क्या देवेंद्रनाथ ठाकुर राजा राममोहन राय की विरासत के सच्चे उत्तराधिकारी थे?

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क्या देवेंद्रनाथ ठाकुर राजा राममोहन राय की विरासत के सच्चे उत्तराधिकारी थे?

सारांश

क्या देवेंद्रनाथ ठाकुर ने अपने गुरु राजा राममोहन राय की विरासत को आगे बढ़ाया? जानिए उनके जीवन के अनछुए पहलुओं के बारे में, जो भारतीय समाज में सुधार और परिवर्तन का प्रतीक बने।

Key Takeaways

  • राजा राममोहन राय के विचारों को आगे बढ़ाना
  • धार्मिक सुधार के प्रति प्रतिबद्धता
  • शिक्षा के क्षेत्र में संस्थानों की स्थापना
  • ब्रह्म सभा का पुनर्निर्माण
  • सांस्कृतिक पुनर्जागरण में योगदान

नई दिल्ली, 18 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। राजा राममोहन राय की भांति, देवेंद्रनाथ ठाकुर भी यह मानते थे कि भारतीय समाज को पाश्चात्य संस्कृति की सकारात्मक पहलुओं को अपनाते हुए भारतीय परंपरा, संस्कृति और धर्म के साथ जोड़ना चाहिए। वे हिंदू धर्म के समापन के खिलाफ थे, बल्कि उसमें सुधार की ओर अग्रसर थे। अपने उच्च व्यक्तित्व और गहरे आध्यात्मिक ज्ञान के कारण उन्हें पूरे देश में सम्मान मिला, और इसलिए वे 'महर्षि' के नाम से जाने गए।

महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर का जन्म 15 मई 1817 को कलकत्ता में हुआ। वे उस धार्मिक सुधार की महत्वपूर्ण कड़ी थे, जो ब्रिटिश शासन के पश्चात बंगाल में एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का हिस्सा बना। बंगाल पहला प्रांत था, जिसने पश्चिमी प्रभावों का अनुभव किया। यह नवजागरण भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी। राजा राममोहन राय इसके प्रमुख अग्रदूत रहे, जिन्होंने धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्रों में अनेक नई पहल की। देवेंद्रनाथ ठाकुर उनके विचारों के सच्चे उत्तराधिकारी बने और उन्होंने राममोहन राय के अधूरे कार्यों को विशेषकर धार्मिक सुधार के क्षेत्र में आगे बढ़ाया।

वे ऐतिहासिक दृष्टि से राजा राममोहन राय के युग और उनके बाद के धार्मिक नेताओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी थे। धर्म उनके जीवन का मुख्य केंद्र था। जब राजा राममोहन राय का निधन हुआ, तब देवेंद्रनाथ की उम्र केवल 16 वर्ष थी। उस समय उन्हें यह नहीं पता था कि भविष्य में उन्हें राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्मो मंदिर और उनके विचारों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी लेनी होगी। राजा की अकाल मृत्यु के कारण यह कार्य अधूरा रह गया।

देवेंद्रनाथ और राजा राममोहन राय के छोटे बेटे रामप्रसाद राय एक ही विद्यालय में पढ़ते थे। विद्यालय से लौटते समय, दोनों अक्सर राजा को प्रणाम करने जाया करते थे। राजा राममोहन राय बालक देवेंद्रनाथ पर स्नेह दिखाते हुए उन्हें फल भेजते थे। कहा जाता है कि इंग्लैंड जाने से पहले राजा देवेंद्रनाथ से मिले बिना नहीं जाना चाहते थे। उन्होंने देवेंद्रनाथ से हाथ मिलाया और आशीर्वाद दिया। राजा इंग्लैंड से लौट नहीं पाए, लेकिन इस विदाई के समय दोनों के बीच एक आत्मिक संबंध स्थापित हो गया।

राजा के निधन के बाद ब्रह्म सभा संकट में पड़ गई। धीरे-धीरे सभा में आने वाले उपासकों की संख्या कम होने लगी। यदि आचार्य रामचंद्र विद्यावागीश पूरी निष्ठा और समर्पण से सभा को न संभाले होते, तो शायद इसका अस्तित्व समाप्त हो जाता। कई कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने नए धर्म के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी। सभा का खर्च द्वारकानाथ ठाकुर की ओर से दिए गए 80 रुपए के मासिक दान से चलता था।

एक दिन देवेंद्रनाथ अपने अनुयायियों के साथ अपने घर में तालाब के पास के कमरे में इकट्ठा हुए और वेदांत के एकेश्वरवादी सिद्धांतों के अनुसार परमब्रह्म की आराधना आरंभ की। उन्होंने अपने भाई-बहनों और कुछ मित्रों-रिश्तेदारों को बुलाया और एक संस्था का गठन किया। अपने पहले धार्मिक प्रवचन में उन्होंने 'तत्त्वबोधिनी सभा' का उद्देश्य समझाया।

'तत्त्वबोधिनी सभा' का उस समय के अंग्रेजी-शिक्षित बंगाली समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। शुरुआती वर्षों में इसकी सदस्य संख्या में उतार-चढ़ाव आया, लेकिन समय के साथ यह लगातार बढ़ी और एक समय लगभग 800 तक पहुंच गई। ज्ञान और शिक्षा के प्रसार में इस सभा का योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा। 19वीं सदी के बंगाल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद ब्रह्म सभा की स्थिति कमजोर हो गई थी। तत्त्वबोधिनी सभा के संचालन के दौरान देवेंद्रनाथ ठाकुर के मन में ब्रह्म सभा को पुनर्जीवित करने का विचार आया। उन्होंने सभी उन लोगों को एकत्र करने का निश्चय किया, जो एक निर्गुण, शाश्वत और नित्य ब्रह्म में विश्वास रखते थे। उनका उद्देश्य कोई नया संप्रदाय बनाना नहीं था, बल्कि उपासना करने वालों की सच्ची निष्ठा को परखना था।

इस दिशा में उन्होंने पहल की। 21 दिसंबर 1843 को देवेंद्रनाथ ठाकुर ने अपने बीस साथियों के साथ आचार्य रामचंद्र विद्यावागीश से ब्रह्मो धर्म की विधिवत दीक्षा ली। इसी घटना ने ब्रह्म समाज को एक मजबूत आधार प्रदान किया और आगे चलकर यह एक व्यापक आंदोलन बन गया। इस आंदोलन के माध्यम से बंगाली समाज में धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पुनर्निर्माण की एक नई धारा प्रवाहित हुई, विशेषकर 19वीं सदी के उत्तरार्ध में। देवेंद्रनाथ ठाकुर के धर्म के पथ पर चलने की इस शुरुआत के बारे में लेखक नारायण चौधरी ने अपनी किताब 'महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर' में विस्तार से लिखा है।

देवेंद्रनाथ धर्म के साथ-साथ शिक्षा के प्रसार में भी रुचि रखते थे। उन्होंने बंगाल के विभिन्न हिस्सों में शिक्षण संस्थानों की स्थापना में मदद की। इसी प्रकार, उन्होंने 'शांति निकेतन' की स्थापना की, जिसे बाद में ट्रस्ट को सौंप दिया गया। 19 जनवरी 1905 को कोलकाता में देवेंद्रनाथ ठाकुर का निधन हो गया।

Point of View

बल्कि एक सामाजिक आवश्यकता है।
NationPress
18/01/2026

Frequently Asked Questions

देवेंद्रनाथ ठाकुर का जन्म कब हुआ था?
देवेंद्रनाथ ठाकुर का जन्म 15 मई 1817 को कलकत्ता में हुआ था।
क्या देवेंद्रनाथ ठाकुर ने धार्मिक सुधार का समर्थन किया?
हाँ, देवेंद्रनाथ ठाकुर ने हिन्दू धर्म में सुधार के लिए कार्य किया और उन्होंने धार्मिक सुधार का समर्थन किया।
ब्रह्म सभा को किसने पुनर्जीवित किया?
देवेंद्रनाथ ठाकुर ने ब्रह्म सभा को पुनर्जीवित करने का कार्य किया।
तत्त्वबोधिनी सभा का उद्देश्य क्या था?
तत्त्वबोधिनी सभा का उद्देश्य ज्ञान और शिक्षा का प्रसार करना था।
देवेंद्रनाथ ठाकुर का निधन कब हुआ?
देवेंद्रनाथ ठाकुर का निधन 19 जनवरी 1905 को कोलकाता में हुआ।
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