सद्भावना दिवस 2026: राजनीति में अनिच्छुक प्रवेश से भारत के सबसे युवा PM तक — राजीव गांधी की विरासत
सारांश
मुख्य बातें
भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती पर हर वर्ष 20 अगस्त को सद्भावना दिवस मनाया जाता है — एक ऐसे नेता की स्मृति में, जो राजनीति में आना नहीं चाहते थे, लेकिन जिन्होंने सत्ता में आने के बाद भारत को सूचना प्रौद्योगिकी और आधुनिक शासन की दिशा में एक नई राह दिखाई। 40 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी को आज 'भारत में सूचना प्रौद्योगिकी का जनक' कहा जाता है।
प्रारंभिक जीवन और राजनीति से दूरी
20 अगस्त 1944 को मुंबई (तत्कालीन बम्बई) में जन्मे राजीव गांधी मात्र तीन वर्ष के थे जब भारत स्वतंत्र हुआ और उनके नाना जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। उन्होंने अपना बचपन तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहाँ उनकी माँ इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में कार्यरत थीं।
राजीव गांधी ने देहरादून के वेल्हम स्कूल से शिक्षा प्रारंभ की और फिर दून स्कूल में दाखिला लिया, जहाँ उनके छोटे भाई संजय गांधी भी बाद में पहुँचे। उच्च शिक्षा के लिए वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज गए, और बाद में लंदन के इंपीरियल कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।
उनके सहपाठियों के अनुसार, उनके पास दर्शन या राजनीति की नहीं, बल्कि विज्ञान और इंजीनियरिंग की पुस्तकें रहती थीं। पश्चिमी व हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, फोटोग्राफी और रेडियो उनके प्रिय शौक थे। सबसे बड़ा जुनून था — हवाई उड़ान। इंग्लैंड से लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ्लाइंग क्लब की परीक्षा उत्तीर्ण की और इंडियन एयरलाइंस के व्यावसायिक पायलट बन गए।
राजनीति में अनिच्छुक प्रवेश
1980 में एक विमान दुर्घटना में भाई संजय गांधी की असामयिक मृत्यु ने राजीव गांधी के जीवन की दिशा बदल दी। परिवार और कांग्रेस के भीतर से दबाव बढ़ा कि वे अपनी माँ का राजनीतिक सहयोग करें। पहले उन्होंने इसका विरोध किया, लेकिन अंततः वे राज़ी हो गए।
उन्होंने उत्तर प्रदेश के अमेठी संसदीय क्षेत्र का उपचुनाव जीता — वही सीट जो संजय गांधी के निधन से रिक्त हुई थी। यहीं से उनकी राजनीतिक पारी का आगाज़ हुआ।
ऐतिहासिक जनादेश और प्रधानमंत्री पद
31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के बाद, व्यक्तिगत शोक से उबरते हुए राजीव गांधी ने संयम और मर्यादा के साथ राष्ट्रीय जिम्मेदारी सँभाली। उन्होंने नए लोकसभा चुनाव कराने का निर्णय लिया।
उस चुनाव में कांग्रेस ने 508 में से रिकॉर्ड 401 सीटें जीतीं — पिछले सात चुनावों की तुलना में सर्वाधिक। महीने भर के चुनाव अभियान में राजीव गांधी ने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा की और देशभर में 250 से अधिक सभाएँ कीं।
गौरतलब है कि यह जनादेश उस नेता को मिला जो राजनीति में आने का इच्छुक नहीं था, और जिसने देर से राजनीति में प्रवेश किया था — फिर भी वह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा चुनावी जनादेश बना।
नीति निर्माण में अहम बदलाव
राजीव गांधी का सबसे दूरगामी योगदान सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में रहा। उन्होंने भारत को कम्प्यूटर और दूरसंचार क्रांति की ओर ले जाने के लिए नीतिगत बदलाव किए, जिनकी नींव पर आज का भारत का वैश्विक IT उद्योग खड़ा है। उन्होंने बार-बार कहा कि उनके प्रमुख उद्देश्यों में 21वीं सदी के भारत का निर्माण और देश की एकता को अक्षुण्ण रखना शामिल है।
श्रीपेरुमबुदुर की त्रासदी और अंत
20 मई 1991 को राजीव गांधी अपने निवास 10 जनपथ से भुवनेश्वर और विशाखापट्टनम होते हुए तमिलनाडु के श्रीपेरुमबुदुर के लिए रवाना हुए। 21 मई 1991 की शाम उन्हें वहाँ एक चुनावी रैली को संबोधित करना था।
जाँच के अनुसार, एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरण ने इस हत्या की योजना बनाई थी। उसने अपने विश्वस्त सहयोगी शिवरासन को इस काम के लिए चुना और उसकी चचेरी बहनों धनु व शुभा को भारत भेजा। 12 मई 1991 को रेकी और मॉक ड्रिल की जा चुकी थी।
रैली में भीड़ के बीच धनु ने सुरक्षा घेरा तोड़कर राजीव गांधी को चंदन की माला पहनाई और पैर छूने के बहाने झुककर कमर पर बँधे बम बेल्ट का बटन दबा दिया। इस विस्फोट में राजीव गांधी सहित 16 लोगों की जान चली गई। जाँच केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई। CBI ने साबित किया कि इस हत्या की साजिश एलटीटीई ने रची थी। शुभा ने जहर खाकर और शिवरासन ने खुद को गोली मारकर जान दे दी।
राजीव गांधी की विरासत आज भी भारत की IT क्रांति, पंचायती राज सुधारों और युवा नेतृत्व की मिसाल के रूप में जीवित है — और सद्भावना दिवस हर वर्ष इसी स्मृति को ताज़ा करता है।