वित्त वर्ष 27 की पहली छमाही में रुपया 93-95 की रेंज में रह सकता है, वैश्विक अस्थिरता घटने से रिकवरी की उम्मीद
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय रुपया वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में डॉलर के मुकाबले मजबूती की राह पर लौट सकता है, क्योंकि वैश्विक अस्थिरता में कमी और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा हाल में उठाए गए नीतिगत कदमों ने रुपए पर दबाव घटाया है। एलारा सिक्योरिटीज की 22 जून 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, अनुकूल परिस्थितियों में रुपया 93-95 की रेंज में स्थिर रह सकता है।
रिकवरी के पीछे क्या है
रिपोर्ट के मुताबिक, चालू खाते के घाटे पर दबाव कम होना और पूंजी प्रवाह में सुधार रुपए की स्थिति को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। 5 जून 2026 को लागू किए गए ऐतिहासिक आयकर अध्यादेश — जिसने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए भारत की सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश को कर-मुक्त कर दिया — ने डेट मार्केट में निवेश प्रवाह को पटरी पर लाने में योगदान दिया है।
इसके अलावा, विदेशी मुद्रा बाजार को स्थिर करने के उपायों, सरकारी बॉन्ड पर कर राहत और डेट-आधारित विदेशी मुद्रा निवेश को प्रोत्साहन देने की नीतियों ने भी निकट अवधि में स्थिति को संभालने में मदद की है।
FPI निवेश में उल्लेखनीय उछाल
रिपोर्ट के अनुसार, RBI की नीतिगत घोषणा के बाद के 10 कारोबारी दिनों में FAR रूट (फुली एक्सेसिबल रूट) से भारत के डेट मार्केट में FPI का निवेश बढ़कर 1.7 अरब डॉलर हो गया, जबकि नीति से पहले के 10 कारोबारी दिनों में यह महज 22.9 करोड़ डॉलर था। यह वृद्धि निवेशकों के बढ़ते भरोसे का संकेत है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ग्लोबल ब्लूमबर्ग बॉन्ड इंडेक्स में भारत के संभावित शामिल होने को जोड़कर देखें तो कुल निवेश 80-85 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है।
अमेरिकी फेड दरें बन सकती हैं बाधा
हालांकि, रुपए की मजबूती पर एक बड़ा जोखिम भी मंडरा रहा है। एलारा सिक्योरिटीज का अनुमान है कि अमेरिकी फेडरल रिज़र्व सितंबर 2026, दिसंबर 2026 और जनवरी 2027 में 25-25 आधार अंक की तीन बार ब्याज दर वृद्धि कर सकता है। यदि ऐसा होता है, तो वित्त वर्ष 27 की दूसरी छमाही में 50 आधार अंक की संचयी बढ़ोतरी रुपए समेत उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा सकती है और रुपए की मजबूती को सीमित कर सकती है।
वित्त वर्ष 28 के लिए चिंताएँ बरकरार
रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2027-28 को लेकर दीर्घकालिक चिंताएँ भी जताई गई हैं। वैश्विक स्तर पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में कमी, अमेरिका में मौद्रिक नीति के सख्त होने और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निवेश के अमेरिका-केंद्रित रहने के कारण भारत में FPI इक्विटी निवेश का आउटलुक निराशाजनक बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) निवेश का केंद्र बने रहने के बीच वहाँ ब्याज दरें बढ़ने का दौर शुरू होने वाला है, जो भारतीय इक्विटी में विदेशी निवेश के लिए प्रतिकूल माहौल बना सकता है।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार और RBI दोनों ही विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए सक्रिय कदम उठा रहे हैं। आगे की दिशा काफी हद तक अमेरिकी मौद्रिक नीति की गति और वैश्विक जोखिम भावना पर निर्भर करेगी।