लखनऊ कोर्ट परिसर के अवैध निर्माण गिराए जाएं: सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार, 25 अगस्त 2026 को लखनऊ कोर्ट परिसर में वकीलों द्वारा सार्वजनिक रास्तों और उपयोगिता भूमि पर किए गए अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने का आदेश दिया और सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ की याचिका खारिज कर दी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी पद पर होने मात्र से अनधिकृत ढाँचों पर कब्जे का अधिकार नहीं मिलता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चल रही उस कार्यवाही से जुड़ा है, जिसमें लखनऊ कोर्ट परिसर में वकीलों और अन्य लोगों द्वारा कथित तौर पर बनाए गए अनधिकृत चैंबरों और दुकानों को हटाने का निर्देश दिया गया था। प्रारंभिक सर्वेक्षण में 72 अतिक्रमणों की पहचान की गई थी।
उच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद पहले चरण में केवल 14 अतिक्रमण हटाए जा सके, क्योंकि वकीलों ने कथित तौर पर बाधा उत्पन्न की। 4 अगस्त को पारित उच्च न्यायालय के आदेश में दर्ज किया गया कि उसके निर्देशों के पश्चात 100 से अधिक अवैध चैंबर तोड़े गए, किंतु शेष ढाँचे वकीलों के विरोध के कारण नहीं हटाए जा सके।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए कहा, 'आप मुख्य सड़क पर कब्जा करते हैं, कोर्ट परिसर के अंदर खुली जगह पर कब्जा करते हैं, अनधिकृत निर्माण करते हैं और फिर कहते हैं कि मैं एसोसिएशन का अध्यक्ष चुना गया हूँ, मैं गवर्निंग बॉडी का सदस्य हूँ, और इसलिए मुझे वहाँ बने रहने का अधिकार है — ऐसा नहीं हो सकता।'
जस्टिस विक्रम नाथ ने व्यक्तिगत अनुभव का हवाला देते हुए कहा, 'सभी निर्माण तोड़े जाने हैं। मैंने खुद देखा है जब मैं वहाँ दो वर्ष तक वरिष्ठ न्यायाधीश था। मुझे पता है कि किस तरह के निर्माण हुए हैं, सड़कों में कैसे बाधा डाली गई है, ट्रैफिक पूरी तरह से बाधित है। तोड़फोड़ तो होनी ही है।'
वैकल्पिक जगह और मध्यस्थता के प्रस्ताव अस्वीकार
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाल ने वकीलों को वैकल्पिक स्थान दिलाने की माँग की। न्यायालय ने इस पर कहा, 'आप जाकर वहाँ वकीलों के लिए कुछ जमीन खरीदें। राज्य सरकार से अनुरोध करें कि वे आपको इसके लिए कोई सोसाइटी उपलब्ध कराएँ।'
जब मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का प्रस्ताव रखा गया, तो खंडपीठ ने उसे भी अस्वीकार कर दिया और सीधे कहा, 'वकीलों के साथ मध्यस्थता! नहीं। याचिका खारिज।'
प्रशासनिक तैयारियाँ और आगे की कार्रवाई
उच्च न्यायालय ने लखनऊ पुलिस कमिश्नर, जिला मजिस्ट्रेट और नगर आयुक्त को निर्देश दिया था कि वे ध्वस्तीकरण अभियान में समन्वय स्थापित करें और आवश्यक प्रशासनिक व पुलिस सहायता उपलब्ध कराएँ। यह कार्रवाई रविवार को संचालित करने का निर्देश दिया गया था ताकि न्यायिक कामकाज बाधित न हो।
गौरतलब है कि शेष 72 अतिक्रमणकारियों को या तो अपने चैंबर और दुकानें खाली करने या वैध दावा प्रस्तुत करने का एक अंतिम अवसर दिया गया था — विफलता की स्थिति में ध्वस्तीकरण का मार्ग प्रशस्त किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद अब अनधिकृत ढाँचों को हटाने की प्रक्रिया में कोई कानूनी अड़चन शेष नहीं है।