तृणमूल में 'असली वारिस' की जंग: 28 अगस्त को कोलकाता में ममता vs ऋतब्रत गुट आमने-सामने
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर 'असली उत्तराधिकारी' की लड़ाई एक निर्णायक मोड़ पर आ पहुंची है। 28 अगस्त 2026 को तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद (TMCP) के स्थापना दिवस पर दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट कोलकाता में अलग-अलग भव्य कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी में हैं। मई के चुनाव नतीजों के बाद उपजा यह आंतरिक विभाजन अब विधानसभा की दीवारों से निकलकर सड़कों और छात्र राजनीति तक फैल चुका है।
दो गुट, दो दावे
एक तरफ ममता बनर्जी का 'कालीघाट गुट' है, जो पार्टी की भावनात्मक और ऐतिहासिक विरासत का दावेदार है। वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ ममता के आक्रामक आंदोलनों से लेकर 2011 में सत्ता हासिल करने तक की यात्रा इस गुट की सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती है। पार्टी में दशकों से यह कहावत प्रचलित रही है कि तृणमूल में केवल 'एक पद' है और बाकी सभी 'लैंपपोस्ट' — यानी अन्य नेता ममता की लोकप्रियता की रोशनी में ही चमकते हैं।
दूसरी तरफ ऋतब्रत बनर्जी का गुट है, जिसे राज्य विधानसभा में पर्याप्त TMC विधायकों का समर्थन मिलने के बाद विपक्ष के नेता के रूप में संस्थागत मान्यता प्राप्त हो चुकी है। इस गुट को करीब 60 विधायकों का समर्थन बताया जाता है।
ऋतब्रत गुट की ताकत
ऋतब्रत गुट की शक्ति केवल संख्या बल तक सीमित नहीं है। इस खेमे में फिरहाद हकीम, मदन मित्रा, अनुब्रत मंडल और जावेद खान जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं, जो कभी ममता बनर्जी के सबसे करीबी माने जाते थे। विपक्ष के नेता के रूप में ऋतब्रत को मिली मान्यता ने इस गुट को संस्थागत मजबूती भी प्रदान की है, जिसे कालीघाट गुट के लिए नकारना आसान नहीं होगा।
21 जुलाई की रैलियाँ — पहला शक्ति परीक्षण
दोनों गुटों के बीच पहला बड़ा शक्ति प्रदर्शन 21 जुलाई को हुआ, जो तृणमूल का वार्षिक शहीद दिवस है — 1993 में यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हुई पुलिस फायरिंग की स्मृति में आयोजित होने वाला यह दिन पार्टी के लिए गहरी भावनात्मक अहमियत रखता है।
ऋतब्रत गुट ने मेयो रोड पर एक समानांतर रैली आयोजित की, जो ममता बनर्जी की बिरला तारामंडल के निकट हुई सभा से लगभग तीन किलोमीटर दूर थी। रिपोर्टों के अनुसार दोनों रैलियों में बड़ी संख्या में समर्थक पहुंचे, जिसने पार्टी के भीतर गहराते विभाजन को खुलकर सामने ला दिया।
28 अगस्त: छात्र राजनीति का दांव
TMCP का स्थापना दिवस इस बार इसलिए और अहम है क्योंकि छात्र संगठन पर नियंत्रण का सीधा संबंध कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पार्टी के भविष्य के आधार से है। दोनों गुटों का मानना है कि जो भी TMCP पर प्रभाव कायम करेगा, वह न केवल युवा कार्यकर्ताओं का समर्थन हासिल करेगा, बल्कि 'असली तृणमूल' की वैचारिक पहचान तय करने में भी निर्णायक भूमिका निभाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बात पर होगी कि कौन-सा गुट अधिक भीड़ जुटाने में सफल रहता है।
क्या होगा आगे
यह स्थिति महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन से मिलती-जुलती मानी जा रही है, जहाँ अंततः चुनाव आयोग और अदालतों को यह तय करना पड़ा था कि पार्टी का वास्तविक उत्तराधिकारी कौन है। पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल की वैधता का प्रश्न भविष्य में संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से तय हो सकता है। फिलहाल, 28 अगस्त 2026 को कोलकाता की सड़कें इस राजनीतिक संघर्ष का अगला अध्याय लिखने के लिए तैयार हैं।