मन की बात में पीएम मोदी ने लिया नाम, प्रदीप चक्रवर्ती ने जताया हार्दिक आभार

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मन की बात में पीएम मोदी ने लिया नाम, प्रदीप चक्रवर्ती ने जताया हार्दिक आभार

सारांश

त्रिपुरा के बांस उद्यमी प्रदीप चक्रवर्ती को पीएम मोदी ने 'मन की बात' में सराहा। 2008 में शुरू हुए उनके केंद्र में 12 महिलाएं 150 से अधिक बांस उत्पाद बनाती हैं। 2017 में बांस को पेड़ की श्रेणी से हटाने के बाद पूर्वोत्तर में यह उद्योग तेजी से फल-फूल रहा है।

Key Takeaways

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 अप्रैल को 'मन की बात' में दक्षिण त्रिपुरा के बांस उद्यमी प्रदीप चक्रवर्ती की सराहना की।
  • चक्रवर्ती का बांस उत्पाद केंद्र वर्ष 2008 में शुरू हुआ था और अब 150 से अधिक प्रकार के उत्पाद बना रहा है।
  • केंद्र में 12 महिलाएं कार्यरत हैं, जिन्हें ₹6,000 से ₹6,500 प्रतिमाह वेतन मिलता है।
  • केंद्र सरकार ने 2017 में बांस को पेड़ की श्रेणी से बाहर कर उद्यमियों के लिए नए अवसर खोले।
  • त्रिपुरा बांस मिशन ने चक्रवर्ती को मशीनरी प्रदान कर उनके उद्योग को सशक्त बनाया।
  • नागालैंड के दीमापुर सहित पूर्वोत्तर भारत में बांस आधारित उद्योग तेजी से विस्तार पा रहे हैं।

अगरतला, 26 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में रविवार, 26 अप्रैल को दक्षिण त्रिपुरा के बांस उद्यमी प्रदीप चक्रवर्ती की सराहना की गई। इस उल्लेख के बाद चक्रवर्ती ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में प्रधानमंत्री के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इतने बड़े मंच पर उनके छोटे से उद्योग का नाम लिया जाना उनके लिए बड़े सम्मान की बात है।

पीएम मोदी ने मन की बात में क्या कहा

प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात के इस एपिसोड में बांस से जुड़े नियमों में किए गए ऐतिहासिक बदलाव का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2017 में बांस को पेड़ की श्रेणी से बाहर कर दिया था, जिसके सकारात्मक परिणाम आज पूरे देश में देखे जा सकते हैं।

पीएम ने विशेष रूप से दक्षिण त्रिपुरा जिले के प्रदीप चक्रवर्ती और गोमती जिले के बिजॉय सूत्रधार का जिक्र करते हुए कहा कि इन उद्यमियों ने नए कानूनों को अवसर के रूप में पहचाना और अपने काम को आधुनिक तकनीक से जोड़कर बांस के उत्पादों की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि की।

प्रदीप चक्रवर्ती का उद्योग और उसकी यात्रा

प्रदीप चक्रवर्ती ने बताया कि उन्होंने यह बांस उत्पाद केंद्र वर्ष 2008 में शुरू किया था। शुरुआती दिनों में संसाधनों की कमी थी, लेकिन त्रिपुरा बांस मिशन ने उन्हें आवश्यक मशीनरी उपलब्ध कराई, जिससे उनके काम को नई गति मिली।

वर्तमान में यह केंद्र लगभग 150 प्रकार के बांस उत्पाद तैयार करता है, जिनमें बांस के बैग, ज्वेलरी बॉक्स और विभिन्न हस्तशिल्प वस्तुएं शामिल हैं। इस केंद्र पर लगभग 12 महिलाएं कार्यरत हैं, जिन्हें उनके काम के अनुसार ₹6,000 से ₹6,500 प्रतिमाह का मेहनताना दिया जाता है।

चक्रवर्ती ने गर्व के साथ बताया कि यह केंद्र अब मुनाफे में चल रहा है और स्थानीय महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

पूर्वोत्तर में बांस उद्योग का विस्तार

पीएम मोदी ने मन की बात में यह भी रेखांकित किया कि 2017 के कानूनी बदलाव के बाद पूर्वोत्तर भारत में बांस से जुड़े उद्योग तेज रफ्तार से फैल रहे हैं। उन्होंने नागालैंड के दीमापुर और उसके आसपास के इलाकों में सक्रिय स्वयं सहायता समूहों का भी उल्लेख किया, जो बांस से खाद्य उत्पाद बनाकर उनमें मूल्य संवर्धन कर रहे हैं।

इसके अलावा, 'खोरोलो क्रिएटिव क्राफ्ट' जैसी टीमें बांस से फर्नीचर और हैंडीक्राफ्ट उत्पाद तैयार कर रही हैं, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक हैं।

नीतिगत बदलाव का व्यापक प्रभाव

गौरतलब है कि 2017 से पहले बांस को भारतीय वन अधिनियम के तहत पेड़ की श्रेणी में रखा गया था, जिसके कारण इसे काटने और परिवहन के लिए कड़े सरकारी अनुमतियों की जरूरत होती थी। इस प्रतिबंध ने पूर्वोत्तर जैसे बांस-समृद्ध क्षेत्रों में उद्यमिता को बाधित किया था।

केंद्र सरकार द्वारा किए गए इस एकल नीतिगत सुधार ने लाखों ग्रामीण परिवारों, विशेषकर महिलाओं और आदिवासी समुदायों के लिए रोजगार के नए द्वार खोले हैं। भारत विश्व में बांस उत्पादन में दूसरे स्थान पर है और इस क्षेत्र में अरबों रुपये के निर्यात की संभावना मौजूद है।

आने वाले समय में उम्मीद की जा रही है कि सरकार बांस आधारित उद्योगों को और अधिक प्रोत्साहन देगी तथा निर्यात नीति में भी सुधार कर इन उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी।

Point of View

बल्कि यह उस नीतिगत दूरदर्शिता का प्रमाण है जो एक कानूनी बदलाव से पूरे क्षेत्र की आर्थिक तस्वीर पलट सकती है। 2017 में बांस को पेड़ की श्रेणी से हटाना एक साहसिक निर्णय था जिसे उस समय उतनी चर्चा नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी। 'मन की बात' जैसा मंच इन जमीनी सफलताओं को राष्ट्रीय पहचान देता है, लेकिन असली परीक्षा यह है कि क्या सरकार इन उद्यमियों को निर्यात बाजार, बेहतर मशीनरी और कौशल प्रशिक्षण के रूप में ठोस नीतिगत समर्थन देती रहेगी — या यह सराहना सिर्फ रेडियो तक सीमित रहेगी।
NationPress
27/04/2026

Frequently Asked Questions

मन की बात में प्रदीप चक्रवर्ती की तारीफ क्यों की गई?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' में बांस उद्योग की सफलता का उदाहरण देते हुए दक्षिण त्रिपुरा के प्रदीप चक्रवर्ती का नाम लिया। चक्रवर्ती ने 2017 के बाद बांस नीति में बदलाव का फायदा उठाकर अपने उद्योग को नई ऊंचाई पर पहुंचाया।
प्रदीप चक्रवर्ती का बांस उद्योग केंद्र कब और कहां शुरू हुआ?
प्रदीप चक्रवर्ती का बांस उत्पाद केंद्र वर्ष 2008 में दक्षिण त्रिपुरा जिले में शुरू हुआ था। त्रिपुरा बांस मिशन ने उन्हें मशीनरी प्रदान की और अब यह केंद्र 150 से अधिक उत्पाद बनाकर मुनाफे में चल रहा है।
2017 में बांस से जुड़ा कौन सा कानून बदला था?
केंद्र सरकार ने 2017 में भारतीय वन अधिनियम में संशोधन कर बांस को पेड़ की श्रेणी से बाहर किया था। इससे पहले बांस काटने और उसके परिवहन के लिए कड़ी सरकारी अनुमतियां जरूरी होती थीं, जो उद्यमिता में बाधा बनती थीं।
प्रदीप चक्रवर्ती के केंद्र में कितनी महिलाएं काम करती हैं और उन्हें कितना वेतन मिलता है?
प्रदीप चक्रवर्ती के बांस उत्पाद केंद्र में लगभग 12 महिलाएं कार्यरत हैं। उन्हें उनके काम के अनुसार ₹6,000 से ₹6,500 प्रतिमाह का मेहनताना दिया जाता है।
पूर्वोत्तर भारत में बांस उद्योग की क्या स्थिति है?
2017 के नीतिगत बदलाव के बाद पूर्वोत्तर भारत में बांस उद्योग तेजी से विकसित हो रहा है। नागालैंड के दीमापुर में स्वयं सहायता समूह बांस से खाद्य उत्पाद बना रहे हैं, जबकि 'खोरोलो क्रिएटिव क्राफ्ट' जैसी टीमें फर्नीचर और हैंडीक्राफ्ट में काम कर रही हैं।
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