पंजाब में पराली जलाने की 510 घटनाएँ दर्ज, 184 मामलों में ₹9.30 लाख का पर्यावरणीय जुर्माना
सारांश
मुख्य बातें
पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) की 22 अक्टूबर 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में धान की पराली जलाने की कुल 510 घटनाएँ दर्ज की गई हैं, जिनमें से 467 मामलों का भौतिक निरीक्षण किया जा चुका है और 184 मामलों में पर्यावरणीय मुआवज़ा (Environmental Compensation) लगाया गया है। प्रशासन ने अब तक कुल ₹9.30 लाख का जुर्माना लगाया है, जिसमें से ₹4.93 लाख की वसूली हो चुकी है।
राज्यव्यापी कार्रवाई का ब्यौरा
रिपोर्ट में 195 स्थानों की पहचान की गई है, जहाँ पराली जलाने की घटनाओं की पुष्टि हुई। इसके अतिरिक्त, 4 मामलों में नोडल अधिकारियों या संबंधित कर्मचारियों की भूमिका से जुड़े रिकॉर्ड दर्ज किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अब तक अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय चार्जशीट या निलंबन के आदेश जारी नहीं किए गए हैं।
227 नोडल और सुपरवाइज़री अधिकारियों को चेतावनी नोटिस जारी किए गए हैं। वहीं, 4 मामलों में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है और 166 रेड एंट्री रिकॉर्ड की गई हैं।
जिलावार घटनाओं का विवरण
तरनतारन जिला 247 घटनाओं के साथ सर्वाधिक प्रभावित है — यहाँ 229 मामलों का निरीक्षण हुआ और 97 मामलों में पर्यावरणीय मुआवज़ा लगाया गया। अमृतसर में 136 घटनाएँ दर्ज हुईं, जिनमें 127 का निरीक्षण हुआ और 51 मामलों में जुर्माना लगाया गया।
गुरदासपुर में 32, फिरोज़पुर में 26, कपूरथला में 18, और फ़ाज़िल्का व जालंधर में 9-9 घटनाएँ दर्ज की गईं। पटियाला में 5 घटनाएँ सामने आईं, जिनमें 4 का निरीक्षण हुआ और 3 मामलों में पर्यावरणीय मुआवज़ा लगाया गया। उल्लेखनीय है कि रिपोर्ट में जिलेवार आँकड़ों का योग राज्य के कुल आँकड़े से भिन्न दिखाई देता है, इसलिए इन आँकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
वसूली और निगरानी की स्थिति
रिपोर्ट के अनुसार लगाए गए ₹9.30 लाख के जुर्माने में से केवल ₹4.93 लाख — यानी लगभग 53% — की ही वसूली हो सकी है। यह अनुपात यह संकेत देता है कि जुर्माना-प्रक्रिया की प्रभावशीलता को और सुदृढ़ किए जाने की ज़रूरत है। गौरतलब है कि पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए राज्य सरकार वर्षों से वैकल्पिक प्रबंधन तकनीकों और सब्सिडी का सहारा लेती आई है, फिर भी हर फसल सीज़न में नई घटनाएँ सामने आती हैं।
व्यापक संदर्भ और असर
पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएँ प्रतिवर्ष अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। यह ऐसे समय में आया है जब सर्वोच्च न्यायालय और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) राज्यों पर कड़ी निगरानी बनाए हुए हैं। आलोचकों का कहना है कि जुर्माना-आधारित दृष्टिकोण तब तक पर्याप्त नहीं होगा, जब तक किसानों को पराली प्रबंधन के किफ़ायती विकल्प बड़े पैमाने पर उपलब्ध न कराए जाएँ।
आने वाले दिनों में PPCB की निगरानी जारी रहेगी और वसूली के आँकड़ों में बदलाव की संभावना है — नई रिपोर्टें इस सीज़न की कुल स्थिति की अधिक स्पष्ट तस्वीर पेश करेंगी।