बाल कैंसर उपचार में बेहतर पहुँच: स्वास्थ्य मंत्रालय का राष्ट्रीय कार्यक्रम रोडमैप तैयार
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के उप महानिदेशक एल. स्वस्तिचरण ने 21 मई 2026 को स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार बचपन के कैंसर से जुड़ी हर बाधा को दूर करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, ताकि प्रत्येक पीड़ित बच्चा एक स्वस्थ भविष्य जी सके। इंडियन चाइल्डहुड कैंसर इनिशिएटिव (ICCI) द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष कार्यशाला में उन्होंने यह बात कही, जिसका उद्देश्य एक 'राष्ट्रीय बचपन कैंसर कार्यक्रम' के लिए ठोस रोडमैप तैयार करना था।
बचपन का कैंसर: सरकारी हस्तक्षेप का सबसे प्रभावशाली क्षेत्र
स्वस्तिचरण ने रेखांकित किया कि बचपन का कैंसर सरकारी कार्यक्रमों के लिए सबसे अनुकूल लक्ष्य है, क्योंकि अन्य बीमारियों की तुलना में बच्चों के कैंसर में जीवित रहने की दर बढ़ाना अपेक्षाकृत अधिक संभव है। उन्होंने केरल और तमिलनाडु में विकसित मॉडलों से सीख लेने का सुझाव दिया, जिनमें स्वयं-सहायता समूहों की भागीदारी और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) से जुड़े आर्थिक सहायता मॉडलों का सफल उपयोग किया गया है। आँकड़ों के अनुसार, भारत में हर वर्ष बच्चों के कैंसर के लगभग 75,000 नए मामले सामने आते हैं और वर्तमान में उनके बचने की दर लगभग 60 प्रतिशत है।
पोस्ट-सर्वाइवल देखभाल और जल्द पहचान पर जोर
उप महानिदेशक ने कैंसर से उबर चुके बच्चों को मिलने वाली सहायता (पोस्ट-सर्वाइवल केयर) पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा, 'किसी मरीज को ठीक करने के हमारे सभी बेहतरीन प्रयास उसके जीवित रहने के साथ ही खत्म नहीं हो जाने चाहिए, बल्कि आगे भी जारी रहने चाहिए। हमें समुदाय को शामिल करके और कई पक्षों के गठजोड़ के ज़रिए, कैंसर से उबर चुके लोगों को सहायता देने का काम अपने हाथ में लेना होगा।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि बचपन के कैंसर की जल्द पहचान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और इसे 'नोटिफिएबल बीमारी' के रूप में अधिसूचित करने पर भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ मिलकर काम जारी है।
WHO और वैश्विक विशेषज्ञों की राय
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में कैंसर नियंत्रण के तकनीकी अधिकारी बिष्णु गिरि ने कहा कि बचपन के कैंसर पर किया जाने वाला खर्च बर्बादी नहीं, बल्कि एक निवेश है — इस बीमारी पर खर्च किए गए प्रत्येक डॉलर से आर्थिक रूप से 3 डॉलर का लाभ प्राप्त होता है, और विकासशील देशों में यह अनुपात और भी अधिक है। उन्होंने टिकाऊ वित्त पोषण के स्रोतों का उपयोग कर एक स्थायी आर्थिक व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया। WHO इंडिया में एनसीडी के राष्ट्रीय पेशेवर अधिकारी अभिषेक कुंवर ने कहा कि किसी एक बीमारी के लिए अलग कार्यक्रम शुरू करने की बजाय पहले से चल रहे एनसीडी कार्यक्रमों से सीख लेनी चाहिए।
नीतिगत ढाँचे की माँग और ICCI की भूमिका
मैक्स हॉस्पिटल के कैंसर विशेषज्ञ और ICCI की गवर्निंग काउंसिल के सदस्य रमनदीप अरोड़ा ने कहा कि देश में अब पर्याप्त क्लिनिकल सुविधाएँ और चिकित्सा विशेषज्ञता उपलब्ध हैं — अब केवल सरकारी सहयोग की आवश्यकता है ताकि जमीनी स्तर पर परिणामों का दायरा बढ़ाया जा सके। उन्होंने एक 'राष्ट्रीय बचपन कैंसर कार्यक्रम' की शुरुआत और WHO के साथ एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर की आवश्यकता बताई, जिससे भारत को साझीदार देश के रूप में प्राथमिकता मिले। गौरतलब है कि सितंबर 2022 में राज्यसभा की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 139वीं रिपोर्ट में भारत में बाल कैंसर के लिए एक विशेष नीति ढाँचे की आवश्यकता को औपचारिक रूप से स्वीकार किया था। ICCI एक राष्ट्रीय, बहु-पक्षीय मंच है, जिसे 2023 में भारत में बाल कैंसर देखभाल को सुदृढ़ करने के लिए स्थापित किया गया था।
आगे की राह
यह कार्यशाला एक व्यापक 'राष्ट्रीय बाल कैंसर व्यापक प्रबंधन नीति' की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में शुरुआती निदान, साझा देखभाल और एकीकृत उपचार शामिल होंगे। यह ऐसे समय में आया है जब भारत में बाल कैंसर की जीवित रहने की दर वैश्विक औसत से पीछे है और विशेषज्ञ मानते हैं कि एक समन्वित राष्ट्रीय नीति इस अंतर को पाटने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।