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समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम पर राष्ट्रीय कार्यशाला, 'शैशव' ऐप से जन्म से 3 साल तक डिजिटल देखभाल

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समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम पर राष्ट्रीय कार्यशाला, 'शैशव' ऐप से जन्म से 3 साल तक डिजिटल देखभाल

सारांश

केंद्र सरकार ने एसएसबीएसके को ज़मीन पर उतारने के लिए छत्रपति संभाजीनगर में दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की। 'शैशव' ऐप के ज़रिए जन्म से 36 महीने तक की डिजिटल देखभाल और जोखिम-आधारित फॉलो-अप — यह भारत के बाल स्वास्थ्य ढाँचे में एक ठोस संरचनात्मक बदलाव है।

मुख्य बातें

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 24-25 अगस्त को छत्रपति संभाजीनगर में एसएसबीएसके पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की।
कार्यशाला की अध्यक्षता एनएचएम मिशन निदेशक आराधना पटनायक ने की; 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नोडल अधिकारी शामिल हुए।
'शैशव' ऐप जोखिमग्रस्त नवजातों की डिजिटल ट्रैकिंग, गृह-भ्रमण शेड्यूल, रेफरल और फॉलो-अप की सुविधा देगा।
कार्यक्रम एचबीएनसी और एचबीवाईसी को एकीकृत कर जन्म से 36 महीने तक की समग्र, जोखिम-आधारित देखभाल सुनिश्चित करता है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने 29 जून को एसएसबीएसके का शुभारंभ किया था।
विशेषज्ञों ने जीवन के पहले 7 दिनों और पहले 3 वर्षों को मस्तिष्क विकास के लिए सर्वाधिक संवेदनशील बताया।

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 24-25 अगस्त 2026 को महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (एसएसबीएसके) पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की। इस कार्यशाला का केंद्रीय उद्देश्य जन्म से लेकर 36 महीने तक के शिशुओं के लिए जोखिम-आधारित, एकीकृत और डिजिटल रूप से सक्षम देखभाल व्यवस्था को ज़मीनी स्तर पर लागू करना था।

कार्यशाला का स्वरूप और भागीदारी

कार्यशाला की अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की अतिरिक्त सचिव एवं मिशन निदेशक आराधना पटनायक ने की। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बाल स्वास्थ्य एवं आशा कार्यक्रम के नोडल अधिकारी, तकनीकी विशेषज्ञ और विकास साझेदार शामिल हुए। यह व्यापक भागीदारी इस कार्यक्रम की राष्ट्रव्यापी प्राथमिकता को रेखांकित करती है।

आराधना पटनायक का संबोधन

अपने संबोधन में आराधना पटनायक ने कहा कि भारत ने नवजात और बाल मृत्यु दर में कमी लाने में उल्लेखनीय प्रगति की है, परंतु 'कमजोर नवजातों और बच्चों पर विशेष ध्यान देने की अभी भी आवश्यकता है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि 'बच्चों की सेहत में सुधार के लिए शुरुआती पहचान, जोखिम के आधार पर फॉलो-अप और समय पर कार्रवाई ज़रूरी है।' पटनायक ने जीवन के पहले 7 दिनों और मस्तिष्क विकास के लिए पहले 3 वर्षों को सर्वाधिक संवेदनशील अवधि बताया। उन्होंने आशा, एएनएम, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी, चिकित्सा अधिकारी और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के बीच समन्वित कार्यप्रणाली पर विशेष बल दिया।

'शैशव' ऐप: डिजिटल देखभाल का केंद्र

कार्यशाला का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू 'शैशव' ऐप रहा — यह एसएसबीएसके के क्रियान्वयन के लिए विकसित डिजिटल प्लेटफॉर्म है। इस ऐप के माध्यम से जोखिमग्रस्त नवजातों और शिशुओं की पहचान, उनकी डिजिटल ट्रैकिंग, गृह-भ्रमण का शेड्यूल, रेफरल और फॉलो-अप की सुविधा उपलब्ध होगी। यह ऐप जन्म से लेकर शुरुआती बचपन तक का संपूर्ण स्वास्थ्य अभिलेख एक ही स्थान पर संकलित करेगा, जिससे देखभाल की निरंतरता सुनिश्चित होगी।

तकनीकी सत्रों के मुख्य विषय

कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में जोखिम की पहचान, गृह-भ्रमण शेड्यूल, प्रसवोत्तर मातृ स्वास्थ्य एवं मानसिक स्वास्थ्य, शिशु आहार, विकास की निगरानी और खतरे के संकेतों की पहचान जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई। वीएचएसएनडी, आयुष्मान आरोग्य मंदिर और अन्य सेवाओं के माध्यम से फॉलो-अप को सुदृढ़ करने पर सहमति बनी, ताकि स्वास्थ्य, पोषण या विकास संबंधी समस्याओं से ग्रस्त कोई भी बच्चा निगरानी से बाहर न रहे। विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि तकनीक का उपयोग समय पर निर्णय लेने के लिए होगा, किंतु देखभाल में संवेदनशीलता और परिवार-केंद्रित दृष्टिकोण सर्वोपरि रहेगा।

परिवार की भूमिका और जारी संसाधन

विशेषज्ञों ने बल दिया कि शिशु देखभाल में माता-पिता के साथ-साथ दादा-दादी और परिवार के अन्य सदस्यों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। कार्यशाला के दौरान एसएसबीएसके से जुड़े कई संसाधन जारी किए गए, जिनमें उद्घाटन वीडियो, शैशव ऐप वीडियो और फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण वीडियो शामिल हैं। गौरतलब है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने 29 जून को एसएसबीएसके कार्यक्रम का शुभारंभ किया था। 'पहले तीन साल, संपूर्ण देखभाल' के विज़न पर आधारित यह कार्यक्रम एचबीएनसी और एचबीवाईसी को एकीकृत कर जन्म से 36 महीने तक की समग्र देखभाल सुनिश्चित करता है — और केवल जीवित रहने तक सीमित न रहकर स्वस्थ विकास, पोषण और समय पर रेफरल पर भी केंद्रित है। आने वाले महीनों में इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन की गति और ज़मीनी परिणाम इसकी वास्तविक सफलता का पैमाना होंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन भारत में डिजिटल स्वास्थ्य पहलों का इतिहास बताता है कि ऐप लॉन्च और ज़मीनी उपयोग के बीच की खाई अक्सर गहरी होती है। आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कनेक्टिविटी, डिजिटल साक्षरता और कार्यभार — ये तीनों कारक यह तय करेंगे कि यह प्लेटफॉर्म कागज़ से ज़मीन तक पहुँचता है या नहीं। साथ ही, कार्यशाला में 'परिवार-केंद्रित दृष्टिकोण' पर ज़ोर सही दिशा में है, पर बिना सामुदायिक जागरूकता अभियान के यह भावना फ्रंटलाइन स्तर पर सीमित रह सकती है।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (एसएसबीएसके) क्या है?
एसएसबीएसके केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का एक एकीकृत कार्यक्रम है जो जन्म से 36 महीने तक के शिशुओं को जोखिम-आधारित और डिजिटल रूप से सक्षम देखभाल प्रदान करता है। यह एचबीएनसी और एचबीवाईसी को मिलाकर बनाया गया है और केवल जीवित रहने तक सीमित न होकर स्वस्थ विकास व पोषण पर भी ध्यान देता है।
'शैशव' ऐप क्या करता है और इसका उपयोग कौन करेगा?
'शैशव' ऐप एसएसबीएसके के क्रियान्वयन के लिए विकसित डिजिटल प्लेटफॉर्म है। इसके ज़रिए जोखिमग्रस्त नवजातों की पहचान, डिजिटल ट्रैकिंग, गृह-भ्रमण का शेड्यूल, रेफरल और फॉलो-अप किया जाएगा। आशा, एएनएम और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी इसके प्राथमिक उपयोगकर्ता होंगे।
यह कार्यशाला क्यों आयोजित की गई और इसमें कौन शामिल हुए?
कार्यशाला का उद्देश्य एसएसबीएसके की ऑपरेशनल गाइडलाइंस को राज्य स्तर पर लागू करने की तैयारी करना था। इसमें 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नोडल अधिकारी, तकनीकी विशेषज्ञ और विकास साझेदार शामिल हुए।
एसएसबीएसके कार्यक्रम कब शुरू हुआ और इसका विज़न क्या है?
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने 29 जून को एसएसबीएसके का शुभारंभ किया था। यह कार्यक्रम 'पहले तीन साल, संपूर्ण देखभाल' के विज़न पर आधारित है और जन्म से 36 महीने तक की समग्र देखभाल सुनिश्चित करता है।
इस कार्यक्रम से बच्चों की देखभाल में क्या बदलाव आएगा?
पहले एचबीएनसी और एचबीवाईसी अलग-अलग थे; एसएसबीएसके इन्हें एकीकृत कर जन्म से 36 महीने तक निरंतर जोखिम-आधारित फॉलो-अप सुनिश्चित करेगा। 'शैशव' ऐप के ज़रिए डिजिटल ट्रैकिंग से कोई भी बच्चा निगरानी से बाहर नहीं रहेगा।
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