रिजिजू का विपक्ष पर प्रहार: लोकसभा मात्र 15% समय चली, संसद ठप करना संवैधानिक अधिकार नहीं
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मंगलवार, 25 अगस्त को मानसून सत्र के दौरान संसद में बार-बार हुए हंगामे के लिए विपक्ष को सीधे जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार देता है, लेकिन राजनीतिक मांगें न मानने पर सदन की कार्यवाही बाधित करने का कोई अधिकार नहीं देता।
मानसून सत्र के चौंकाने वाले आँकड़े
रिजिजू ने मानसून सत्र के संसदीय आँकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि लोकसभा अपने निर्धारित समय के केवल 15 प्रतिशत हिस्से में ही चल पाई, जबकि राज्यसभा मात्र 33 प्रतिशत समय संचालित हो सकी। इससे भी अधिक चिंताजनक यह रहा कि लोकसभा में 'प्रश्नकाल' अपने तय समय के बमुश्किल 1 प्रतिशत और राज्यसभा में केवल 12 प्रतिशत समय ही चल पाया। रिजिजू ने इसे विपक्ष की 'नकारात्मक रणनीति' करार दिया — पहले संसद को चलने से रोको, फिर समय की बर्बादी को सरकार के खिलाफ हथियार बनाओ।
राहुल गांधी पर सीधा निशाना
रिजिजू ने दावा किया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जंतर-मंतर पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर चर्चा के लिए सहमत हो गए थे और बहस के लिए एक विशेष समय भी तय किया गया था। उनके अनुसार, कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने यह कहते हुए इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया कि विपक्ष को गृह मंत्री के 'लेक्चर' में कोई रुचि नहीं है। रिजिजू ने कहा, "अगर किसी नेता को सच में बहस से रोका जाता है, तो वह 24 घंटे के प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लेता है। वह उसे 'लेक्चर' कहकर खारिज नहीं करता।"
उन्होंने 17वीं लोकसभा में राहुल गांधी के संसदीय कामकाज के रिकॉर्ड पर भी सवाल उठाए। रिजिजू के दावे के अनुसार, राहुल गांधी की उपस्थिति 51 प्रतिशत रही, उन्होंने राष्ट्रीय औसत 46.7 बहसों के मुकाबले केवल 8 बहसों में हिस्सा लिया, औसत 210 के मुकाबले मात्र 99 सवाल पूछे और कोई भी 'प्राइवेट मेंबर बिल' पेश नहीं किया।
सरकार की संवाद-प्रक्रिया का बचाव
रिजिजू ने विपक्ष के उस आरोप को सिरे से नकार दिया कि सरकार बात नहीं सुनती। उन्होंने 'विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक' का उदाहरण दिया, जिसे विपक्ष की चिंताओं के बाद एक संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया था। उनके अनुसार, बाद में विपक्ष ने विधेयक को पूरी तरह वापस लेने की माँग की, जो बातचीत की मूल भावना के विरुद्ध था। उन्होंने नीट परीक्षा के मुद्दे पर प्रदर्शनकारी छात्रों और भूख हड़ताल पर बैठे एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के साथ सरकार की बातचीत का भी उल्लेख किया।
संसद जनता की है, दलों की नहीं
'द इंडियन एक्सप्रेस' में प्रकाशित अपने लेख में रिजिजू ने कहा कि संसद भारत के लोगों की है, न कि राजनीतिक दलों की। उन्होंने कहा, "नागरिकों द्वारा दिए गए चुनावी जनादेश को कोई सजावटी सर्टिफिकेट नहीं माना जा सकता जिसे तब रद्द कर दिया जाए जब हारने वाले दल बहस के बजाय हंगामा करना चुनें।" उन्होंने यह भी कहा, "जो लोग बहस या वोट के जरिए सरकार को नहीं हरा सकते, उन्हें शोर-शराबे के जरिए संसद को हराने की इजाजत नहीं दी जा सकती।"
विपक्ष की भूमिका पर संवैधानिक तर्क
रिजिजू ने स्पष्ट किया कि संविधान विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने, आलोचना करने, विरोध करने, संशोधन लाने और सरकार के खिलाफ मतदान करने का पूरा अधिकार देता है। उन्होंने कहा, "यह विपक्ष को कोई 'रिमोट कंट्रोल' नहीं देता जिससे वे अपनी राजनीतिक मांगें न मानने पर संसद को बंद कर सकें।" आगे उन्होंने कहा कि कुछ विपक्षी दलों के लिए बातचीत का अर्थ सरकार का घुटने टेकना है — यह रवैया संसदीय लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है। मानसून सत्र की समाप्ति के बाद यह बहस आगामी शीतकालीन सत्र की रूपरेखा तय कर सकती है।