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ए.के. हंगल: 'शोले' के रहीम चाचा जिन्होंने दर्जी की दुकान से पाया हिंदी सिनेमा में अमर मुकाम

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ए.के. हंगल: 'शोले' के रहीम चाचा जिन्होंने दर्जी की दुकान से पाया हिंदी सिनेमा में अमर मुकाम

सारांश

दर्जी की दुकान से 'शोले' के रहीम चाचा तक — ए.के. हंगल की ज़िंदगी किसी फिल्म से कम नहीं थी। आज़ादी की लड़ाई, जेल, ट्रेड यूनियन और डेढ़ दशक के रंगमंच के बाद उन्होंने 52 साल की उम्र में सिनेमा में कदम रखा और 200 से ज़्यादा फिल्मों में अमिट छाप छोड़ी।

मुख्य बातें

हंगल का जन्म 1 फरवरी 1914 को सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ; परवरिश पेशावर में हुई।
पिता की इच्छा के विरुद्ध उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ टेलरिंग अपनाई और 1929–1947 के बीच स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे।
मज़दूरों के हक के लिए ट्रेड यूनियन बनाने की कोशिश की; कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ाव के कारण कराची में जेल भी हुई।
1936 में थिएटर से जुड़े; मुंबई में IPTA के ज़रिए बलराज साहनी और कैफी आज़मी के साथ काम किया।
52 साल की उम्र में 1966 में फिल्म 'तीसरी कसम' से हिंदी सिनेमा में पदार्पण; 200 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया।
2006 में पद्म भूषण से सम्मानित; 26 अगस्त 2012 को मुंबई में निधन।

दिवंगत अभिनेता ए.के. हंगल — पूरा नाम अवतार किशन हंगल — हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा कलाकारों में से थे जिनकी असल ज़िंदगी उनके पर्दे के किरदारों से कहीं ज़्यादा दिलचस्प थी। 'शोले' (1975) में उनके निभाए रहीम चाचा का डायलॉग 'इतना सन्नाटा क्यों है भाई' आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार पंक्तियों में गिना जाता है। लेकिन इस मुकाम तक पहुँचने से पहले उन्होंने आज़ादी की लड़ाई, जेल की सलाखें, दर्जी की दुकान और दशकों का रंगमंच — सब कुछ जिया था।

सियालकोट से पेशावर: शुरुआती ज़िंदगी

हंगल का जन्म 1 फरवरी 1914 को सियालकोट में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनकी परवरिश पेशावर में हुई। उनके पिता सरकारी नौकरी में थे और स्वाभाविक रूप से चाहते थे कि बेटा भी उसी राह पर चले। लेकिन हंगल का मन शुरू से ही अलग दिशा में था। 1929 से 1947 के बीच उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई — सरकारी नौकरी का विकल्प उनके लिए कभी आकर्षक नहीं रहा।

दर्जी से ट्रेड यूनियन तक

सुरक्षित भविष्य की जगह हंगल ने टेलरिंग का हुनर सीखा और पेशावर में दर्जी बन गए। यह काम उनके लिए केवल रोज़ी-रोटी का ज़रिया नहीं था — उन्होंने साथी दर्जियों की मुश्किलें समझीं और उनके हक के लिए ट्रेड यूनियन बनाने की कोशिश की। मज़दूरों को संगठित करने की यह ललक उनके वैचारिक झुकाव की गवाही देती है। बाद में उन्होंने खुद कहा कि वह स्वतंत्रता सेनानी थे और सरकारी सेवा उनके स्वभाव के विरुद्ध थी।

थिएटर, जेल और मुंबई की राह

1936 में हंगल पेशावर के एक थिएटर ग्रुप से जुड़े और नाटकों में अभिनय करने लगे। 1940 के दशक में वह कम्युनिस्ट और मज़दूर आंदोलनों से भी जुड़े, जिसके चलते उन्हें कराची में जेल जाना पड़ा। जेल से रिहाई के बाद वह भारत लौटे और मुंबई में बस गए। यहाँ उन्होंने इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) से नाता जोड़ा, जहाँ उनकी मुलाकात बलराज साहनी और कैफी आज़मी जैसे दिग्गज कलाकारों से हुई।

52 साल की उम्र में फ़िल्मी आग़ाज़

करीब डेढ़ दशक तक रंगमंच पर काम करने के बाद हंगल ने हिंदी फिल्मों में कदम रखा — और यह कदम तब उठाया जब उनकी उम्र 52 साल थी। 1966 में बसु भट्टाचार्य की फिल्म 'तीसरी कसम' से उन्होंने पर्दे पर पहली बार दस्तक दी। इसके बाद 'गुड्डी', 'बावर्ची', 'अभिमान', 'नमक हराम', 'चुपके चुपके', 'आंधी', 'तपस्या', 'शौकीन', 'अवतार' और 'अर्जुन' जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसे किरदार निभाए जो कहानी की रीढ़ बनते थे। राजेश खन्ना के साथ भी उन्होंने कई फिल्मों में काम किया।

शोले और अमर विरासत

1975 में आई 'शोले' ने हंगल की पहचान को हमेशा के लिए अमर कर दिया। रहीम चाचा के किरदार में उनकी सादगी और गहराई ने दर्शकों के दिलों में स्थायी जगह बनाई। उन्होंने अपने करियर में 200 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया। 'लगान' में शंभू काका का किरदार भी उनके यादगार योगदानों में शुमार है। 2006 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। अपने करियर के अंतिम दौर में वह टीवी धारावाहिक 'मधुबाला — एक इश्क एक जुनून' में भी नज़र आए। 26 अगस्त 2012 को मुंबई में उनका निधन हुआ। उनकी विरासत — एक दर्जी, एक स्वतंत्रता सेनानी, एक रंगकर्मी और एक अभिनेता की — आज भी भारतीय सिनेमा को प्रेरित करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

एक वैचारिक मंच था — IPTA से निकले कलाकार पर्दे पर साधारण आदमी की आत्मा को जीवित रखते थे। 52 साल की उम्र में करियर शुरू करना और फिर भी 'शोले' जैसी कालजयी फिल्म में अमर हो जाना यह साबित करता है कि प्रतिभा की कोई उम्र नहीं होती। आज जब बॉलीवुड में चरित्र अभिनेताओं की जगह सिकुड़ती जा रही है, हंगल जैसे कलाकारों की विरासत एक ज़रूरी आईना है — जो याद दिलाती है कि सहायक किरदार भी दर्शकों की स्मृति में मुख्य भूमिका निभा सकते हैं।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ए.के. हंगल कौन थे और उन्हें किस किरदार के लिए जाना जाता है?
ए.के. हंगल — पूरा नाम अवतार किशन हंगल — हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता थे, जिन्हें 1975 की फिल्म 'शोले' में रहीम चाचा के किरदार और डायलॉग 'इतना सन्नाटा क्यों है भाई' के लिए सबसे ज़्यादा याद किया जाता है। उन्होंने 200 से ज़्यादा हिंदी फिल्मों में काम किया।
ए.के. हंगल ने फिल्मों में कब कदम रखा?
हंगल ने 52 साल की उम्र में 1966 में बसु भट्टाचार्य की फिल्म 'तीसरी कसम' से हिंदी सिनेमा में पदार्पण किया। इससे पहले वह करीब डेढ़ दशक तक IPTA के ज़रिए रंगमंच पर सक्रिय रहे थे।
ए.के. हंगल ने दर्जी का काम क्यों चुना?
हंगल के पिता सरकारी नौकरी में थे और चाहते थे कि बेटा भी वही राह अपनाए, लेकिन हंगल स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे और सरकारी सेवा उनके वैचारिक स्वभाव के विरुद्ध थी। उन्होंने पेशावर में टेलरिंग सीखी और साथी दर्जियों के हक के लिए ट्रेड यूनियन भी बनाने की कोशिश की।
ए.के. हंगल को पद्म भूषण कब मिला?
भारत सरकार ने 2006 में हिंदी सिनेमा में उनके असाधारण योगदान के लिए ए.के. हंगल को पद्म भूषण से सम्मानित किया।
ए.के. हंगल का निधन कब और कहाँ हुआ?
26 अगस्त 2012 को मुंबई में ए.के. हंगल का निधन हुआ। 2012 में ही उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
राष्ट्र प्रेस
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