14 सितंबर 2026
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गोविंद देव गिरी महाराज का पुणे में युवाओं को संदेश: आत्मसंयम अपनाएँ, डीजे-मुक्त गणेशोत्सव का करें स्वागत

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गोविंद देव गिरी महाराज का पुणे में युवाओं को संदेश: आत्मसंयम अपनाएँ, डीजे-मुक्त गणेशोत्सव का करें स्वागत

सारांश

संत गोविंद देव गिरी महाराज ने पुणे के भाऊसाहेब रंगारी गणपति मंडल में युवाओं को आत्मसंयम और माता-पिता सम्मान का पाठ पढ़ाया। डीजे के बजाय ढोल-ताशा अपनाने का संकल्प लेने वाले युवाओं की उन्होंने सराहना की और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का आह्वान किया।

मुख्य बातें

संत गोविंद देव गिरी महाराज ने 14 सितंबर 2026 को पुणे के श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी गणपति मंडल में गणपति बप्पा के दर्शन किए।
महाराज ने युवाओं को आत्मसंयम , माता-पिता के सम्मान और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का संदेश दिया।
पुणे के युवाओं द्वारा डीजे-मुक्त गणेशोत्सव का संकल्प लेने पर उन्होंने सराहना और बधाई दी।
महाराज ने ढोल-ताशा और पारंपरिक भारतीय वाद्ययंत्रों को अपनाने की अपील की।
उन्होंने भगवान गणेश के माता-पिता की परिक्रमा के उदाहरण से युवाओं को माता-पिता का सम्मान करने की सीख दी।

संत गोविंद देव गिरी महाराज ने 14 सितंबर 2026 को पुणे के ऐतिहासिक श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी गणपति मंडल में गणपति बप्पा के दर्शन और पूजा-अर्चना की। गणेशोत्सव के इस पावन अवसर पर उन्होंने युवाओं को आत्मसंयम, माता-पिता के सम्मान और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का सशक्त संदेश दिया। साथ ही उन्होंने डीजे-मुक्त गणेशोत्सव के संकल्प की सराहना करते हुए पारंपरिक भारतीय वाद्ययंत्रों को अपनाने की अपील की।

युवाओं को आत्मविजय का आह्वान

गोविंद देव गिरी महाराज ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि युवाओं को देश का निर्माण करना है और भविष्य में नेतृत्व की भूमिका निभानी है, तो सबसे पहले उन्हें आत्मविजय की साधना करनी होगी। उनके अनुसार व्यक्ति को अपने ऊपर नियंत्रण रखना सीखना चाहिए — यह सफल जीवन की पहली शर्त है।

उन्होंने भगवान गणेश के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि गणपति ने अपने माता-पिता की परिक्रमा कर पृथ्वी की परिक्रमा के बराबर पुण्य प्राप्त किया था। उन्होंने युवाओं से यह संकल्प लेने की अपील की कि उनके किसी भी व्यवहार से माता-पिता की आँखों में आँसू न आएँ और उन्हें कभी शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े।

डीजे-मुक्त गणेशोत्सव की सराहना

महाराज ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि पुणे के युवाओं ने इस वर्ष गणेशोत्सव में डीजे के स्थान पर पारंपरिक वाद्ययंत्रों के उपयोग का संकल्प लिया है। इस पहल की उन्होंने भूरि-भूरि प्रशंसा की और युवाओं को बधाई दी।

उन्होंने कहा कि ढोल-ताशा और अन्य भारतीय वाद्ययंत्र मंगल और शुभ अवसरों के प्रतीक हैं तथा हमारी सांस्कृतिक परंपराओं के साथ पूरी तरह सामंजस्य रखते हैं। उनके अनुसार डीजे भारतीय परंपरा और संस्कृति के अनुकूल नहीं है और भारतीय समाज को विदेशी परंपराओं का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए।

पुणे की ऐतिहासिक भूमिका

गोविंद देव गिरी महाराज ने पुणे को पुरुषार्थ और प्रभावी नेतृत्व की भूमि बताया। उन्होंने कहा कि यह शहर समय-समय पर पूरे देश को प्रेरणा देता आया है। गौरतलब है कि श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी गणपति मंडल पुणे के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित गणपति मंडलों में से एक है, जो सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।

भारतीय संस्कृति के संरक्षण पर जोर

महाराज ने युवाओं से अपने आचरण और संस्कारों के माध्यम से समाज को नई दिशा देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि देश के भविष्य के निर्माण की जिम्मेदारी युवाओं के कंधों पर है। यह ऐसे समय में आया है जब गणेशोत्सव के दौरान ध्वनि प्रदूषण और सांस्कृतिक स्वरूप को लेकर देशभर में बहस तेज हो रही है।

पारंपरिक वाद्ययंत्रों को प्रोत्साहन देने की यह अपील युवाओं में सांस्कृतिक जागृति की एक नई लहर का संकेत मानी जा रही है। आने वाले गणेशोत्सव दिनों में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि पुणे के अन्य मंडल भी इस पहल से प्रेरणा लेते हैं या नहीं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो सार्वजनिक गणेशोत्सव की जन्मभूमि है, यदि यह पहल यहाँ जड़ें पकड़ती है तो देश के अन्य शहरों में भी इसका असर दिख सकता है। हालाँकि, यह सवाल भी उठता है कि क्या केवल संतों की अपील से यह बदलाव टिकाऊ होगा, या इसके लिए प्रशासनिक नियमों और सामुदायिक संकल्प दोनों की जरूरत पड़ेगी।
RashtraPress
14 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गोविंद देव गिरी महाराज ने पुणे में युवाओं को क्या संदेश दिया?
उन्होंने युवाओं को आत्मसंयम, माता-पिता का सम्मान और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि देश के निर्माण और नेतृत्व के लिए पहले आत्मविजय आवश्यक है।
डीजे-मुक्त गणेशोत्सव पर महाराज का क्या कहना था?
गोविंद देव गिरी महाराज ने पुणे के युवाओं द्वारा डीजे के बजाय पारंपरिक वाद्ययंत्र अपनाने के संकल्प की सराहना की। उन्होंने कहा कि डीजे भारतीय परंपरा और संस्कृति के अनुकूल नहीं है और ढोल-ताशा जैसे वाद्य शुभ अवसरों के सच्चे प्रतीक हैं।
यह कार्यक्रम कहाँ और कब हुआ?
यह कार्यक्रम 14 सितंबर 2026 को पुणे के श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी गणपति मंडल में गणेशोत्सव के अवसर पर आयोजित हुआ।
महाराज ने भगवान गणेश का उदाहरण क्यों दिया?
उन्होंने बताया कि गणपति ने माता-पिता की परिक्रमा कर पृथ्वी की परिक्रमा के बराबर पुण्य प्राप्त किया था। इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने युवाओं को माता-पिता का सम्मान करने और उन्हें कभी शर्मिंदा न करने का संकल्प लेने की प्रेरणा दी।
पुणे के गणेशोत्सव में पारंपरिक वाद्ययंत्रों को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है?
महाराज के अनुसार भारतीय वाद्ययंत्र जैसे ढोल-ताशा हमारी सांस्कृतिक परंपराओं और मंगल अवसरों के प्रतीक हैं। विदेशी परंपराओं के अंधानुकरण से बचते हुए भारतीय संस्कृति को जीवंत रखने के लिए यह कदम आवश्यक बताया गया।
राष्ट्र प्रेस
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