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मराठी भाषा विवाद: मनसे करेगी कानूनी लड़ाई, राज ठाकरे सोमवार को करेंगे बड़ा ऐलान

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मराठी भाषा विवाद: मनसे करेगी कानूनी लड़ाई, राज ठाकरे सोमवार को करेंगे बड़ा ऐलान

सारांश

महाराष्ट्र सरकार ने ऑटो-टैक्सी चालकों को मराठी सीखने के लिए एक साल की मोहलत दी, लेकिन मनसे इससे असहमत है। पार्टी की परिवहन शाखा शनिवार को वकीलों से मिलेगी और राज ठाकरे सोमवार को अगले कदम का ऐलान करेंगे।

मुख्य बातें

महाराष्ट्र सरकार ने ऑटो-टैक्सी चालकों को मराठी सीखने के लिए एक साल की अतिरिक्त मोहलत दी है।
मनसे इस फैसले से असहमत है और कानूनी लड़ाई लड़ने की तैयारी में है।
मनसे की परिवहन शाखा शनिवार को वकीलों के साथ बैठक करेगी।
मनसे प्रमुख राज ठाकरे सोमवार को बड़ी बैठक में अगले कदम का ऐलान करेंगे।
कई ऑटो-टैक्सी चालकों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया और मराठी सीखने की इच्छा जताई।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने मुंबई में रिक्शा और टैक्सी चालकों के मराठी भाषा विवाद को लेकर कानूनी मोर्चा खोलने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा ऑटो-टैक्सी चालकों को मराठी सीखने के लिए एक साल की अतिरिक्त मोहलत दिए जाने के बाद मनसे ने इस निर्णय को अस्वीकार करते हुए कानूनी रास्ता अपनाने की घोषणा की है। पार्टी का कहना है कि यह मुद्दा मराठी रिक्शा और टैक्सी चालकों के अधिकारों से सीधे जुड़ा है।

मनसे की कानूनी रणनीति

मनसे की परिवहन शाखा इस मामले में शनिवार को वकीलों के साथ विशेष बैठक करेगी, जिसमें कानूनी विकल्पों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। इसके बाद मनसे प्रमुख राज ठाकरे सोमवार को एक बड़ी बैठक बुलाएंगे और आगे की रणनीति का सार्वजनिक ऐलान करेंगे। पार्टी का स्पष्ट रुख है कि मराठी भाषा की अनिवार्यता में किसी भी प्रकार की ढील स्वीकार्य नहीं है।

सरकारी फैसले पर ड्राइवरों की प्रतिक्रिया

महाराष्ट्र सरकार की घोषणा के बाद कई इलाकों में ऑटो और टैक्सी चालकों ने जश्न मनाया। 24 वर्षों से गाड़ी चला रहे एक ऑटो चालक ने कहा, 'यह बहुत अच्छी बात है। यह एक अच्छा कदम है। अगर मुझे मराठी नहीं आती, तो यात्री खुद ही हिंदी में बात करने लगते हैं, लेकिन मराठी सीखना अच्छी बात है।'

उत्तर प्रदेश से आए एक टैक्सी चालक ने कहा, 'सरकार ने जो मराठी सीखने की समय सीमा बढ़ाई है, वह बहुत अच्छा फैसला है। हम इतने समय में आराम से मराठी सीख जाएंगे। यात्री ज्यादातर हिंदी समझ लेते हैं।' एक अन्य चालक ने कहा, 'इतने समय से टैक्सी चला रहे हैं तो काफी हद तक मराठी समझ आती है — बस बोलने में थोड़ा दिक्कत होता है। एक साल का समय काफी है।'

विवाद की पृष्ठभूमि

यह मुद्दा मुंबई में भाषाई पहचान और रोज़गार अधिकारों की बहस का हिस्सा है। मनसे लंबे समय से मराठी भाषियों के लिए परिवहन क्षेत्र में प्राथमिकता की माँग करती रही है। गौरतलब है कि मुंबई में लाखों ऑटो-टैक्सी चालक अन्य राज्यों से आए हैं, और भाषाई अनिवार्यता का यह विवाद समय-समय पर राजनीतिक रंग लेता रहा है।

आगे क्या होगा

मनसे की वकीलों के साथ बैठक और राज ठाकरे की सोमवार की बड़ी मीटिंग के बाद यह स्पष्ट होगा कि पार्टी किस कानूनी आधार पर इस मामले को आगे ले जाएगी। इस बीच, सरकार का एक साल की मोहलत वाला फैसला लागू रहेगा और ड्राइवरों के पास मराठी सीखने का समय होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि समावेशी नीति और राजनीतिक प्राथमिकताओं का है।
RashtraPress
29 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मनसे मराठी टैक्सी-रिक्शा विवाद में कानूनी लड़ाई क्यों लड़ रही है?
मनसे का मानना है कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा मराठी सीखने की समय सीमा बढ़ाना मराठी चालकों के हितों के विरुद्ध है। पार्टी इस फैसले को कानूनी रूप से चुनौती देने की तैयारी कर रही है और शनिवार को वकीलों के साथ बैठक करेगी।
महाराष्ट्र सरकार ने ऑटो-टैक्सी चालकों को मराठी सीखने के लिए कितना समय दिया है?
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की सरकार ने रिक्शा और ऑटो-टैक्सी चालकों को मराठी सीखने के लिए एक साल की अतिरिक्त मोहलत दी है। इस फैसले के बाद कई इलाकों में चालकों ने जश्न मनाया।
राज ठाकरे इस मामले में आगे क्या करेंगे?
मनसे प्रमुख राज ठाकरे सोमवार को एक बड़ी बैठक बुलाएंगे और आगे की रणनीति का ऐलान करेंगे। इससे पहले शनिवार को पार्टी की परिवहन शाखा वकीलों के साथ कानूनी विकल्पों पर चर्चा करेगी।
मुंबई के ऑटो-टैक्सी चालकों की सरकार के फैसले पर क्या प्रतिक्रिया रही?
अधिकांश चालकों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया। उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों से आए चालकों ने कहा कि एक साल में वे मराठी सीख सकते हैं और यात्री अक्सर हिंदी में भी बात कर लेते हैं।
मुंबई में मराठी भाषा और ऑटो-टैक्सी चालकों का विवाद क्या है?
मुंबई में बड़ी संख्या में ऑटो-टैक्सी चालक अन्य राज्यों से हैं। मनसे लंबे समय से मराठी भाषियों को परिवहन क्षेत्र में प्राथमिकता और मराठी भाषा की अनिवार्यता की माँग करती रही है। सरकार के हालिया फैसले ने इस बहस को फिर से तेज़ कर दिया है।
राष्ट्र प्रेस
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