मराठी अनिवार्यता पर रामदास आठवले का विरोध: 'रोजगार की शर्त बनाना मुंबई की भावना के खिलाफ'
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने 19 अगस्त 2026 को मुंबई में रिक्शा व टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य किए जाने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले का कड़ा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी गरीब कामगार की रोजी-रोटी महज भाषा न जानने के कारण छीनना मुंबई की समावेशी आत्मा के विरुद्ध है।
आठवले का रुख: भाषा सम्मान, रोजगार पर रोक नहीं
आठवले ने कहा, 'मुझे मराठी भाषा पर बहुत गर्व है और मेरा दृढ़ता से मानना है कि महाराष्ट्र में रहने वाले हर व्यक्ति को मराठी जरूर सीखनी चाहिए, क्योंकि यह इस राज्य की आत्मा और हमारी समृद्ध संस्कृति का प्रतीक है। लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि मुंबई सिर्फ एक राज्य की राजधानी नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक राजधानी और एक तेजी से उभरता हुआ वैश्विक शहर है।'
उन्होंने आगे कहा कि मुंबई की असली पहचान इसकी विविधता और हर किसी को खुले दिल से अपनाने की क्षमता में निहित है। देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि दुनिया भर से लोग अपने सपने और उम्मीदें लेकर इस शहर में आते हैं।
महाराष्ट्र सरकार का संशोधित नियम क्या है
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने मोटर वाहन अधिनियम-1988 के तहत महाराष्ट्र मोटर वाहन (संशोधन) नियम-2026 लागू करने का आधिकारिक शासनादेश जारी किया। इन संशोधित नियमों के अनुसार जिन चालकों के पास मराठी का व्यावहारिक ज्ञान नहीं होगा, उन्हें पहले एक महीने का नोटिस दिया जाएगा।
यदि चालक नोटिस अवधि में मराठी सीखने में असफल रहता है तो उसके लाइसेंस का प्राधिकरण तीन महीने तक निलंबित किया जा सकता है। निलंबन के बाद भी अनुपालन न होने पर ड्राइविंग लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द किया जा सकता है।
आठवले की मुख्य आपत्ति
आठवले ने कहा, 'वैश्विक और समावेशी वास्तविकता को देखते हुए रोजगार या ऑटो-रिक्शा परमिट के लिए मराठी अनिवार्य करने जैसे सख्त कानून थोपना अनुचित लगता है। किसी गरीब कामगार की रोजी-रोटी सिर्फ इसलिए छीन लेना या उसे परेशान करना, क्योंकि उसे स्थानीय भाषा पूरी तरह नहीं आती, मुंबई की मूल भावना के खिलाफ है।'
उन्होंने यह भी जोड़ा कि भाषा का सम्मान और प्रसार जरूरी है, लेकिन उसे रोजगार की शर्त या दंड का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए। भाषा लोगों को जोड़ने का माध्यम होनी चाहिए, विभाजन का नहीं।
व्यापक संदर्भ और आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र में भाषाई अस्मिता और प्रवासी मजदूरों के अधिकारों को लेकर बहस तेज है। गौरतलब है कि मुंबई में लाखों प्रवासी चालक ऑटो-रिक्शा और टैक्सी सेवाओं की रीढ़ हैं। आठवले के बयान से यह विवाद राजनीतिक रंग लेता दिख रहा है, और आने वाले दिनों में महाराष्ट्र सरकार पर इस नियम की समीक्षा का दबाव बढ़ सकता है।