मराठी अनिवार्यता विवाद: आठवले बोले, 'हिंदी-मराठी झगड़ा पैदा करना ठीक नहीं', परमिट रद्द करने पर जताई आपत्ति
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई-ए) के अध्यक्ष रामदास आठवले ने 14 जुलाई 2026 को महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले का विरोध किया, जिसमें ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का व्यावहारिक ज्ञान अनिवार्य किया गया है। आठवले ने स्पष्ट कहा कि अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले लोगों के बीच विवाद खड़ा करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।
मुख्य घटनाक्रम
महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने बुधवार को घोषणा की थी कि राज्यभर में ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है, यदि उनके पास मराठी का व्यावहारिक ज्ञान नहीं है। इसके लिए मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत महाराष्ट्र मोटर वाहन (संशोधन) नियम, 2026 को लागू करने का आधिकारिक शासनादेश जारी किया गया है। कानून एवं न्याय विभाग इस प्रस्ताव को पहले ही मंजूरी दे चुका है।
संशोधित नियमों के अनुसार, मराठी का व्यावहारिक कौशल न रखने वाले चालकों को पहले एक महीने का नोटिस दिया जाएगा। एक माह में भाषा न सीखने पर लाइसेंस का प्राधिकरण तीन महीने तक के लिए निलंबित हो सकता है। निलंबन के बाद भी नियमों का पालन न होने पर ड्राइविंग लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द किया जा सकता है।
आठवले की आपत्ति
आठवले ने कहा कि मुंबई भारत की आर्थिक राजधानी है और देश के कोने-कोने से लोग यहाँ रोज़गार की तलाश में आते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि मुंबई में बड़े उद्योगों के साथ-साथ फिल्म इंडस्ट्री भी है, जहाँ देशभर के लोग काम करते हैं। ऐसे में हिंदी और मराठी को लेकर टकराव पैदा करना बिल्कुल सही नहीं है।
उन्होंने कहा, 'ऑटो रिक्शा चालक एक सामान्य कामकाजी व्यक्ति है। वह एक श्रमिक है, जो ऑटो चलाकर करीब ₹20,000 महीने कमाता है।' आठवले ने यह भी माना कि महाराष्ट्र में रहने वाले हर व्यक्ति को मराठी सीखनी चाहिए, लेकिन भाषा न आने पर तत्काल कार्रवाई करना उचित नहीं है — चालकों को इसके लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।
सरकार का पक्ष
परिवहन मंत्री सरनाईक ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान कोई नया नियम नहीं है, बल्कि 1989 के मौजूदा नियम में पहले से मौजूद था, जिसे अतीत में अधिकारियों द्वारा सख्ती से लागू नहीं किया गया था। उन्होंने मराठी सिखाने के लिए चालकों हेतु विशेष कक्षाएँ उपलब्ध कराने की भी घोषणा की है।
आम जनता और चालकों पर असर
आठवले ने दावा किया कि महाराष्ट्र में करीब 80 प्रतिशत गैर-मराठी लोग पहले से मराठी बोल सकते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में बड़ी संख्या में लोग — बच्चों सहित — मराठी समझते और बोलते हैं। कई चालक मराठी सीख रहे हैं, लेकिन भाषा न आने पर उनका परमिट रद्द करना उचित नहीं है।
गौरतलब है कि यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब महाराष्ट्र में भाषाई पहचान का मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना हुआ है। मुंबई में बड़ी संख्या में उत्तर भारतीय प्रवासी कामगार हैं, जिनमें से कई परिवहन क्षेत्र में काम करते हैं।
क्या होगा आगे
शासनादेश लागू हो चुका है और परिवहन विभाग इसे अमल में लाने की तैयारी कर रहा है। आठवले की आपत्ति के बाद यह देखना होगा कि महायुति गठबंधन के भीतर इस मुद्दे पर सहमति बनती है या नहीं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद आगामी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले प्रवासी मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है।