एसईसीसी 2011 का जाति डेटा अविश्वसनीय, एंट्रीज में नंबर-सिंबल: केंद्र का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा
सारांश
मुख्य बातें
केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामे में स्पष्ट किया है कि सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) 2011 के तहत संकलित कच्चे जाति डेटा में गंभीर खामियाँ हैं — जिनमें जाति के कॉलम में नाम की जगह नंबर और सिंबल दर्ज होने जैसी त्रुटियाँ शामिल हैं। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने यह भी कहा कि यह डेटा आरक्षण निर्धारण या किसी अन्य संवैधानिक प्रक्रिया का आधार नहीं बन सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
महाराष्ट्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर कर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से संबंधित एसईसीसी-2011 के रॉ जाति डेटा को सार्वजनिक करने अथवा राज्य में ओबीसी जनसंख्या का स्वतंत्र सर्वेक्षण कराने की अनुमति माँगी थी। इसके जवाब में सितंबर 2021 में दायर हलफनामे में केंद्र ने डेटा की विश्वसनीयता पर विस्तार से सवाल उठाए।
हलफनामे के अनुसार, 2011 की जनगणना से पहले जातियों की कोई पूर्व-निर्धारित रजिस्ट्री तैयार नहीं की गई थी, जिससे डेटा संग्रह की प्रक्रिया में असंगतियाँ अनिवार्य हो गईं।
डेटा में क्या-क्या खामियाँ पाई गईं
केंद्र के हलफनामे के अनुसार, एसईसीसी-2011 में लगभग 130 करोड़ रिकॉर्ड थे, जिन्हें शुरुआत में हजारों अलग-अलग एमएस एक्सल शीट में रखा गया था। विश्लेषण के लिए इसे रिलेशनल डेटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम में स्थानांतरित करना पड़ा।
हलफनामे में दर्ज प्रमुख विसंगतियाँ इस प्रकार हैं: कई सौ मामलों में जाति के कॉलम में नाम की जगह नंबर या सिंबल दर्ज थे; परिवारों ने जाति बताने से इनकार किया या डेटा संग्रहकर्ता जानकारी नहीं जुटा सका, जिससे 'एक्स' जैसी एंट्रीज दर्ज हुईं; और लोगों ने कबीले, गोत्र, उप-जाति तथा टाइटल को एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल किया।
केंद्र ने केरल के मालाबार क्षेत्र में 'मापिला' जाति का उदाहरण दिया, जिसकी वर्तनी 40 अलग-अलग तरीकों से लिखी गई — परिणामस्वरूप एक ही जाति की 40 अलग प्रविष्टियाँ दर्ज हो गईं। इसी प्रकार 'पवार' और 'पोवार' जैसे ध्वनि-समान नामों को एक साथ रखने की आवश्यकता पड़ सकती है, जबकि केवल 'पोवार' को ओबीसी सूची में शामिल किया गया था।
महाराष्ट्र के आँकड़े: विसंगति की तस्वीर
महाराष्ट्र के लिए एसईसीसी डेटा के विश्लेषण से पता चला कि लगभग 10.3 करोड़ की कुल आबादी में से 1.17 करोड़ लोग (11.12 प्रतिशत) 'बिना जाति' वाले दर्ज थे। इसके अलावा, डेटा में कुल 4,28,677 जातियाँ गिनी गईं।
इसके विपरीत, महाराष्ट्र की मौजूदा आधिकारिक सूचियों में अनुसूचित जनजातियों (ST), अनुसूचित जातियों (SC) और ओबीसी की कुल मिलाकर केवल 494 प्रविष्टियाँ हैं — 47 ST, 59 SC और 388 OBC। हलफनामे में कहा गया कि 99 प्रतिशत से अधिक दर्ज जातियों की आबादी 100 से भी कम थी।
केंद्र की कानूनी स्थिति
केंद्र ने महाराष्ट्र के उस तर्क पर भी आपत्ति जताई जिसमें 'विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 2021 के फैसले का हवाला दिया गया था। केंद्र का कहना था कि उस फैसले में एसईसीसी-2011 के रॉ जाति डेटा को सार्वजनिक करने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था।
केंद्र ने स्पष्ट किया कि गवली मामला कुछ जिला परिषदों और पंचायत समितियों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण से संबंधित था और एसईसीसी-2011 डेटा न तो उस याचिका का विषय था और न ही न्यायालय ने उस डेटा की खामियों पर कोई निर्णय दिया था।
आगे क्या होगा
केंद्र के हलफनामे में यह भी कहा गया कि एक मानकीकृत रजिस्ट्री या ड्रॉप-डाउन सिस्टम के माध्यम से डेटा संग्रह किया जाता तो परिणाम अधिक विश्वसनीय होते। यह मामला ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब देशभर में जाति जनगणना की माँग जोर पकड़ रही है और सर्वोच्च न्यायालय में ओबीसी आरक्षण से जुड़े कई मामले विचाराधीन हैं। सर्वोच्च न्यायालय का अगला निर्देश यह तय करेगा कि राज्यों को ओबीसी जनसंख्या डेटा किस माध्यम से जुटाने की अनुमति मिलेगी।