरियाकरुप्पन को 83,364 वोट प्राप्त हुए। पेरियाकरुप्पन ने मतगणना प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया और दावा किया कि शिवगंगा जिले के तिरुप्पत्तूर विधानसभा क्षेत्र संख्या 185 के लिए भेजा गया डाक मतपत्र गलती से वेल्लोर के निकट तिरुप्पत्तूर जिले के विधानसभा क्षेत्र संख्या 50 में चला गया और सही निर्वाचन क्षेत्र में वापस भेजने के बजाय वहीं खारिज कर दिया गया।
मद्रास उच्च न्यायालय का रुख
न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी और एन. सेंथिलकुमार की पीठ ने पेरियाकरुप्पन द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए सेतुपति को फ्लोर टेस्ट में भाग लेने से रोकने का अंतरिम निर्देश पारित किया था। उच्च न्यायालय ने इस विवाद को सामान्य चुनावी विवाद नहीं, बल्कि
संपादकीय दृष्टिकोण
सर्वोच्च न्यायालय का आदेश
दोनों पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि प्रतिवादी के अधिवक्ता को दो सप्ताह का समय दिया जाता है ताकि वे अपना जवाब दाखिल कर सकें। इस बीच, विवादित आदेश पर रोक जारी रहेगी और उच्च न्यायालय के समक्ष आगे की कार्यवाही भी स्थगित कर दी गई है। इस प्रकार, सेतुपति अब तमिलनाडु विधानसभा की फ्लोर टेस्ट कार्यवाही में भाग लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
आगे क्या होगा
अब पेरियाकरुप्पन के पास दो सप्ताह के भीतर सर्वोच्च न्यायालय में अपना जवाब दाखिल करने का समय है। विधि विशेषज्ञों के अनुसार, इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ संकेत देती हैं कि चुनावी विवादों में रिट याचिका के माध्यम से उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की प्रवृत्ति पर लगाम लग सकती है। यह मामला भविष्य में चुनावी कानून की व्याख्या के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर बन सकता है।