25 अगस्त 2026
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मराठी अनिवार्यता के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका, ऑटो-कैब चालकों ने उठाए संवैधानिक सवाल

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मराठी अनिवार्यता के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका, ऑटो-कैब चालकों ने उठाए संवैधानिक सवाल

सारांश

मुंबई के ऑटो-कैब चालकों ने मराठी अनिवार्यता को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी है। महाराष्ट्र सरकार की 12 अगस्त की अधिसूचना पर संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं — लाखों प्रवासी चालकों की आजीविका दांव पर है और अदालत का अंतरिम आदेश इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगा।

मुख्य बातें

25 अगस्त 2026 को अधिवक्ता विवेक शुक्ला के माध्यम से बॉम्बे हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर।
महाराष्ट्र सरकार की 12 अगस्त 2026 की अधिसूचना को चुनौती — जिसमें ऑटो, टैक्सी और ऐप-कैब चालकों के लिए मराठी ज्ञान अनिवार्य किया गया।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 तथा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के उल्लंघन का आरोप।
रिपोर्टों के अनुसार, 85 प्रतिशत चालकों ने तीन महीने की समयसीमा में मराठी का बुनियादी ज्ञान अर्जित किया।
शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक को ज्ञापन सौंपा; कठोर कार्रवाई का विरोध किया।
मामला बुधवार को कार्यवाह मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे की पीठ के समक्ष मेंशन होना प्रस्तावित।

मुंबई में ऑटो रिक्शा, टैक्सी और ऐप-आधारित कैब चालकों के लिए मराठी भाषा का कार्यसाधक ज्ञान अनिवार्य करने वाली महाराष्ट्र सरकार की 12 अगस्त 2026 की अधिसूचना को अब बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। 25 अगस्त 2026 को अधिवक्ता विवेक शुक्ला के माध्यम से दायर इस जनहित याचिका में कहा गया है कि यह नीति लाखों प्रवासी चालकों की आजीविका और संवैधानिक अधिकारों पर सीधा प्रहार करती है।

याचिका में क्या है

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि महाराष्ट्र सरकार की यह अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करती है। इसके अतिरिक्त, याचिका में मोटर वाहन अधिनियम, 1988 का हवाला देते हुए कहा गया है कि इस केंद्रीय कानून में ड्राइविंग लाइसेंस के लिए किसी भाषा-विशेष की अनिवार्यता का कोई प्रावधान नहीं है।

चालकों का कहना है कि यदि भाषा-परीक्षण के आधार पर बैज निलंबित किए गए, तो लाखों गरीब और प्रवासी मजदूरों की रोज़ी-रोटी संकट में पड़ जाएगी।

अदालत में आगे की कार्यवाही

मामले को बुधवार को कार्यवाह मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे की पीठ के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए मेंशन किए जाने की योजना है। हालांकि, यह उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति घुगे को कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद पर स्थानांतरित किए जाने की सिफारिश की जा चुकी है और उन्होंने हाल ही में संकेत दिया था कि पीठ कोई नया मामला नहीं लेगी। ऐसे में याचिका की प्रारंभिक स्वीकृति और सुनवाई की तिथि पर अनिश्चितता बनी हुई है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस भी तेज़ हो गई है। शिवसेना के प्रवक्ता संजय निरुपम ने महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक से मुलाकात कर एक ज्ञापन सौंपा। निरुपम ने कहा, 'महाराष्ट्र में रहने वाले हर व्यक्ति को मराठी में बातचीत करनी चाहिए और सभी को कम से कम इस भाषा की बुनियादी जानकारी होनी चाहिए। महाराष्ट्र में कोई भी यह नहीं कह सकता कि मैं मराठी नहीं बोलूंगा — यह पूरी तरह से अनुचित व्यवहार है।'

हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जो चालक अभी तक भाषा नहीं सीख पाए हैं, उनके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई के वे पक्ष में नहीं हैं।

अनुपालन की स्थिति

निरुपम के अनुसार, सरकार ने 1 मई को ऑटो चालकों को मराठी सीखने के लिए तीन महीने का समय दिया था। उनके दावे के मुताबिक, उपलब्ध जानकारी के अनुसार लगभग 85 प्रतिशत चालकों ने इस अवधि में मराठी का बुनियादी ज्ञान अर्जित कर लिया है। शेष चालक अभी भी इस प्रक्रिया से बाहर हैं, जिनकी स्थिति पर अब अदालत का फैसला निर्णायक भूमिका निभाएगा।

आगे क्या होगा

यह मामला महाराष्ट्र में भाषा नीति और प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों के बीच एक व्यापक संवैधानिक बहस की शुरुआत कर सकता है। बॉम्बे हाई कोर्ट का अंतरिम आदेश यह तय करेगा कि क्या अधिसूचना पर रोक लगेगी या चालकों के बैज निलंबन की प्रक्रिया जारी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि संघवाद और प्रवासी अधिकारों के बीच उस पुरानी खींचतान का नया अध्याय है जो महाराष्ट्र में दशकों से चली आ रही है। 85 प्रतिशत अनुपालन का आँकड़ा यदि सही है, तो शेष 15 प्रतिशत के लिए बैज निलंबन की कठोरता अनुपातहीन लगती है — खासकर जब केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम में भाषा की कोई शर्त नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार ने केंद्रीय कानून के दायरे में रहकर यह अधिसूचना जारी की, या यह एक ऐसी नीति है जो न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं पाएगी। बॉम्बे हाई कोर्ट का अंतरिम रुख इस सवाल का पहला जवाब देगा।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मराठी भाषा अनिवार्यता को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट में क्या याचिका दायर हुई है?
25 अगस्त 2026 को अधिवक्ता विवेक शुक्ला के माध्यम से एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें महाराष्ट्र सरकार की 12 अगस्त 2026 की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई है जो ऑटो रिक्शा, टैक्सी और ऐप-कैब चालकों के लिए मराठी का कार्यसाधक ज्ञान अनिवार्य करती है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
चालकों का तर्क क्या है कि यह नियम गैरकानूनी है?
चालकों का कहना है कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में ड्राइविंग लाइसेंस के लिए किसी भाषा-विशेष की अनिवार्यता का कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए राज्य सरकार की यह अधिसूचना केंद्रीय कानून से असंगत है। साथ ही, उनका कहना है कि यह नियम उनके मौलिक अधिकारों — समानता, स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार — का हनन करता है।
इस मामले में अदालत में आगे क्या होगा?
याचिका को बुधवार को कार्यवाह मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे की पीठ के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए मेंशन किए जाने की योजना है। हालांकि, न्यायमूर्ति घुगे के कलकत्ता हाई कोर्ट में स्थानांतरण की सिफारिश हो चुकी है, इसलिए याचिका की स्वीकृति और सुनवाई की तिथि पर अनिश्चितता बनी हुई है।
कितने चालकों ने अब तक मराठी सीखी है और बाकी का क्या होगा?
शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम के अनुसार, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक लगभग 85 प्रतिशत चालकों ने तीन महीने की समयसीमा में मराठी का बुनियादी ज्ञान अर्जित कर लिया है। शेष चालकों के बारे में निरुपम ने कहा कि वे कठोर दंडात्मक कार्रवाई के पक्ष में नहीं हैं, और अब अदालत का निर्णय इन चालकों की स्थिति तय करेगा।
शिवसेना का इस विवाद पर क्या रुख है?
शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक को ज्ञापन सौंपते हुए कहा कि महाराष्ट्र में रहने वाले हर व्यक्ति को मराठी का सम्मान करना चाहिए, लेकिन जो चालक अभी तक नहीं सीख पाए उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई उचित नहीं होगी। उनका रुख मराठी के सम्मान और प्रवासी चालकों की आजीविका — दोनों के बीच संतुलन बनाने का है।
राष्ट्र प्रेस
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