विश्व साइकिल दिवस 2026: राजकोट साइकिल क्लब के 170 सदस्य दे रहे फिटनेस और पर्यावरण का संदेश
सारांश
मुख्य बातें
विश्व साइकिल दिवस के अवसर पर गुजरात के राजकोट शहर की अग्रणी संस्था राजकोट साइकिल क्लब (RCC) ने फिटनेस, पर्यावरण संरक्षण और स्वस्थ जीवनशैली का संदेश दिया। 2015 में स्थापित यह क्लब पिछले 11 वर्षों से साइकिलिंग को सामाजिक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ा रहा है, और वर्तमान में इससे लगभग 170 सक्रिय सदस्य जुड़े हैं, जिनमें छात्र, डॉक्टर, उद्योगपति और वरिष्ठ साइकिलिस्ट शामिल हैं।
क्लब की सोच और 'साइकिल टू वर्क' अभियान
क्लब के संस्थापक दिव्येश अधेरा ने बताया कि RCC ने साइकिलिंग को केवल खेल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ‘साइकिल टू वर्क’ जैसी सामाजिक सोच से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा ईंधन बचत के लिए किए गए आह्वान को साकार करने में साइकिल सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है।
अधेरा ने स्वयं हर सप्ताह कम से कम दो लीटर पेट्रोल बचाने का संकल्प लिया है। उनका मानना है कि यदि देश का प्रत्येक नागरिक छोटे-छोटे कामों के लिए साइकिल का उपयोग करे और आधा या एक लीटर पेट्रोल भी बचाए, तो इससे अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों को बड़ा लाभ होगा।
72 वर्ष की उम्र में भी रोज़ 40 किलोमीटर
क्लब के वरिष्ठ सदस्य और जेरॉक्स मशीन व्यवसायी 72 वर्षीय वीरजीभाई सतानी ने बताया कि युवावस्था में उन्हें साइकिलिंग का विशेष शौक नहीं था, लेकिन राजकोट में आयोजित पहली मैराथन देखने के बाद वे प्रेरित हुए और 64 वर्ष की उम्र में RCC से जुड़े। उनके अनुसार, नियमित साइकिलिंग की वजह से उनके घुटनों का पुराना दर्द पूरी तरह समाप्त हो गया है।
उन्होंने राजकोट से सालंगपुर, जूनागढ़ से जामवाला गीर और राजकोट से द्वारका तक लंबी दूरी की सफल साइकिल यात्राएं की हैं, और प्रतिदिन 30 से 40 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे स्कूल, कॉलेज और दैनिक कार्यों के लिए वाहनों की जगह साइकिल का उपयोग करें।
‘ऊषा माड़ी’: 76 की उम्र में रोज़ाना 45 किलोमीटर
क्लब की सबसे प्रेरणादायक सदस्यों में शामिल 76 वर्षीय ऊषाबेन राजदेव, जिन्हें क्लब में प्यार से ‘ऊषा माड़ी’ कहा जाता है, ने बताया कि मात्र 30 वर्ष की उम्र में पति के निधन के बाद दोनों बच्चों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। परिवार के पालन-पोषण के लिए उन्होंने 25 वर्षों तक बच्चों की ट्राइसाइकिल बेचने का व्यवसाय किया, और इसी दौरान साइकिल चलाना उनकी आदत बन गया।
ऊषाबेन ने कहा कि पिछले 11 वर्षों से वे RCC से जुड़ी हैं और आज भी रोज़ाना 36 से 45 किलोमीटर साइकिल चलाती हैं। उनके अनुसार, नियमित साइकिलिंग की वजह से उन्हें किसी बीमारी के लिए दवा तक लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
‘साइकिलिंग ने अवसाद से बाहर निकाला’
क्लब के सदस्य ए.के. साहू ने बताया कि वे पिछले सात वर्षों से साइकिलिंग कर रहे हैं। पिता के निधन के बाद वे गहरे अवसाद में चले गए थे, लेकिन साइकिलिंग ने उनके जीवन को नई दिशा दी — नया मित्र समूह मिला और मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य दोनों में सुधार हुआ।
साहू ने कहा कि आज लोग छोटे-छोटे कामों के लिए भी मोटर वाहनों का उपयोग करते हैं, जबकि साइकिल के प्रयोग से ईंधन की बचत के साथ प्रदूषण में भी कमी लाई जा सकती है। विश्व साइकिल दिवस पर RCC के सदस्यों की यह कहानियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि साइकिल आज भी एक स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य की कुंजी बनी हुई है।