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तृणमूल में 'असली वारिस' की जंग: 28 अगस्त को कोलकाता में ममता vs ऋतब्रत गुट आमने-सामने

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तृणमूल में 'असली वारिस' की जंग: 28 अगस्त को कोलकाता में ममता vs ऋतब्रत गुट आमने-सामने

सारांश

तृणमूल कांग्रेस में 'असली वारिस' की जंग अब छात्र राजनीति के मैदान में उतर आई है। 28 अगस्त को TMCP स्थापना दिवस पर ममता का कालीघाट गुट और ऋतब्रत बनर्जी का विधायक-समर्थित गुट कोलकाता में अलग-अलग शक्ति प्रदर्शन करेंगे — यह लड़ाई भावनात्मक विरासत बनाम संस्थागत संख्या बल की है।

मुख्य बातें

28 अगस्त 2026 को TMCP स्थापना दिवस पर तृणमूल के दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट कोलकाता में अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करेंगे।
ऋतब्रत बनर्जी को राज्य विधानसभा में करीब 60 TMC विधायकों के समर्थन के बाद विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता मिल चुकी है।
ममता बनर्जी का कालीघाट गुट पार्टी की भावनात्मक और ऐतिहासिक विरासत के आधार पर अपना दावा पेश कर रहा है।
फिरहाद हकीम , मदन मित्रा , अनुब्रत मंडल और जावेद खान जैसे वरिष्ठ नेता ऋतब्रत गुट के साथ हैं।
21 जुलाई को शहीद दिवस पर दोनों गुटों ने अलग-अलग रैलियाँ कीं — ऋतब्रत की रैली ममता की सभा से लगभग 3 किलोमीटर दूर मेयो रोड पर हुई।
विश्लेषक इस विभाजन की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन से कर रहे हैं, जहाँ अंततः चुनाव आयोग को हस्तक्षेप करना पड़ा था।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर 'असली उत्तराधिकारी' की लड़ाई एक निर्णायक मोड़ पर आ पहुंची है। 28 अगस्त 2026 को तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद (TMCP) के स्थापना दिवस पर दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट कोलकाता में अलग-अलग भव्य कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी में हैं। मई के चुनाव नतीजों के बाद उपजा यह आंतरिक विभाजन अब विधानसभा की दीवारों से निकलकर सड़कों और छात्र राजनीति तक फैल चुका है।

दो गुट, दो दावे

एक तरफ ममता बनर्जी का 'कालीघाट गुट' है, जो पार्टी की भावनात्मक और ऐतिहासिक विरासत का दावेदार है। वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ ममता के आक्रामक आंदोलनों से लेकर 2011 में सत्ता हासिल करने तक की यात्रा इस गुट की सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती है। पार्टी में दशकों से यह कहावत प्रचलित रही है कि तृणमूल में केवल 'एक पद' है और बाकी सभी 'लैंपपोस्ट' — यानी अन्य नेता ममता की लोकप्रियता की रोशनी में ही चमकते हैं।

दूसरी तरफ ऋतब्रत बनर्जी का गुट है, जिसे राज्य विधानसभा में पर्याप्त TMC विधायकों का समर्थन मिलने के बाद विपक्ष के नेता के रूप में संस्थागत मान्यता प्राप्त हो चुकी है। इस गुट को करीब 60 विधायकों का समर्थन बताया जाता है।

ऋतब्रत गुट की ताकत

ऋतब्रत गुट की शक्ति केवल संख्या बल तक सीमित नहीं है। इस खेमे में फिरहाद हकीम, मदन मित्रा, अनुब्रत मंडल और जावेद खान जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं, जो कभी ममता बनर्जी के सबसे करीबी माने जाते थे। विपक्ष के नेता के रूप में ऋतब्रत को मिली मान्यता ने इस गुट को संस्थागत मजबूती भी प्रदान की है, जिसे कालीघाट गुट के लिए नकारना आसान नहीं होगा।

21 जुलाई की रैलियाँ — पहला शक्ति परीक्षण

दोनों गुटों के बीच पहला बड़ा शक्ति प्रदर्शन 21 जुलाई को हुआ, जो तृणमूल का वार्षिक शहीद दिवस है — 1993 में यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हुई पुलिस फायरिंग की स्मृति में आयोजित होने वाला यह दिन पार्टी के लिए गहरी भावनात्मक अहमियत रखता है।

ऋतब्रत गुट ने मेयो रोड पर एक समानांतर रैली आयोजित की, जो ममता बनर्जी की बिरला तारामंडल के निकट हुई सभा से लगभग तीन किलोमीटर दूर थी। रिपोर्टों के अनुसार दोनों रैलियों में बड़ी संख्या में समर्थक पहुंचे, जिसने पार्टी के भीतर गहराते विभाजन को खुलकर सामने ला दिया।

28 अगस्त: छात्र राजनीति का दांव

TMCP का स्थापना दिवस इस बार इसलिए और अहम है क्योंकि छात्र संगठन पर नियंत्रण का सीधा संबंध कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पार्टी के भविष्य के आधार से है। दोनों गुटों का मानना है कि जो भी TMCP पर प्रभाव कायम करेगा, वह न केवल युवा कार्यकर्ताओं का समर्थन हासिल करेगा, बल्कि 'असली तृणमूल' की वैचारिक पहचान तय करने में भी निर्णायक भूमिका निभाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बात पर होगी कि कौन-सा गुट अधिक भीड़ जुटाने में सफल रहता है।

क्या होगा आगे

यह स्थिति महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन से मिलती-जुलती मानी जा रही है, जहाँ अंततः चुनाव आयोग और अदालतों को यह तय करना पड़ा था कि पार्टी का वास्तविक उत्तराधिकारी कौन है। पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल की वैधता का प्रश्न भविष्य में संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से तय हो सकता है। फिलहाल, 28 अगस्त 2026 को कोलकाता की सड़कें इस राजनीतिक संघर्ष का अगला अध्याय लिखने के लिए तैयार हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो उत्तराधिकार का संकट अवश्यंभावी होता है। ऋतब्रत गुट के पास संख्या बल और संस्थागत मान्यता है, लेकिन ममता बनर्जी के पास वह जन-भावनात्मक पूंजी है जिसे रातोंरात नहीं खरीदा जा सकता। असली परीक्षा यह है कि क्या छात्र संगठन और जमीनी कार्यकर्ता किसी एक गुट के साथ स्थायी रूप से खड़े होंगे, या शिवसेना की तरह यह लड़ाई भी चुनाव आयोग और अदालतों के दरवाजे तक पहुंचेगी।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तृणमूल कांग्रेस में 'असली वारिस' की लड़ाई क्यों शुरू हुई?
मई 2026 के चुनाव नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर विवाद उभरा, जिसने पार्टी को दो गुटों में बाँट दिया। एक गुट ममता बनर्जी के नेतृत्व में है, जबकि दूसरा गुट ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में विधानसभा में संख्या बल और संस्थागत मान्यता का दावा करता है।
ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता कैसे मिली?
राज्य विधानसभा में करीब 60 TMC विधायकों का समर्थन मिलने के बाद ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी गई। यह संस्थागत मान्यता उनके गुट को कालीघाट गुट पर एक महत्वपूर्ण बढ़त देती है।
28 अगस्त को कोलकाता में क्या होगा?
28 अगस्त 2026 को तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद (TMCP) का स्थापना दिवस है। इस अवसर पर ममता बनर्जी का कालीघाट गुट और ऋतब्रत बनर्जी का गुट — दोनों अलग-अलग भव्य कार्यक्रम आयोजित करेंगे। कौन अधिक भीड़ जुटाता है, यह 'असली तृणमूल' की पहचान के लिए अहम संकेत माना जाएगा।
21 जुलाई की रैलियों का क्या महत्व था?
21 जुलाई तृणमूल का वार्षिक शहीद दिवस है, जो 1993 में यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हुई पुलिस फायरिंग की याद में मनाया जाता है। इस बार दोनों गुटों ने अलग-अलग रैलियाँ कीं — ऋतब्रत गुट की रैली मेयो रोड पर हुई, जो ममता की सभा से लगभग तीन किलोमीटर दूर थी। दोनों रैलियों में बड़ी भीड़ उमड़ी, जिसने पार्टी के आंतरिक विभाजन को स्पष्ट कर दिया।
क्या यह विभाजन महाराष्ट्र की शिवसेना जैसा बन सकता है?
राजनीतिक विश्लेषक इस स्थिति की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन से कर रहे हैं, जहाँ अंततः चुनाव आयोग और अदालतों को यह तय करना पड़ा था कि पार्टी का वास्तविक उत्तराधिकारी कौन है। पश्चिम बंगाल में भी यदि दोनों गुट समझौते पर नहीं पहुँचे, तो तृणमूल की वैधता का प्रश्न संवैधानिक संस्थाओं के सामने जा सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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