बांग्लादेश: खारे पानी में सोडियम से महिलाओं में रक्तचाप का खतरा, 740 महिलाओं पर अध्ययन में खुलासा
सारांश
मुख्य बातें
बांग्लादेश के तटीय इलाकों में खारे पेयजल के कारण महिलाओं में उच्च रक्तचाप और हृदय रोग का खतरा तेज़ी से बढ़ रहा है — यह चेतावनी इम्पीरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए एक नए अध्ययन में सामने आई है। 2023 से 2025 के बीच तटीय बांग्लादेश की 740 महिलाओं पर किए गए इस शोध के निष्कर्ष ढाका के मोहाखाली स्थित आईसीडीडीआर,बी (अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसी, बांग्लादेश) के सासाकावा ऑडिटोरियम में आयोजित एक उच्चस्तरीय नीति सेमिनार में प्रस्तुत किए गए।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष
शोधकर्ताओं ने पाया कि ट्यूबवेल और भूजल पर निर्भर परिवारों के पीने के पानी में सोडियम की औसत मात्रा 933 मिलीग्राम प्रति लीटर थी। करीब 22 प्रतिशत महिलाएं ऐसा पानी पी रही थीं, जिससे प्रतिदिन केवल दो लीटर पानी पीने पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा अनुशंसित अधिकतम दैनिक सोडियम सेवन का 94 प्रतिशत तक हिस्सा अकेले पानी से ही मिल सकता था।
सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि जिन महिलाओं के पीने के पानी में सोडियम की मात्रा 1,000 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक थी, उनमें 200 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम सोडियम वाला पानी पीने वाली महिलाओं की तुलना में डायस्टोलिक रक्तचाप (निचला रक्तचाप) बढ़ने की संभावना 2.3 गुना अधिक पाई गई। हालाँकि, अध्ययन के अनुसार सिस्टोलिक यानी ऊपरी रक्तचाप के साथ सांख्यिकीय रूप से कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं मिला।
जल स्रोतों की स्थिति कितनी गंभीर
2023 से 2025 के बीच किए गए एक अलग आकलन में 27,697 जल स्रोतों का सर्वेक्षण किया गया, जिनमें से 6,703 स्रोत पीने के लिए उपयोग हो रहे थे। इनमें से खोंइरा उपजिला में पीने के पानी के 55.3 प्रतिशत स्रोत और असासुनी में 23.3 प्रतिशत स्रोत खारे पाए गए। ये आँकड़े बताते हैं कि यह समस्या किसी एक इलाके तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे तटीय क्षेत्र में फैली हुई है।
जलवायु परिवर्तन की भूमिका
WHO के अनुसार, समुद्र के बढ़ते जलस्तर, चक्रवात, तूफानी लहरों और बाढ़ के कारण खारा पानी भूजल और सतही जल स्रोतों में प्रवेश कर रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश पहले से ही जलवायु-प्रेरित आपदाओं के सबसे अधिक प्रभावित देशों में गिना जाता है। गौरतलब है कि WHO लंबे समय से बांग्लादेश के तटीय क्षेत्रों में जल-लवणता को सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में रेखांकित करता रहा है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के साथ यह संकट और गहरा हो सकता है।
विशेषज्ञों की सिफारिशें
अध्ययन में शामिल शोधकर्ताओं ने तटीय क्षेत्रों में पानी की लवणता की नियमित निगरानी, कम-सोडियम वाले पेयजल स्रोतों का विस्तार, वर्षाजल संचयन और जल शोधन व्यवस्था को मजबूत करने की ज़रूरत पर बल दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि सुरक्षित पानी की नीति को केवल जल प्रबंधन तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए — इसे उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और अन्य गैर-संचारी रोगों की रोकथाम से जोड़कर देखा जाना ज़रूरी है।
यह शोध एक व्यापक चेतावनी है कि जलवायु संकट और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट अब अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं — और तटीय देशों को नीति-निर्माण में इस संबंध को केंद्र में रखना होगा।