अखिलेश यादव बने लोहिया ट्रस्ट के अध्यक्ष, शिवपाल यादव को यूपी चुनाव से पहले हटाया
सारांश
मुख्य बातें
समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल यादव को लोहिया ट्रस्ट के अध्यक्ष पद से हटाकर स्वयं यह जिम्मेदारी संभाल ली है। यह बदलाव उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ऐसे समय में हुआ है, जब सपा के भीतर सत्ता-केंद्रीकरण की प्रक्रिया तेज़ होती दिख रही है। पिछले लगभग नौ वर्षों से लोहिया ट्रस्ट की बागडोर शिवपाल यादव के हाथ में थी।
क्या है लोहिया ट्रस्ट और इसका महत्व
लोहिया ट्रस्ट का गठन समाजवादी पार्टी की स्थापना से भी पहले हो चुका था, इसलिए सपा की वैचारिक विरासत में इस ट्रस्ट का विशेष स्थान है। इस ट्रस्ट का मुख्य काम समाजवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना और पार्टी के लिए निधि जुटाना है। सपा से जुड़े नेताओं एवं कार्यकर्ताओं के बीच यह ट्रस्ट हमेशा से एक महत्वपूर्ण संस्था मानी जाती रही है।
मुख्य घटनाक्रम
जानकारी के अनुसार, कुछ दिन पहले हुई ट्रस्ट की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी अखिलेश यादव को सौंपी जाए। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में शिवपाल यादव सहित सभी आठ सदस्यों ने इस फैसले पर सहमति जताई। ट्रस्ट के सदस्यों में अखिलेश यादव, शिवपाल यादव, दीपक मिश्रा, आदित्य यादव, राम नरेश यादव (इटावा), राम सेवक यादव, वीरपाल यादव (बरेली) और राजेश यादव शामिल हैं।
इस बदलाव के साथ ही सपा मुखिया अब लोहिया ट्रस्ट और जनेश्वर ट्रस्ट — दोनों के अध्यक्ष बन गए हैं, जो पार्टी और उससे जुड़ी संस्थाओं पर उनके नियंत्रण को और मज़बूत करता है।
2017 की पारिवारिक कलह की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि 2017 में सपा के भीतर बड़ा पारिवारिक विवाद हुआ था, जब मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच मतभेद सार्वजनिक हो गए थे। उसी दौर में अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच खुली बहस भी देखी गई थी। उसी समय मुलायम सिंह यादव ने ट्रस्ट की जिम्मेदारी प्रोफेसर रामगोपाल यादव से हटाकर शिवपाल यादव को सौंपी थी। अब नौ वर्ष बाद इस ट्रस्ट पर एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन हुआ है, लेकिन इस बार सत्ता शिवपाल से अखिलेश की ओर खिसकी है।
सियासी असर और विशेषज्ञों की राय
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा उस दौर से काफी आगे निकल चुकी है जब पार्टी और परिवार से जुड़ी संस्थाओं में शक्ति के अलग-अलग केंद्र दिखाई देते थे। इस कदम को पार्टी-ढाँचे के केंद्रीकरण की दिशा में एक सुनियोजित कदम के रूप में देखा जा रहा है।
हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले यह फेरबदल अखिलेश-शिवपाल के बीच उभरते मतभेदों का संकेत भी हो सकता है। सपा के लिए यह एक संवेदनशील मोड़ है क्योंकि पार्टी को चुनावी एकता की सबसे अधिक ज़रूरत इसी समय है।
आगे क्या
लोहिया ट्रस्ट की नई अध्यक्षता के साथ अखिलेश यादव अब पार्टी और उससे जुड़ी वैचारिक संस्थाओं दोनों पर मज़बूत पकड़ रखते हैं। राजनीतिक गलियारों में यह देखा जा रहा है कि शिवपाल यादव इस परिवर्तन को किस रूप में स्वीकार करते हैं और क्या चुनाव तक सपा परिवार एकजुट रह पाता है।