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एसईसीसी 2011 का जाति डेटा अविश्वसनीय, एंट्रीज में नंबर-सिंबल: केंद्र का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा

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एसईसीसी 2011 का जाति डेटा अविश्वसनीय, एंट्रीज में नंबर-सिंबल: केंद्र का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा

सारांश

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि एसईसीसी 2011 का जाति डेटा इतना त्रुटिपूर्ण है कि इसे आरक्षण का आधार नहीं बनाया जा सकता — जाति कॉलम में नाम की जगह नंबर-सिंबल, एक जाति की 40 वर्तनियाँ और 4 लाख से अधिक 'जातियाँ' दर्ज हैं, जबकि आधिकारिक सूची में केवल 494 हैं।

मुख्य बातें

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामे में कहा कि एसईसीसी 2011 का कच्चा जाति डेटा आरक्षण या किसी संवैधानिक प्रक्रिया का आधार नहीं बन सकता।
जाति के कॉलम में नाम की जगह नंबर और सिंबल दर्ज पाए गए; कई परिवारों ने जाति बताने से इनकार किया।
महाराष्ट्र के डेटा में 4,28,677 जातियाँ दर्ज हुईं, जबकि आधिकारिक सूची में केवल 494 प्रविष्टियाँ (47 ST, 59 SC, 388 OBC) हैं।
केरल के मालाबार में 'मापिला' जाति की वर्तनी 40 अलग-अलग तरीकों से लिखी गई, जिससे 40 अलग प्रविष्टियाँ बन गईं।
10.3 करोड़ की महाराष्ट्र आबादी में 1.17 करोड़ (11.12%) लोग 'बिना जाति' वाले दर्ज थे।
केंद्र ने 2011 से पहले जातियों की कोई पूर्व-रजिस्ट्री न होने को डेटा की खामियों का मुख्य कारण बताया।

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामे में स्पष्ट किया है कि सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) 2011 के तहत संकलित कच्चे जाति डेटा में गंभीर खामियाँ हैं — जिनमें जाति के कॉलम में नाम की जगह नंबर और सिंबल दर्ज होने जैसी त्रुटियाँ शामिल हैं। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने यह भी कहा कि यह डेटा आरक्षण निर्धारण या किसी अन्य संवैधानिक प्रक्रिया का आधार नहीं बन सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

महाराष्ट्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर कर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से संबंधित एसईसीसी-2011 के रॉ जाति डेटा को सार्वजनिक करने अथवा राज्य में ओबीसी जनसंख्या का स्वतंत्र सर्वेक्षण कराने की अनुमति माँगी थी। इसके जवाब में सितंबर 2021 में दायर हलफनामे में केंद्र ने डेटा की विश्वसनीयता पर विस्तार से सवाल उठाए।

हलफनामे के अनुसार, 2011 की जनगणना से पहले जातियों की कोई पूर्व-निर्धारित रजिस्ट्री तैयार नहीं की गई थी, जिससे डेटा संग्रह की प्रक्रिया में असंगतियाँ अनिवार्य हो गईं।

डेटा में क्या-क्या खामियाँ पाई गईं

केंद्र के हलफनामे के अनुसार, एसईसीसी-2011 में लगभग 130 करोड़ रिकॉर्ड थे, जिन्हें शुरुआत में हजारों अलग-अलग एमएस एक्सल शीट में रखा गया था। विश्लेषण के लिए इसे रिलेशनल डेटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम में स्थानांतरित करना पड़ा।

हलफनामे में दर्ज प्रमुख विसंगतियाँ इस प्रकार हैं: कई सौ मामलों में जाति के कॉलम में नाम की जगह नंबर या सिंबल दर्ज थे; परिवारों ने जाति बताने से इनकार किया या डेटा संग्रहकर्ता जानकारी नहीं जुटा सका, जिससे 'एक्स' जैसी एंट्रीज दर्ज हुईं; और लोगों ने कबीले, गोत्र, उप-जाति तथा टाइटल को एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल किया।

केंद्र ने केरल के मालाबार क्षेत्र में 'मापिला' जाति का उदाहरण दिया, जिसकी वर्तनी 40 अलग-अलग तरीकों से लिखी गई — परिणामस्वरूप एक ही जाति की 40 अलग प्रविष्टियाँ दर्ज हो गईं। इसी प्रकार 'पवार' और 'पोवार' जैसे ध्वनि-समान नामों को एक साथ रखने की आवश्यकता पड़ सकती है, जबकि केवल 'पोवार' को ओबीसी सूची में शामिल किया गया था।

महाराष्ट्र के आँकड़े: विसंगति की तस्वीर

महाराष्ट्र के लिए एसईसीसी डेटा के विश्लेषण से पता चला कि लगभग 10.3 करोड़ की कुल आबादी में से 1.17 करोड़ लोग (11.12 प्रतिशत) 'बिना जाति' वाले दर्ज थे। इसके अलावा, डेटा में कुल 4,28,677 जातियाँ गिनी गईं।

इसके विपरीत, महाराष्ट्र की मौजूदा आधिकारिक सूचियों में अनुसूचित जनजातियों (ST), अनुसूचित जातियों (SC) और ओबीसी की कुल मिलाकर केवल 494 प्रविष्टियाँ हैं — 47 ST, 59 SC और 388 OBC। हलफनामे में कहा गया कि 99 प्रतिशत से अधिक दर्ज जातियों की आबादी 100 से भी कम थी।

केंद्र की कानूनी स्थिति

केंद्र ने महाराष्ट्र के उस तर्क पर भी आपत्ति जताई जिसमें 'विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 2021 के फैसले का हवाला दिया गया था। केंद्र का कहना था कि उस फैसले में एसईसीसी-2011 के रॉ जाति डेटा को सार्वजनिक करने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था।

केंद्र ने स्पष्ट किया कि गवली मामला कुछ जिला परिषदों और पंचायत समितियों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण से संबंधित था और एसईसीसी-2011 डेटा न तो उस याचिका का विषय था और न ही न्यायालय ने उस डेटा की खामियों पर कोई निर्णय दिया था।

आगे क्या होगा

केंद्र के हलफनामे में यह भी कहा गया कि एक मानकीकृत रजिस्ट्री या ड्रॉप-डाउन सिस्टम के माध्यम से डेटा संग्रह किया जाता तो परिणाम अधिक विश्वसनीय होते। यह मामला ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब देशभर में जाति जनगणना की माँग जोर पकड़ रही है और सर्वोच्च न्यायालय में ओबीसी आरक्षण से जुड़े कई मामले विचाराधीन हैं। सर्वोच्च न्यायालय का अगला निर्देश यह तय करेगा कि राज्यों को ओबीसी जनसंख्या डेटा किस माध्यम से जुटाने की अनुमति मिलेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

दूसरी ओर सरकार स्वयं स्वीकार कर रही है कि 2011 में जुटाया गया डेटा इतना अव्यवस्थित है कि उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। असली सवाल यह है कि जब 2011 की खामियाँ इतनी गहरी थीं, तो नई जाति जनगणना के लिए मानकीकृत ढाँचा तैयार करने में डेढ़ दशक क्यों लग गए? 4,28,677 बनाम 494 का यह अंतर सिर्फ तकनीकी विफलता नहीं — यह नीति-निर्माण की उस नींव की कमज़ोरी है जिस पर ओबीसी आरक्षण के दावे टिके हैं।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एसईसीसी 2011 का जाति डेटा अविश्वसनीय क्यों माना जा रहा है?
केंद्र सरकार के हलफनामे के अनुसार, एसईसीसी 2011 में जाति के कॉलम में नाम की जगह नंबर और सिंबल दर्ज थे, एक ही जाति की दर्जनों अलग-अलग वर्तनियाँ मिलीं और 2011 से पहले जातियों की कोई मानक रजिस्ट्री नहीं थी। इन कारणों से डेटा आरक्षण या अन्य सरकारी उद्देश्यों के लिए उपयुक्त नहीं है।
महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका क्यों दायर की थी?
महाराष्ट्र सरकार ने ओबीसी से संबंधित एसईसीसी-2011 के रॉ जाति डेटा को सार्वजनिक करने अथवा राज्य में ओबीसी जनसंख्या का स्वतंत्र सर्वेक्षण कराने की अनुमति माँगी थी। यह माँग ओबीसी आरक्षण के लिए 'ट्रिपल टेस्ट' की शर्त पूरी करने के संदर्भ में उठाई गई थी।
महाराष्ट्र के एसईसीसी डेटा में कितनी जातियाँ दर्ज हुईं और आधिकारिक सूची में कितनी हैं?
एसईसीसी 2011 के कच्चे डेटा में महाराष्ट्र की कुल 4,28,677 जातियाँ दर्ज हुईं, जबकि राज्य की आधिकारिक सूची में केवल 494 प्रविष्टियाँ हैं — 47 ST, 59 SC और 388 OBC। यह विशाल अंतर डेटा की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने पहले एसईसीसी डेटा सार्वजनिक करने का आदेश दिया था?
केंद्र के अनुसार, 'विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य' (2021) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एसईसीसी-2011 के रॉ जाति डेटा को सार्वजनिक करने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया था। वह मामला जिला परिषदों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण तक सीमित था।
भविष्य में जाति डेटा संग्रह को सटीक बनाने के लिए क्या सुझाव दिए गए हैं?
केंद्र के हलफनामे में कहा गया कि जातियों की एक मानकीकृत पूर्व-रजिस्ट्री और डेटा संग्रह के दौरान ड्रॉप-डाउन मेनू जैसी व्यवस्था से वर्तनी-भिन्नता और मनमानी प्रविष्टियों की समस्या काफी हद तक हल हो सकती थी।
राष्ट्र प्रेस
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