पंजाब में पराली जलाने के 3,307 मामले दर्ज, ₹60.60 लाख जुर्माना; तरनतारन सबसे ऊपर
सारांश
मुख्य बातें
पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) की 7 नवंबर 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में पराली जलाने की कुल 3,307 घटनाएँ दर्ज की गई हैं। प्रशासन और PPCB की सक्रिय कार्रवाई के बावजूद एकाधिक जिलों में बड़ी संख्या में फसल अवशेष जलाने के मामले सामने आ रहे हैं, जिससे पर्यावरण और वायु गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ रहा है।
मुख्य आँकड़े और कार्रवाई
PPCB की रिपोर्ट के अनुसार, कुल 3,307 दर्ज मामलों में से 2,903 खेतों का मौके पर निरीक्षण किया गया, जबकि 1,275 स्थानों पर फसल अवशेष जलाने की पुष्टि हुई। पर्यावरण मुआवजे (EC) के तहत कुल ₹60.60 लाख का जुर्माना लगाया गया है, जिसमें से ₹32.50 लाख की वसूली अब तक हो चुकी है।
इसके अतिरिक्त, 870 मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई है, 1,004 मामलों में रेड एंट्री की कार्रवाई की गई है, और 1,102 चेतावनी नोटिस जारी किए गए हैं। यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर भारत में सर्दियों की शुरुआत के साथ वायु प्रदूषण का स्तर तेज़ी से बढ़ रहा है।
सबसे अधिक प्रभावित जिले
जिलेवार आँकड़ों पर नज़र डालें तो तरनतारन जिला 623 मामलों के साथ पहले स्थान पर है। फिरोजपुर में 435, संगरूर में 294, बठिंडा में 274 और अमृतसर में 235 मामले दर्ज किए गए हैं। पटियाला जिला 196 मामलों के साथ इस सूची में शामिल है।
गौरतलब है कि तरनतारन और फिरोजपुर जैसे सीमावर्ती जिलों में पराली जलाने की घटनाएँ हर वर्ष अधिक संख्या में सामने आती हैं, जो इन क्षेत्रों में कृषि पद्धतियों के बदलाव की धीमी गति को उजागर करता है।
पटियाला जिले की स्थिति
पटियाला जिले में 196 घटनाएँ दर्ज हुई हैं, जिनमें से 157 स्थानों का निरीक्षण किया गया और 94 स्थानों पर पराली जलाने की पुष्टि हुई। पर्यावरण मुआवजे के 68 मामलों में कुल ₹3 लाख 45 हजार का जुर्माना लगाया गया, जबकि ₹1 लाख 25 हजार की वसूली हो चुकी है।
इसके अलावा, पटियाला जिले में 77 FIR दर्ज की गई हैं, 33 मामलों में रेड एंट्री हुई है और 185 चेतावनी नोटिस जारी किए गए हैं।
सरकार की प्रतिक्रिया और आगे की राह
PPCB और जिला प्रशासन की ओर से जुर्माना, FIR और चेतावनी नोटिस जैसे बहुस्तरीय उपाय किए जा रहे हैं, लेकिन आँकड़े बताते हैं कि अनुपालन अभी भी अधूरा है — कुल दर्ज मामलों के सापेक्ष वसूली दर करीब 53% है। आलोचकों का कहना है कि किसानों को पराली प्रबंधन के वैकल्पिक साधन और आर्थिक सहायता न मिलने से जमीनी स्तर पर बदलाव सीमित रहता है। आने वाले हफ्तों में धान की कटाई का मौसम समाप्त होने के साथ पराली जलाने की घटनाएँ कम होने की उम्मीद है, लेकिन इस वर्ष दर्ज कुल संख्या पिछले वर्षों की तुलना में नीति की प्रभावशीलता का पैमाना बनेगी।