सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को गिरफ्तारी से बचाया, यूपी सरकार को नोटिस जारी
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार, 25 अगस्त 2026 को पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने में दर्ज कथित रोड रेज एफआईआर के संदर्भ में अंतरिम संरक्षण प्रदान किया और उनकी गिरफ्तारी सहित किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर तत्काल रोक लगा दी। अदालत ने साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को निर्धारित की।
पीठ की संरचना और आदेश का दायरा
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ — जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन भी शामिल थे — ने स्पष्ट किया कि इंदिरापुरम थाने में दर्ज मौजूदा एफआईआर के अलावा भविष्य में इसी प्रकरण से जुड़ी किसी भी नई एफआईआर में भी उपाध्याय के विरुद्ध कोई कठोर कदम नहीं उठाया जाएगा। पीठ ने गाजियाबाद पुलिस आयुक्त को अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश भी दिया।
अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस को यह भी आदेश दिया कि एफआईआर की प्रति उपाध्याय को तत्काल उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे कानून के तहत उचित राहत के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकें।
मुख्य घटनाक्रम: क्या है पूरा मामला
याचिका के अनुसार, उपाध्याय उस दिन अपनी बेटी को स्कूल से घर ले जा रहे थे, जब एक मोटरसाइकिल सवार ने उनकी कार रोककर हंगामा किया। उनका कहना है कि बेटी की मौजूदगी के कारण उन्होंने विवाद को बढ़ने नहीं दिया और स्थिति को शांत करने की कोशिश की।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि यह पूरी घटना सुनियोजित थी और शिकायतकर्ता को उनकी पत्रकारिता के प्रतिशोध में इस्तेमाल किया गया। साथ ही दावा किया गया कि घटनास्थल के आसपास के सीसीटीवी फुटेज से उनकी बेगुनाही सिद्ध हो सकती है, इसलिए उस फुटेज को सुरक्षित रखने का निर्देश देने की भी माँग की गई है।
वकील की दलील: 'खोजी पत्रकारिता का जवाबी हमला'
उपाध्याय की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने अदालत में तर्क दिया कि यह एफआईआर उनके मुवक्किल की खोजी पत्रकारिता का 'जवाबी हमला' है। उन्होंने बताया कि उपाध्याय ने राम मंदिर ट्रस्ट में कथित अनियमितताओं और उत्तर प्रदेश प्रशासन में कथित भ्रष्टाचार से संबंधित रिपोर्टें प्रकाशित की थीं, जिसके बाद कथित तौर पर यह मामला दर्ज कराया गया।
गौरतलब है कि पत्रकारों के विरुद्ध रोड रेज या इसी प्रकार के मामलों में एफआईआर दर्ज कराने की घटनाएँ देश में पहले भी सामने आई हैं, जिन्हें प्रेस-स्वतंत्रता संगठन 'एसएलएपीपी' (SLAPP — Strategic Lawsuit Against Public Participation) की श्रेणी में रखते हैं।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एफआईआर की प्रति मिलने के बाद उपाध्याय इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एफआईआर रद्द करने या अन्य राहत की माँग कर सकते हैं। तब तक अंतरिम संरक्षण जारी रहेगा। मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर 2026 को होगी, जब उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस आयुक्त को अपना जवाब दाखिल करना होगा।