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बाल कैंसर उपचार में बेहतर पहुँच: स्वास्थ्य मंत्रालय का राष्ट्रीय कार्यक्रम रोडमैप तैयार

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बाल कैंसर उपचार में बेहतर पहुँच: स्वास्थ्य मंत्रालय का राष्ट्रीय कार्यक्रम रोडमैप तैयार

सारांश

भारत में हर साल 75,000 बच्चे कैंसर की चपेट में आते हैं और बचने की दर महज 60% है। DGHS की कार्यशाला में राष्ट्रीय कार्यक्रम का रोडमैप, WHO के साथ MOU और PMJAY मॉडल के विस्तार पर सहमति बनी — यह नीतिगत इरादे से जमीनी अमल की ओर एक अहम कदम है।

मुख्य बातें

DGHS के उप महानिदेशक एल.
स्वस्तिचरण ने 21 मई 2026 को कहा कि केंद्र सरकार बाल कैंसर की हर बाधा दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है।
भारत में हर साल बाल कैंसर के लगभग 75,000 नए मामले सामने आते हैं; वर्तमान जीवित रहने की दर लगभग 60% है।
बाल कैंसर पर खर्च किए गए प्रत्येक 1 डॉलर से 3 डॉलर का आर्थिक लाभ होता है — WHO के तकनीकी अधिकारी बिष्णु गिरि के अनुसार।
केरल और तमिलनाडु के स्वयं-सहायता समूह मॉडल और PMJAY आधारित वित्त सहायता को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने का सुझाव।
बाल कैंसर को 'नोटिफिएबल बीमारी' घोषित करने पर ICMR के साथ विचार-विमर्श जारी।
सितंबर 2022 की संसदीय स्थायी समिति की 139वीं रिपोर्ट में बाल कैंसर नीति ढाँचे की आवश्यकता पहले ही स्वीकार की जा चुकी है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के उप महानिदेशक एल. स्वस्तिचरण ने 21 मई 2026 को स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार बचपन के कैंसर से जुड़ी हर बाधा को दूर करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, ताकि प्रत्येक पीड़ित बच्चा एक स्वस्थ भविष्य जी सके। इंडियन चाइल्डहुड कैंसर इनिशिएटिव (ICCI) द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष कार्यशाला में उन्होंने यह बात कही, जिसका उद्देश्य एक 'राष्ट्रीय बचपन कैंसर कार्यक्रम' के लिए ठोस रोडमैप तैयार करना था।

बचपन का कैंसर: सरकारी हस्तक्षेप का सबसे प्रभावशाली क्षेत्र

स्वस्तिचरण ने रेखांकित किया कि बचपन का कैंसर सरकारी कार्यक्रमों के लिए सबसे अनुकूल लक्ष्य है, क्योंकि अन्य बीमारियों की तुलना में बच्चों के कैंसर में जीवित रहने की दर बढ़ाना अपेक्षाकृत अधिक संभव है। उन्होंने केरल और तमिलनाडु में विकसित मॉडलों से सीख लेने का सुझाव दिया, जिनमें स्वयं-सहायता समूहों की भागीदारी और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) से जुड़े आर्थिक सहायता मॉडलों का सफल उपयोग किया गया है। आँकड़ों के अनुसार, भारत में हर वर्ष बच्चों के कैंसर के लगभग 75,000 नए मामले सामने आते हैं और वर्तमान में उनके बचने की दर लगभग 60 प्रतिशत है।

पोस्ट-सर्वाइवल देखभाल और जल्द पहचान पर जोर

उप महानिदेशक ने कैंसर से उबर चुके बच्चों को मिलने वाली सहायता (पोस्ट-सर्वाइवल केयर) पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा, 'किसी मरीज को ठीक करने के हमारे सभी बेहतरीन प्रयास उसके जीवित रहने के साथ ही खत्म नहीं हो जाने चाहिए, बल्कि आगे भी जारी रहने चाहिए। हमें समुदाय को शामिल करके और कई पक्षों के गठजोड़ के ज़रिए, कैंसर से उबर चुके लोगों को सहायता देने का काम अपने हाथ में लेना होगा।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि बचपन के कैंसर की जल्द पहचान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और इसे 'नोटिफिएबल बीमारी' के रूप में अधिसूचित करने पर भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ मिलकर काम जारी है।

WHO और वैश्विक विशेषज्ञों की राय

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में कैंसर नियंत्रण के तकनीकी अधिकारी बिष्णु गिरि ने कहा कि बचपन के कैंसर पर किया जाने वाला खर्च बर्बादी नहीं, बल्कि एक निवेश है — इस बीमारी पर खर्च किए गए प्रत्येक डॉलर से आर्थिक रूप से 3 डॉलर का लाभ प्राप्त होता है, और विकासशील देशों में यह अनुपात और भी अधिक है। उन्होंने टिकाऊ वित्त पोषण के स्रोतों का उपयोग कर एक स्थायी आर्थिक व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया। WHO इंडिया में एनसीडी के राष्ट्रीय पेशेवर अधिकारी अभिषेक कुंवर ने कहा कि किसी एक बीमारी के लिए अलग कार्यक्रम शुरू करने की बजाय पहले से चल रहे एनसीडी कार्यक्रमों से सीख लेनी चाहिए।

नीतिगत ढाँचे की माँग और ICCI की भूमिका

मैक्स हॉस्पिटल के कैंसर विशेषज्ञ और ICCI की गवर्निंग काउंसिल के सदस्य रमनदीप अरोड़ा ने कहा कि देश में अब पर्याप्त क्लिनिकल सुविधाएँ और चिकित्सा विशेषज्ञता उपलब्ध हैं — अब केवल सरकारी सहयोग की आवश्यकता है ताकि जमीनी स्तर पर परिणामों का दायरा बढ़ाया जा सके। उन्होंने एक 'राष्ट्रीय बचपन कैंसर कार्यक्रम' की शुरुआत और WHO के साथ एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर की आवश्यकता बताई, जिससे भारत को साझीदार देश के रूप में प्राथमिकता मिले। गौरतलब है कि सितंबर 2022 में राज्यसभा की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 139वीं रिपोर्ट में भारत में बाल कैंसर के लिए एक विशेष नीति ढाँचे की आवश्यकता को औपचारिक रूप से स्वीकार किया था। ICCI एक राष्ट्रीय, बहु-पक्षीय मंच है, जिसे 2023 में भारत में बाल कैंसर देखभाल को सुदृढ़ करने के लिए स्थापित किया गया था।

आगे की राह

यह कार्यशाला एक व्यापक 'राष्ट्रीय बाल कैंसर व्यापक प्रबंधन नीति' की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में शुरुआती निदान, साझा देखभाल और एकीकृत उपचार शामिल होंगे। यह ऐसे समय में आया है जब भारत में बाल कैंसर की जीवित रहने की दर वैश्विक औसत से पीछे है और विशेषज्ञ मानते हैं कि एक समन्वित राष्ट्रीय नीति इस अंतर को पाटने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि 2022 की संसदीय समिति की सिफारिशों के तीन वर्ष बाद भी 'राष्ट्रीय बाल कैंसर नीति' केवल रोडमैप के स्तर पर क्यों है। 60% की जीवित रहने की दर वैश्विक उच्च-आय देशों की 85% से अधिक दर के मुकाबले बेहद कम है — और यह अंतर संसाधनों की कमी से अधिक समन्वय और प्राथमिकता की कमी को दर्शाता है। PMJAY और केरल-तमिलनाडु मॉडल के संदर्भ सही दिशा में हैं, परंतु जब तक बाल कैंसर को 'नोटिफिएबल बीमारी' का दर्जा नहीं मिलता और डेटा संग्रह अनिवार्य नहीं होता, नीति निर्माण अनुमानों पर ही टिका रहेगा।
RashtraPress
6 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत में बाल कैंसर की स्थिति कितनी गंभीर है?
ICCI और अन्य अध्ययनों के अनुसार, भारत में हर वर्ष बच्चों के कैंसर के लगभग 75,000 नए मामले सामने आते हैं और वर्तमान में उनके बचने की दर लगभग 60% है। यह दर उच्च-आय देशों की तुलना में काफी कम है, जहाँ यह 85% से अधिक है।
राष्ट्रीय बचपन कैंसर कार्यक्रम क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
यह एक प्रस्तावित केंद्रीय कार्यक्रम है जिसके लिए ICCI की कार्यशाला में रोडमैप तैयार किया गया। इसका उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में शुरुआती निदान, साझा देखभाल और एकीकृत उपचार सुनिश्चित करना है, साथ ही WHO के साथ MOU के ज़रिए वैश्विक सर्वोत्तम पद्धतियाँ भारत में लाना है।
बाल कैंसर को 'नोटिफिएबल बीमारी' क्यों बनाया जाना चाहिए?
नोटिफिएबल बीमारी का दर्जा मिलने पर हर मामले की अनिवार्य रिपोर्टिंग होगी, जिससे सटीक डेटा संग्रह और नीति निर्माण संभव होगा। DGHS के उप महानिदेशक एल. स्वस्तिचरण के अनुसार, इस विषय पर ICMR के साथ मिलकर काम जारी है ताकि कोई भी मरीज छूट न जाए।
केरल और तमिलनाडु के मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर क्यों अपनाने की सिफारिश की गई?
इन राज्यों ने स्वयं-सहायता समूहों की भागीदारी और PMJAY से जुड़े आर्थिक सहायता मॉडलों के ज़रिए बाल कैंसर देखभाल में बेहतर परिणाम हासिल किए हैं। DGHS ने इन्हें एक सफल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जिसे अन्य राज्यों में दोहराया जा सकता है।
बाल कैंसर उपचार में निवेश आर्थिक रूप से कितना फायदेमंद है?
WHO के तकनीकी अधिकारी बिष्णु गिरि के अनुसार, बचपन के कैंसर पर खर्च किए गए प्रत्येक 1 डॉलर से आर्थिक रूप से 3 डॉलर का लाभ होता है, और विकासशील देशों में यह अनुपात और भी अधिक है। इसके अतिरिक्त सामाजिक लाभ भी होते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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