पुणे पुलिस हिरासत में मारपीट: मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट पर 13 पुलिसकर्मियों पर FIR
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर पुणे के भारती विद्यापीठ पुलिस थाने के 13 पुलिसकर्मियों के खिलाफ 24 सितंबर 2026 को एफआईआर दर्ज की गई है। इन पर हिरासत में आरोपियों के साथ कथित मारपीट, गैरकानूनी तरीके से रोकने, धमकाने और सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के आरोप हैं। यह शिकायत अपराध अन्वेषण विभाग में तैनात पुलिस उप अधीक्षक संकेत सतिश गोसावी ने दर्ज कराई है।
मुख्य घटनाक्रम
मामले की शुरुआत 5 जुलाई को हुई, जब चार आरोपी दोपहर करीब 3 बजे स्वयं भारती विद्यापीठ पुलिस थाने पहुँचे। शिकायत के अनुसार, उन्हें उसी दिन रात करीब 10.30 बजे औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया। इस बीच के लगभग साढ़े सात घंटों में उनके साथ क्या हुआ, यही इस पूरे मामले की जड़ है।
मानवाधिकार आयोग के समक्ष दर्ज आरोपी दिपक नेटके के बयान के अनुसार, थाने पहुँचने के बाद वह और तीन अन्य आरोपी वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक मानसिंग पाटील तथा अन्य कर्मियों के संपर्क में आए, जहाँ कथित तौर पर उनके हाथ और पैरों पर पट्टे से मारपीट की गई। शुरुआत में चारों को पुलिस उपनिरीक्षक निलेश मोकाशी की हिरासत में रखा गया, बाद में मामले के जाँच अधिकारी पुलिस उपनिरीक्षक आण्णा दराडे को सौंपा गया।
एसआरए कॉलोनी की घटना और वीडियो साक्ष्य
7 जुलाई को शाम करीब 5.30 बजे चारों आरोपियों को लेक टाउन के पास स्थित एसआरए कॉलोनी ले जाया गया। जाँच के दौरान वहाँ हुई घटना से संबंधित दो वीडियो क्लिप सामने आईं। मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, इन वीडियो में आरोपियों को पुलिसकर्मियों द्वारा घुटनों के बल बैठाए जाने और सड़क पर चलने के लिए मजबूर किए जाने का दृश्य दिखता है। इसके अलावा रिपोर्ट में पुलिसकर्मियों द्वारा डंडे और लाठियों से पैरों पर मारपीट का भी उल्लेख है।
गौरतलब है कि आरोपियों को सार्वजनिक रूप से नागरिकों के सामने घुटनों के बल बैठाकर हाथ जोड़कर माफी माँगने के लिए मजबूर किए जाने का आरोप भी रिपोर्ट में दर्ज है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 7 जुलाई को आरोपियों को एसआरए कॉलोनी ले जाने का कोई रिकॉर्ड न थाने की जनरल डायरी में मिला और न ही पुलिस वाहन की लॉगबुक में — यह प्रशासनिक चूक रिपोर्ट में गंभीर रूप से चिह्नित की गई है।
मेडिकल साक्ष्य में विसंगति
मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में मेडिकल जाँच की विसंगतियाँ भी उजागर हुई हैं। कथित मारपीट के बावजूद चारों आरोपियों के मेडिकल प्रमाणपत्रों में चोटों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। हालाँकि, 5 जुलाई के आरोपी सरफराज शेख के अंगझड़ती पंचनामा में उसके दाहिने हाथ की बीच वाली उंगली पर चोट दर्ज थी, जो मेडिकल प्रमाणपत्र में अंकित नहीं की गई थी। यह विसंगति रिपोर्ट में विशेष रूप से रेखांकित है।
आरोपी पुलिसकर्मी और धाराएँ
एफआईआर में वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक मानसिंग पाटील, पुलिस उपनिरीक्षक आण्णा मधुकर दराडे और निलेश राजेंद्र मोकाशी, पुलिस हवलदार सुनील दादा हनवते तथा पुलिसकर्मी सागर चंद्रकांत बोरगे, सोहम कैलास शेंडकर, राहुल अशोक औधकर, मितेश दत्तात्रय चोरमोले, रविंद्र शंकर गायकवाड, संदीप लक्ष्मण आगळे, पुलिस उपनिरीक्षक फकीर और पुलिसकर्मी सुतार एवं पवार को आरोपी बनाया गया है।
इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 115(2), 127(2), 127(3), 131, 352, 351(2), 198 और 199 के तहत मामला दर्ज किया गया है। फिलहाल मामले की आगे की जाँच जारी है।
क्या होगा आगे
मानवाधिकार आयोग के पुलिसकर्मियों के बयानों में भारती विद्यापीठ थाने के कुछ कर्मियों ने घटनास्थल पर मौजूद रहने की बात स्वीकार की और वीडियो में दिखे अधिकारी की पहचान वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक मानसिंग पाटील के रूप में की। यह स्वीकारोक्ति जाँच में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। 6 जुलाई को चारों आरोपियों को प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट नंबर 4, पुणे के समक्ष पेश किया गया था और अदालत ने उन्हें 9 जुलाई तक पुलिस हिरासत में भेजा था। अब जाँच के दायरे में वही अधिकारी आ गए हैं जो उस हिरासत की देखरेख कर रहे थे।