पंजाब में पराली जलाने के 404 मामले दर्ज, तरनतारन-अमृतसर सबसे आगे; ₹3.40 लाख वसूली
सारांश
मुख्य बातें
पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) की 20 अक्टूबर 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में धान की पराली जलाने की कुल 404 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें से 358 खेतों का निरीक्षण पूरा हो चुका है और 151 स्थानों पर पराली जलाने की आधिकारिक पुष्टि हुई है। प्रशासन ने अब तक ₹7.20 लाख का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया है, जिसमें से ₹3.40 लाख की वसूली की जा चुकी है।
ज़िलावार स्थिति: तरनतारन और अमृतसर सबसे प्रभावित
रिपोर्ट के अनुसार, तरनतारन में सर्वाधिक 198 घटनाएं दर्ज हुई हैं। वहाँ 176 खेतों का निरीक्षण किया गया, जिनमें से 75 स्थानों पर पराली जलाने की पुष्टि हुई। अमृतसर में 117 घटनाएं सामने आईं — 111 खेतों के निरीक्षण में 42 मामलों में पराली जलाने की पुष्टि की गई।
अन्य ज़िलों में गुरदासपुर में 23, कपूरथला में 16, फिरोजपुर में 14, जालंधर में 5 और पटियाला में 4 घटनाएं दर्ज की गई हैं। पटियाला में 3 खेतों का निरीक्षण हुआ, 2 स्थानों पर पुष्टि हुई और ₹10,000 का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया है।
कानूनी कार्रवाई: एफआईआर, रेड एंट्री और नोटिस
PPCB की रिपोर्ट के अनुसार, राज्यभर में पराली जलाने के मामलों में 39 एफआईआर दर्ज की गई हैं। इसके अलावा 106 मामलों में राजस्व रिकॉर्ड में रेड एंट्री की गई है और 152 चेतावनी नोटिस जारी किए गए हैं। यह बहुआयामी कार्रवाई पिछले वर्षों की तुलना में अधिक संरचित दिखती है, हालाँकि आलोचकों का कहना है कि वास्तविक निरोध के लिए जुर्माने की राशि अभी भी बहुत कम है।
फ्लाइंग स्क्वॉड की तैनाती: 30 नवंबर तक निगरानी
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने पंजाब में 'फ्लाइंग स्क्वॉड' (उड़न दस्ते) तैनात किए हैं, जो 30 नवंबर 2026 तक फील्ड स्तर पर निरंतर निगरानी करेंगे। यह तैनाती अलग-अलग चरणों में की गई है ताकि धान कटाई के पूरे मौसम में प्रभावी नज़र रखी जा सके।
जिलेवार तैनाती में पंजाब के प्रमुख धान उत्पादक ज़िले शामिल हैं — संगरूर, तरनतारन, फिरोजपुर, मुक्तसर, बठिंडा, अमृतसर, मोगा, मनसा, फाजिल्का, पटियाला, लुधियाना, कपूरथला, फरीदकोट, बरनाला, मालेरकोटला, गुरदासपुर, जालंधर और फतेहगढ़ साहिब।
आम जनता पर असर और आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर भारत के कई शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खतरनाक स्तर पर पहुँचने की आशंका जताई जा रही है। पराली का धुआँ दिल्ली-NCR सहित आसपास के राज्यों की वायु गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। गौरतलब है कि प्रत्येक वर्ष अक्टूबर-नवंबर में यह समस्या विकराल रूप लेती है और यह अभियान उसी के मद्देनज़र चलाया जा रहा है।
CAQM के फ्लाइंग स्क्वॉड की कार्यकुशलता और ज़मीनी नतीजे आने वाले हफ्तों में इस अभियान की असली परीक्षा होंगे।