CSIR-TKDL दौरे पर डॉ. जितेंद्र सिंह बोले — पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़े बिना व्यापक लाभ संभव नहीं
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने मंगलवार, 25 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में सीएसआईआर-परंपरागत ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (TKDL) के दौरे के दौरान स्पष्ट किया कि भारत की हजारों वर्ष पुरानी पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को आधुनिक विज्ञान, चिकित्सा और उभरती प्रौद्योगिकियों के साथ समन्वित किए बिना समाज के व्यापक वर्ग तक इसका लाभ नहीं पहुँचाया जा सकता। उन्होंने इस अवसर पर TKDL और विभिन्न शैक्षणिक तथा चिकित्सा संस्थानों के बीच सहयोग को और सुदृढ़ करने का आह्वान किया।
मुख्य घटनाक्रम
डॉ. सिंह ने TKDL के दौरे के दौरान संस्था के कार्यों की विस्तृत समीक्षा की। उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान को केवल आयुर्वेद या अन्य भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के संकुचित दायरे में नहीं देखा जाना चाहिए — इसे बहु-विषयक अनुसंधान का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। उनके अनुसार, भारत एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ बहु-विषयक शोध भविष्य की अनिवार्य आवश्यकता बनता जा रहा है।
बैठक में TKDL की डेटा संरचना और मानकीकृत शब्दावली पर भी विस्तार से चर्चा हुई, जो पारंपरिक ज्ञान से जुड़ी जानकारी को व्यवस्थित रूप से खोजने और दुनिया भर के पेटेंट परीक्षकों के लिए सुगम प्रारूप में प्रस्तुत करने में सहायक है।
शिक्षा और क्षमता निर्माण पर जोर
डॉ. सिंह ने सुझाव दिया कि स्नातकोत्तर चिकित्सा विद्यार्थियों के लिए सह-मार्गदर्शन जैसी व्यवस्थाएँ विकसित की जानी चाहिए, ताकि नई पीढ़ी पारंपरिक ज्ञान आधारित अनुसंधान में सक्रिय रुचि ले। उन्होंने युवा शोधकर्ताओं को बौद्धिक संपदा अधिकारों और पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण एवं संरक्षण की प्रक्रियाओं से परिचित कराने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
बैठक में ऑनलाइन शिक्षा और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों पर भी विचार-विमर्श हुआ, जिनका उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान आधारित प्रशिक्षण को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाना है। गौरतलब है कि यदि नई पीढ़ी को इस विरासत का महत्व समझाया जाए, तो भारत अपने पारंपरिक ज्ञान को वैश्विक मंच पर और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर सकेगा।
TKDL की भूमिका और वैश्विक महत्व
TKDL की स्थापना वर्ष 2001 में हुई थी। प्रारंभ में इसका ध्यान आयुर्वेदिक सूत्रों और उपचार पद्धतियों के दस्तावेजीकरण पर केंद्रित था, लेकिन बाद में इसका दायरा पारंपरिक ज्ञान की अन्य प्रणालियों तक विस्तारित किया गया। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, TKDL में उपलब्ध ज्ञान संसाधनों को अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, जापानी और स्पेनिश सहित कई भाषाओं में पेटेंट कार्यालयों के लिए उपलब्ध कराया गया है।
इससे भारत के पारंपरिक ज्ञान को गलत तरीके से पेटेंट कराने की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को रोकने में महत्वपूर्ण सफलता मिली है — जो इस संस्था की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।
विज्ञान और परंपरा का समन्वय — आगे की राह
डॉ. सिंह ने रेखांकित किया कि भारत के पास एक ओर अत्याधुनिक वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताएँ हैं, तो दूसरी ओर सहस्राब्दियों से संचित पारंपरिक ज्ञान का अमूल्य भंडार भी है। इन दोनों को एकीकृत करके अनुसंधान और नवाचार के लिए एक समन्वित एवं प्रभावी मॉडल विकसित किया जा सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में रुचि तेजी से बढ़ रही है और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी इस दिशा में सदस्य देशों को प्रोत्साहित कर रहा है।